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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२१ हो। फिर भी भगवान् सर्वत्र समान हैं। उनका किसी से द्वेष या राग नहीं है। किन्तु जो उन्हें भजते हैं। उन्हें भगवान् अनुगृहीत करते हैं— "यद्यपि सम नहि राग न रोषू। गहहिं न पाप पुन्य गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा०मा० २।२१७।२,३) यद्यपि सामान्यतया प्राणी अपने प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही उन-उन वातावरणों में उन-उन माता, पिता आदि से जन्म लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा तथा संस्कारों के अनुसार प्रवृत्त होता है। वैदिक आस्तिक सनातनी वातावरण में उत्पन्न प्राणी की वैसे माता-पिता और बन्धुओं के सङ्ग तथा शिक्षा संस्कारों से वैदिक शिक्षा, दीक्षा एवं संस्कारों के अनुसार वैदिक कर्मों में प्रवृत्ति होती है। तथापि जहाँ वैसी स्थिति में विकार आ जाता है वहाँ भी प्राणी जब निष्पक्ष हृदय से अपने हित तथा अहित का विचार करता है और सत्पुरुषों के समागम और शास्त्राभ्यास का महत्त्व समझता है तभी से प्रकृति से छुटकारा पाकर अभीष्ट पुरुषार्थ सम्पादनार्थ शास्त्रीय राग-द्वेष उत्पन्न करके पाशविक राग-द्वेष को मिटाकर अधर्म से बचने और कर्मानुष्ठान करने में प्रवृत्त होता है। उससे बुद्धि शुद्ध होने पर और सूक्ष्म विचार उत्पन्न होने पर कामनाओं से रहित भगवदाराधनबुद्धि से कर्मों का आचरण करता है। निष्काम कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान् की भक्ति से बुद्धि और भी पवित्र हो जाती है। तब श्रवण, मनन, निदिध्यासन, भगवद्भक्ति, तत्त्वज्ञान और शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। तभी समूल वासना एवं स्वार्थ का विनाश होता है। परन्तु उसके पहले भी शास्त्रों का उपदेश कारगर होता ही है। राम ने कैकेयी और महाराज के सम्मुख कहा था, तत्रभवान् परम पूज्य पिताश्री के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है, प्राणों का भी परित्याग कर के वह सब करने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ। पिताश्री की शुश्रूषा और उनकी वचनक्रिया, आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं। माँ कैकेयी से भगवान् ने कहा था, अत्रभवान् पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं विजन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ। माँ, यदि आप मेरे गुणों में विश्वास रखतीं तो इसके लिए राजा से कहने की क्या आवश्यकता थी। मैं तो आपकी आज्ञा से ही सब कुछ कर सकता था। हे देवि, मैं अर्थपरायण होकर लोक में नहीं रहना चाहता। मैं ऋषियों के तुल्य विमल धर्म का आश्रयण कर के स्थित हूँ, ऐसा समझकर आप आश्वस्त हों— "यत्तत्रभवतः किञ्चिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया। प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत् ॥ नह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम् । यथा पितरि शुश्रूषा तस्य च वचनक्रिया ॥ अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम् । वने यास्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश ॥ न नूनं मयि कैकेयि किञ्चिदाशंससे गुणान् । यद्राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती ॥" (वा० रा० २।१९।२१-२४) "नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे । विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम् ॥" ( वा० रा० २।१९।२० ) "पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः । अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत् ॥

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति । वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः ॥ स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः । ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसंघैरनिन्दितः ॥ तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान् । रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः ॥ तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा । असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥ अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः । तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥ तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने । स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदिच्छेयं तदा वरम् ॥ गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना । अनभिज्ञो ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा ॥” (वा० रा० २।९।११-१८) “यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ । तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वाक्रमेदिति ॥” (वा० रा० २।९।२८) उपर्युक्त वचनों के अनुसार स्पष्ट प्रतीत होता है कि महाराज चक्रवर्तीजी कभी इन्द्र की सहायता के लिए देवासुर संग्राम में सम्मिलित होकर असुरों से युद्ध कर रहे थे । महाराज कैकेयी को साथ ले गये थे । वहाँ वैजयन्तपुर में महामायावी शम्बरासुर से युद्ध था । उस महान् संग्राम में राक्षस लोग प्रसुप्त पुरुषों को क्षत-विक्षत कर देते थे । उस भीषण युद्ध में असुरों ने महाराज को नानाविध प्रभावशाली शस्त्रास्त्रों से क्षत-विक्षत कर दिया था। उस समय महारानी कैकेयी ने स्वयं रथचालन कर महाराज की रक्षा की थी। उस प्रसन्नता में महाराज ने उन्हें दो वर माँगने को कहा था । महारानी ने कहा था कि जब मेरी इच्छा होगी तब इन वरों को माँग लूँगी । मन्थरा ने श्रीराम के यौवराज्याभिषेक-काल में महारानी को याद दिलाकर एक से श्रीराम को वनवास और दूसरे से श्रीभरत को राज्य प्रदान का वर माँगने को कहा था । श्रीराम ने भी चित्रकूट में श्रीभरत को बतलाया था कि— “देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः । संप्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः पुरा ॥” (वा० रा० २।१०७।४) श्रीराम भगवान् ने भरत को यह भी बतलाया था कि कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के साथ इसी शर्त पर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा । कौशल्या आदि किसी को पुत्र नहीं था, इसलिए महाराज ने भी वैसा स्वीकार कर लिया था— “पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्वहन् । मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्तमम् ॥” (वा० रा० २।१०७।३) “भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादि..म् । कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ क्षिप्रमेवाभिषेचनात् ॥ ऋणान्मोचय राजानं मत्कृतं भरत प्रभुम् । पितरं त्राहि धर्मज्ञ.... .... .... .... ॥” (वा० रा० २।१०७।९,१०)

श्रीराम ने कहा था कि हे धर्मज्ञ भरत ! इन अनेक कारणों से महाराज कैकेयी के इच्छानुसार तुम्हें राज्य देने के लिए बाध्य थे, अतः तुम राज्य स्वीकार कर के सत्यवादी पिताजी को ऋण से मुक्त करो । फिर आप कहते हैं कि "सेवक को जैसे सुरापायी स्वामी के आज्ञानुसार किसी का सिर नहीं तोड़ देना चाहिये, किन्तु स्वामी का नशा उतारने का प्रयास करना चाहिये । वैसे काम, क्रोध, लोभ एवं ममता के आवेश से उन्मादी महाराज दशरथ की आज्ञा न मानकर उनको उन दोषों से मुक्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ।" परन्तु आपका यह कहना ही उन्मत्त-प्रलाप है, क्योंकि श्रीराम ने तो वैसा नहीं किया । क्या उन्होंने अनुचित किया था ? क्यों श्रीराम धर्मज्ञ, विज्ञानवान्, प्रतिभावान् नहीं थे ? क्या वे कर्तव्याकर्तव्य के निर्धारण में सक्षम नहीं थे ? उल्टा वे तो आपके विपरीत कहते हैं कि महाराज दशरथ राजा हैं, गुरु हैं, पिता हैं, वृद्ध हैं वे चाहे क्रोध से, चाहे हर्ष से एवं चाहे काम से जो भी आज्ञा देते हैं धर्म की दृष्टि से कौन अनुशंसवृत्तिवाला पुत्र उसका पालन न करेगा— "गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात् ॥ यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः ॥" (वा०रा० २।२१।५९) श्रीराम ने कौशल्या और लक्ष्मण के सामने कहा था जीवलोक में धर्म, अर्थ, काम एवं अभीष्ट अभ्युदय की सिद्धि में जो भी अपेक्षित होते हैं वे सभी धर्म के पालन से वैसे ही वशीभूत हो जाते हैं, जैसे पुत्रसहित भार्या अपने पति के वश में रहती है । जिस धर्म में सब असंकीर्ण होकर रहते हैं उस धर्म का ही उपक्रम ( आरम्भ ) श्रेष्ठ है— "धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु । ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्यैव वश्याभिमता सपुत्रा ॥ यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात्तदुपक्रमेत ॥" (वा०रा० २।२१।५७, ५८) जाबालि भी श्रीराम को पिता के आज्ञा-पालन से विरत करने आये थे । उस समय राम ने कहा था लोक में सत्य ही ईश्वर है । सत्य में ही सब धर्म सदा आश्रित रहते हैं । अर्थात् बिना सत्य के अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम आदि कोई धर्म सम्पन्न नहीं होता है । क्योंकि सब में सत्य का पालन अनिवार्य है । अतएव संसार की सभी वस्तुएँ सत्यमूलक ही हैं । वे भी सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः सत्यपरायण होना उचित है । तस्मात् सत्य से उत्कृष्ट पद कुछ भी नहीं है । अतएव मैं पिता के निर्देश का पालन क्यों न करूँ । मैं किसी भी लोभ से, मोह से तथा अज्ञान् से सत्य के सेतु का भेदन नहीं कर सकता— "सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः । सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥ वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात्सत्यपरो भवेत् । सोऽहं पितुनिर्देशं तु किमर्थं नानुपालये ॥ नैव लोभान्न मोहाद्वा न चाज्ञानात्तमोन्वितः । सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्यप्रतिश्रवः ॥" (वा०रा० २।१०९।१३-१७) वे राजा दशरथ मेरे पिता हैं, जनयिता हैं । उन्होंने मेरे लिए जो भी आज्ञा दी है, वह मिथ्या कदापि न होगी—

८२४ रामायणमीमांसा एकविंश “स हि राजा दशरथः पिता जनयिता मम । आज्ञापयन्मां यत्तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति ॥” ( वा० रा० २।१११।११ ) पिता, माता और गुरु के कहने पर भी राज्य स्वीकार न करने पर भी भरत दोषी नहीं हुए, क्योंकि रागतः प्राप्त राज्य के स्वीकार करने में कोई विशेषता नहीं थी, विशेषता त्याग में ही थी । चित्रकूट की उस महती सभा में, जिसमें वसिष्ठ, वामदेव आदि महर्षि जनक जैसे महान् तत्त्ववेत्ता तथा अवधराज्य के वरिष्ठ विद्वान् एवं नागरिक उपस्थित थे, कुछ अन्तर्हित महर्षियों ने भी कहा कि हम लोग पिता की आज्ञा का पालन कर के श्रीराम को अनृण देखना चाहते हैं । महाराज इस निष्ठा के कारण स्वर्ग में प्रतिष्ठित हुए हैं— “सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः । अनृतत्वाच्च स्वर्गं····दशरथो गतः ॥” ( वा० रा० २।११२।१६ ) जैसे पिता का मरण सुनकर राम ने निरम्बु व्रत किया । उस दिन सब ने ही निरम्बु (निर्जल) व्रत किया— व्रत निरंबु तेहि दिन सब कीन्हा । मुनिहुँ कहे जल काहु न लीन्हा ।। (रा० मा० २।२४५।४) यह आज्ञा का लङ्घन नहीं है । क्योंकि रागप्राप्त होने से यहाँ गुरुजी का कथन आज्ञारूप नहीं है, किन्तु स्नेहवश ही है, वैसे प्रकृत में भी जानना चाहिये । श्रीकौशल्या ने शोकव्याकुल होकर महाराज के लिए कुछ कहा था, पर सावधान होने पर उन्होंने महाराज से स्पष्ट कहा था—हे धर्मज्ञ ! मैं धर्म समझ रही हूँ। आप सत्यवादी हैं, यह भी जानती हूँ। परन्तु मैंने जो कुछ कहा वह शोकव्याकुल होकर कहा था— “जानामि धर्मं धर्मज्ञ ! त्वां जाने सत्यवादिनम् । पुत्रशोकार्तया तत्त मया किमपि भाषितम् ॥ शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम् ॥” (वा० रा० २।६२।१४,१५) आप कहते हैं कि 'काम और क्रोध के आवेश में उन्मादी पिता की आज्ञा नहीं माननी चाहिये ।' परन्तु भगवान् राम तो स्पष्ट कह चुके हैं कि यदि क्रोधदृष्टि या काम के वश होकर भी पिता कुछ आदेश दे तो उसका भी पालन करना ही पुत्र का धर्म है । श्रीराम ने कौशल्या से कहा था कि मैं पिता की आज्ञा का अतिक्रमण किसी तरह भी नहीं कर सकता और आपको शिरसा प्रणाम द्वारा प्रसन्नकर वन जाना चाहता हूँ । यहाँ उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज सगरपुत्र पिता के आज्ञानुसार भूमि का खनन करते हुए महान् वध को प्राप्त हुए थे । जामदग्न्य राम ने पिता के आज्ञानुसार अपनी माता रेणुका का वध किया था । इन लोगों तथा अन्य लोगों ने पिता का वचन पालन किया था, अतः मैं पिता का वचन-पालन अवश्य करूँगा— “नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम । प्रसाद्ये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम् ॥ अस्माकं तु कुले जातैः सगरस्याज्ञया पितुः । खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तो हि महान् वधः ॥ जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम् । कृत्ता परशुनाऽरण्ये पितुर्वचनकारणात् ॥

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२५ एतैरन्यैश्च बहुभिर्दिवि देवसमैः कृतम् । पितुर्वचनममक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम् ॥” (वा० रा० २।२१।३०--३४) यही मानस में भी कहा है— “परसुराम पित आज्ञा राखी । मारी मात लोक सब साखी ॥” ( रा० मा० २।१७२।४ ) यही भरत ने भी कहा था— “उचित कि अनुचित किये विचारू । जाय धर्म सिर पातक भारू ॥” ( रा० मा० २।१७५।२ ) श्रीलक्ष्मण ने कुछ महाराज के विरुद्ध रुख प्रकट किया था । उसपर राम ने प्यार से ही उन्हें डाँटकर कहा था कि ऐसी अनार्य बुद्धि को त्यागकर धर्म का ही आश्रयण करो । तीक्ष्णता को त्यागकर मेरी बुद्धि का ही अनुगमन करो— “तदेनां विसृजानार्या क्षत्रधर्माश्रितां मतिम् । धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्वुद्धिरनुगम्यताम् ॥” ( रा० मा० २।२१।४४ ) भरत की महिमा अपने आप में लोकोत्तर है। उनका धर्म की नयी व्याख्या से कोई सम्बन्ध नहीं है। भरत न तो कभी महाराज की सत्यनिष्ठा में सन्देह करते थे और न ही वसिष्ठ की धर्म-व्याख्या में ही सन्दिहान थे । वे तो सरल हृदय से स्वच्छ भगवान् राम के अनुरागी थे । उनको किसी नये धर्म की स्थापना नहीं करनी थी । उनके दर्शनमात्र से चर और अचर सभी प्रभावित होते हैं । ठीक ही है— “होत न भूतल भाव भरत को । सचर अचर चर अचर करत को ।।” ( वा० रा० २।२३६।४ ) ठीक ही कहा गया है कि भरत एक गम्भीर क्षीरसमुद्र थे । विरह मन्दराचल था । कृपासिन्धु राघवेन्द्र ने साधुरूप देवताओं के लिए उस विरहरूपी मन्दराचल से भरतरूपी पयोधि को मथकर प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया था— “प्रेम अमिय मंदर बिरहु भरत पयोधि गभीर । मथि प्रकटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥” ( रा० मा० २।२३७ ) तुलसी ने ठीक ही कहा है— “अगम सनेहु भरत रघुबर को । जहाँ न जाइ मन बिधि हरि हर को ।।” (रा० मा० २।२३९,३) मानस की किसी भी पङ्क्ति से यह नहीं प्रतीत होता है कि श्रीभरत वसिष्ठ के किसी पक्ष का खण्डन करते हैं या वे महाराज दशरथ के किसी कार्य को दोषपूर्ण ठहराते हैं । श्रीराम को अयोध्या लौटाकर ले जाना और राज्यसिंहासन पर विराजमान करना सभी को अभीष्ट था ही । केवल माँ कैकेयी को वह भी देवताओं की माया से कुछ समय तक के लिए भले कुछ कम अच्छा लगा हो । महाराज दशरथ को वह अभीष्ट ही था । गुरु वसिष्ठ भी वही चाहते थे । चित्रकूट में भी वसिष्ठने कभी भरत की कोई परीक्षा नहीं ली थी । केवल सबके साथ मिल-जुलकर विचार करते थे । चित्रकूट की प्रथम सभा में गुरु वसिष्ठ महाराज ने वस्तुस्थिति का वर्णन कर के सबसे राय जाननी चाही थी । १०४

८२६ रामायणमीमांसा एकविंश “बोले मुनिवर समय समाना । सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरमधुर्रीन भानुकुलभानू । राजा राम स्वबस भगवान् ॥ सत्यसंघ पालक श्रुतिसेतू । राम जनम जग मंगल हेतू ॥ गुरु पितु मान बचन अनुसारी । खल दल दलन देव हितकारी ॥ नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान यथारथ ॥ बिधि हरि हर ससि रबि दिशिपाला । माया जीव करम कुलि काला ।। अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई । योगसिद्धि निगमागम गाई ॥ करि बिचार जिय देखहु नीके । रामरजाय सीस सबही कें ॥” ( रा० मा० २।२५२।१-४ ) “राखे रामरजाय रुख हम सब कर हित होई । समुझि सयाने करहु अस सब मिलि संमत सोई ।।”( रा० मा० २।२५३ ) उपर्युक्त पङ्क्तियों में वसिष्ठ महाराज ने सब कुछ कह दिया । नीति, प्रीति, परमार्थ और प्राणी के वास्तविक स्वार्थ को राम के समान और कोई नहीं जानता । यह एक ही पङ्क्ति सम्पूर्ण कुशङ्काओं एवं दुस्तर्कों का उत्तर है । राम सर्वेश्वर तो हैं ही । परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से भी उनका रुख देखकर ही काम करने में सबकी भलाई है । स्वयं राम का रुख तो नीति, प्रीति, परमार्थ और वास्तविक स्वार्थ की दृष्टि से भी सर्वहितकारी है । क्यों वन जा रहे हैं, यह भी स्पष्ट कह दिया । अन्त में भरत को भी तदनुसार ही चलना भी था । मुनिवर की वह वाणी नीति, परमार्थ और स्वार्थ से युक्त थी । उसपर कोई क्या कहता । श्रीभरतजी प्रेममूर्ति या प्रेमावतार थे । उन्होंने जो कहा वह उनके योग्य ही था । “भानुवंस भये भूप घनेरे । अधिक एकते एक बड़ेरे ॥ जनम हेतु सब कहँ पित माता । करम सुभासुभ देइ विधाता ।।” (रा० मा० २।२५३।३) परन्तु “दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउर जग जाना ॥ सो गोसांइ विधिगति जेहि छेकी । सकइ को टार टेक जो टेकी ।।”(रा०मा०२।२५३।४) इस वंश में कोई महान् प्रतापी धार्मिक राजा था । उसके यहाँ कोई राजा अपना धर्म-संकट लेकर आया था । उसकी पुत्री के जन्म-पत्र में ऐसा योग था कि वह सातवीं भाँवर में ही विधवा होगी, उसका पति मर जायगा । किसी ने भी उसके साथ विवाह करने की हिम्मत नहीं की थी । कौन करता, जान-बूझकर कौन मरना चाहता । धर्मात्मा सूर्यवंशी राजा तो ऐसे संकटों को मोल लेते ही रहते थे । उस राजा ने केवल धर्म-रक्षा की दृष्टि से ही विवाह स्वीकार कर लिया । वसिष्ठ महाराज पुरोहित थे ही । उन्होंने ही विवाह कराया । सातवीं भाँवर पड़ी । गुरु महाराज ने प्रत्येक भाँवर के समान स्वभावतः वर और कन्या के चिरञ्जीवी होने का आशीर्वाद दे दिया । आकाश- वाणी ने कहा कि मुनिवर ! यह आपने क्या किया ? आपके पिता ब्रह्माजी ने तो कन्या की भाग्यरेखा में वैधव्य-योग लिखा है । महर्षि ने अपनी भूल का अनुभव किया । वहीं वरकन्या को एक मङ्गलवस्त्र से प्रावृत करके कहा कि जब तक हम लौटकर न आयें इस प्रावरण को न हटाया जाय और आप ब्रह्मलोक पहुँच गये अपने पिता श्रीब्रह्माजी के पास । ब्रह्मा ने अपना हाथ बढ़ा दिया पुत्र, इस हाथ से गलती हो गयी इसे काट दो । महाराज वसिष्ठ ने अपनी जिह्वा

बढ़ा दी और सूचित किया कि आप से गलती नहीं गलती मुझसे हुई जो बिना विचारे इस प्रकार की वाणी निकल गयी, अतः आप इस जिह्वा को काट दें। अन्त में सब ऋषि, देवता आदि ने मिलकर दोनों का समन्वय कराया ओर वरकन्या का चिरञ्जीवित्व स्वीकृत हुआ। तब वसिष्ठ महाराज ने आकर प्रावरण हटाया और दोनों ने ही चिरञ्जीवी होकर राज्य किया। यह कथा वृद्ध-परम्परा से प्रचलित है और गोस्वामीजी की— "दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउर जग जाना ॥ सो गोसांइ विधिगति जेहि छेंकी। सकइ को टार टेक जो टेकी ॥" (रा०मा० २।२५३।४) इन दोनों पङ्क्तियों की श्रुतार्थापत्ति से सिद्धि भी होती है। श्रीभरतजी कहते हैं कि— "बूझिय मोहि उपाय अब सो सब मोर अभाग। सुनि सनेहमय बचन गुरु उर उपजा अनुराग ॥" (रा० मा० २।२५४) मुनि बोले— "तात बात फुर राम-कृपा ही । रामबिमुख सिधि सपनेहु नाही ॥" (रा० मा० २।२५४।१) तात ! बात सच है, परन्तु यह सब श्रीराम-कृपा ही का प्रभाव है। रामविमुख प्राणी के लिए सपने में भी सिद्धि कहाँ सम्भव है। राम-लक्ष्मण अवध लौट जायें। उनके बदले में भरत और शत्रुघ्न वन में जायें। मुनिवर को यह बात भरत को बड़ी ही प्रिय लगी, परन्तु उसका स्वीकृत होना श्रीराम पर ही निर्भर है, परन्तु इससे तो श्रीभरत का निःस्वार्थ प्रेम तो व्यक्त ही होता है। श्रीभरत कहते हैं कि १४ वर्ष ही क्यों हम दोनों भाई जन्मभर कानन में वास करेंगे श्रीराम-लक्ष्मण अवध में लौटकर जायें। गुरुदेव ! सीताराम अन्तर्यामी हैं और आप सर्वज्ञ सुजान हैं। मैं हृदय से सत्य कहता हूँ। आपकी बात कार्यान्वित होनी चाहिये— "कानन करहुँ जनमभर बासू । एहिते अधिक न मोहि सुपासू ॥" (रा० मा० २।२५४।४) श्रीभरत की महिमा मुनिवर को अपार जलराशि सी प्रतीत होती है। मुनिवर की महामति का भी उसे पाना कठिन प्रतीत होता है— "भरत महामहिमा जलरासी । मुनिमति तीर ठाढ़ि अबलासी ॥ गा चह पार जतन हिय हेरा। पावति नाव न बोहित बेरा ॥" (रा०मा० २।२५५।१,२) ठीक ही है वास्तव में राम-भरत एक ही तो थे। भरतप्रेम में विह्वल मुनि ने श्रीराम से भी कहा— "सुनहु राम सर्वग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥" (रा० मा० २।२५५।४) आप सबके हृदय के भीतर अन्तर्यामीरूप से रहते हैं। आप सबके भाव कुभाव को जानते हैं। आपसे कुछ छिपा नहीं है। जिससे पुरजनों, माताओं तथा भरत का हित हो वही करें। भगवान् ने कहा कि मुनिवर ! सब उपाय तो आप के हाथ में है। प्रसन्नतापूर्वक आपकी आज्ञा का पालन करने और सत्य बोलने में ही सबका हित है। प्रथम तो मेरे लिए जो आज्ञा हो मैं आपकी सिख मान माथे पर रख वही करूँगा। उसके पश्चात् जिसको भी जो कहेंगे सभी सब प्रकार से आपकी सेवकाई करेगा—

८२८ रामायणमीमांसा एकविंश “सब कर हित रुख राउर राखे। आयसु किये मुदित फुर भाखे ॥ प्रथम जो आयसु मो कहँ होई। माथे मानि करौं सिख सोई॥” (रा० मा० २।२५६।२) यहाँ कितनी निष्ठा है गुरुभक्ति में और ‘बिनहि बिचार करिय हित मानी’ की भावना में परन्तु वसिष्ठ तो भरत के प्रेम के वशीभूत हो चुके थे। “कह मुनि राम सत्य तुम भाखा। भरत सनेह बिचार न रखा॥” (रा० मा० २।२५६।३) भरत का प्रेम देखकर मेरी मति विचारशून्यसी हो गयी है। “तेहि ते कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥” यहाँ कहाँ विचारों का संघर्ष है ? कहाँ कुतर्क है ? यदि है तो केवल कलियुगी कथक्कड़ के मन में। मुनि ने अपना निर्णय सुना दिया। “मोरे जान भरत रुचि राखी। जो कीजिय सो सुभ सिव साखी॥” अतः आप भरत की प्रार्थना को सुन फिर विचार कर के जो साधु-मत, लोक-मत और नृपनीति और निगम-संमत हो वैसा ही करें— “भरत बिनय सादर सुनिय करिय बिचार बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥” (रा० मा० २।२५७) भरत की गुरुभक्ति देखकर भगवान् परमानन्द निमग्न हो गये और श्रीभरत को धर्म-धुरन्धर और मन, वचन और कर्म से अपना अनन्यभक्त समझ लिया। जो निश्छलरूप गुरुभक्त होता है, वह भगवान् का अनन्यभक्त होगा ही— “गुर अनुराग भरत पर देखी। रामहृदय आनन्द बिसेखी ॥ भरतहि धरमधुरन्धर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥” (रा०मा० २।२५७।१) और बोले— ‘नाथ सपथ पित चरन दोहाई। भयउ न भुवन भरत सम भाई ॥ जे गुरपद अम्बुज अनुरागी। ते लोकहुं वेदहुं बड़भागी ॥ राउर जापर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥”(रा०मा० २।२५७।२,३) कितने मधुरभाव, कितने सुन्दर सम्बन्ध, मुनि के, श्रीराम के एवं श्रीभरत के कहीं किसी कुतर्क, हार- जीत, खण्डन-मण्डन का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। फिर भी न जाने किंकर किंकर्तव्य मूढ़ क्यों ? वास्तव में इस प्रसङ्ग में मानस की पङ्क्तियाँ ही सर्वोत्कृष्ट हैं। कुछ भी कहना सुनना उस महान् दिव्य रस में व्यवधान ही डाल सकता है। श्रीराम ने स्वीकार कर लिया कि भरत के कथन के अनुसार काम करने में सबकी भलाई है— “भरत कहहिं सो किये भलाई।” (रा० मा० २।२५७।४) इससे बढ़कर विश्वास और क्या हो सकता है ? मुनि ने कहा कि तात ! अब संकोच छोड़कर कृपासिन्धु अपने प्रियबन्धु से अपने हृदय की सब बात कहो। भरतजी तो गुरुजी और स्वामी इष्टदेव प्रभु राम की परम अनुकूलता पाकर बोले—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८९९ “कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि ते अधिक कहब मैं काहा ॥ मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधहुँ पर कोह न काऊ ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥ सिसुपनते परिहरेउँ न संगू। कबहुं न कीन्ह मोर मन भंगू ॥ मैं प्रभु कृपा रीति जिय जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥”(रा०मा० २।२५८।२-४) “महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कहै न बैन । दरसन तृपित न आज लगि प्रेम पियासे नैन ॥” (रा० मा० २।२५९) अब भरत को स्पष्ट भासित होता है— “गुर गोसांई साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥” (रा० मा० २।२५९।४) महाराज के सम्बन्ध में उनके प्रेमपन का ही स्मरण करते हैं— भूपति मरन प्रेमपन राखी ॥” (रा० मा० २।२६०।१) श्रीभरतजी अपने दैन्य, दोष तथा माँ कैकेयी के सम्बन्ध से ग्लानि का स्पष्टीकरण करते हैं । उसपर श्रीभगवान् कहते हैं कि तात ! मेरी दृष्टि में तुम्हारे समान त्रिभुवन में कोई पुण्यश्लोक नहीं हुआ । जो तुम्हारे ऊपर कुटिलता का आरोप करेगा उसके लोक-परलोक बिगड़ जायँगे । माँ कैकेयी के ऊपर भी वे ही लोग दोषारोपण करेंगे, जिन्होंने कभी गुरुओं एवं साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है । तुम निरर्थक तर्क मत करो । वैर और प्रेम छिपाने से भी नहीं छिप सकता । विहङ्गम आदि भी मुनिगणों के पास ही जाते हैं, बाधक बधिकों को देखकर भागते हैं । वर्तमान कठिनाइयों को तुम अच्छी तरह समझते हो । महाराज ने मुझे त्यागकर भी सत्य की रक्षा की और प्रेमपन के लिए प्रिय तन को तृण के तुल्य त्याग दिया। उन महाराज का वचन टालने से मन में सोच अवश्य है । परन्तु उससे भी अधिक तुम्हारा संकोच है। उसके ऊपर भी गुरु महाराज की आज्ञा है । अतः जो कुछ भी तुम कहोगे वही मैं करना चाहूँगा— “राखेउ राय सत्य मोहि त्यागी। तन परिहरेउ प्रेमपन लागी ॥ तासु वचन मेटत मन सोचू । तेहि ते अधिक तुम्हार सँकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥”(रा०मा० २।२६२।३,४) देवता लोग यद्यपि घबड़ा गये । परन्तु सुरगुरु ने उन्हें बताया कि श्रीभरत को तुम श्रीराम की छाया समझो । जैसे छाया काया का ही अनुसरण करती है। उसी तरह भरत श्रीराम की काया की छाया ही हैं । भरत के मन में भी यही बात आयी । “निज पन तजि राखेउ पन मोरा । छोहु सनेह कीन्ह नहि थोरा ॥” (रा० मा० २।२६४।४) और बोले— “कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥ गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटौ मलिन मन कलपित सूला ॥ अपडर डरेउ न सोच समूलें। रविहि न दोष देव दिशि भूलें ॥” (रा० मा०२।२६५।१,२) नाथ ! मेरी कल्पनाएँ मेरे अपडर का ही परिणाम थीं । किसी को दिग्भ्रम होता है तो वह उसी का दोष होता है सूर्य का दोष नहीं होता। उसी प्रकार मेरे अभाग का ही परिणाम था ।

८३० रामायणमीमांसा एकविंश "लखि सब विधि गुरु स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभ नहि मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिय सोई । जनहित प्रभुचित छोभ न होई ॥ जो सेवक साहिबहि सँकोची । निज हित चहहि तासु मति पोची ॥" (रा०मा० २।२६६।१,२) बस ऐसा ही भरत पर विश्वास वसिष्ठजी का था, ऐसा ही सुरगुरु का था और ऐसा ही प्रभु श्रीराम का विश्वास था । राम की काया की छायारूप भरत से ऐसी आशा की ही जा सकती थी । इसके बाद अनेक प्रस्ताव एवं परिस्थितियाँ आयीं । श्रीभरत के सम्बन्ध में कौशल्या की दृष्टि और ही विलक्षण है । वह श्रीसीता की माता से भरत के सम्बन्ध में कहती हैं कि मैं कभी राम की शपथ नहीं करती हूँ पर मैं भरत के सम्बन्ध में राम की शपथ कर के भी कह सकती हूँ कि भरत के शील, गुण, विनय एवं महत्ता, भ्रातृत्व, भक्ति, विश्वास और भलाई सब अनुपम एवं अवर्णनीय हैं । शारदा की मति भी उनके वर्णन में असमर्थ है । भला कहीं सीप के द्वारा महासमुद्र को उलचा जा सकता है । जैसे किसी निकष पर ही कनकभणि की परीक्षा हो सकती है, वैसे ही समय आने पर ही पुरुष की परीक्षा , होती है । उन्होंने मिथिलेश रानी से कहा कि आप अवसर पाकर मिथिलेश से कहिये— "रखिअहिं लखन भरत गवनहिं बन । जो यह मत माने महीपमन ॥ गूढ सनेह भरत मन माहीं । रहे नीक मोहि लागत नाहीं ॥" (रा०मा० २।२८२।१,२) श्रीजनकजी ने भी कौशल्या का सन्देश सुनकर कहा था कि श्रीभरत का व्यवहार सुवर्ण में सुगन्ध है एवं शशिसार की सुधा है— "मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजस सराहन लगे मुदित मन ॥" (रा०मा० २।२८६।१) "धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ यथामति मोर प्रचारू ॥ सो मति मोरि भरत महिमाहीं । कहै काहु छल छुअति न छाहीं ॥ भरत चरित कीरति करतूती । धरम शील गुन बिमल बिभूती ॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥" (रा०मा० २।२८६।२-४) "निरवधि गुन निरुपम पुरुष भरत भरत सम जानि । कहिय सुमेरु कि सेर सम कविकुलमति सकुचानि ॥" ( रा० मा० २।२८७ ) "भरत महा महिमा सुनु रानी । जानहिं राम न सकहिं बखानी ॥" (रा० मा० २।२८७।१) महाराज जनक विचार करते हैं कि यद्यपि धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार में मेरी मति की अव्याहत गति है तथापि भरतमहिमा की छाया का भी वह स्पर्श नहीं कर पाती । ठीक ही हैं क्योंकि वसिष्ठ महर्षि की भी मति भरतमहामहिमा जलराशि के सामने अपने को अबला समझती है । वस्तुतः श्रीभरत तात्त्विक दृष्टि से अव्याकृत तुरीय तत्त्व होते हुए भक्ति की दृष्टि से साक्षात् भगवत्प्रेमस्वरूप ही हैं । भरत की महिमा भगवान् राम इसी लिए जानते है कि वे सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी हैं । सर्वसाक्षी से कुछ भी छिप नहीं सकता । परन्तु वर्णन तो साक्षी का विषय नहीं होता, क्योंकि साक्षी में कर्तृत्व और वर्णयितृत्व नहीं हो सकता । श्रीकौशल्या के प्रस्ताव की चर्चा सुनयना रानी ने की थी । उसमें बहुत कुछ समन्वय की बात थी । परन्तु वे यह समझते हैं कि भरत की प्रीति और विश्वास दोनों ही अतर्क्य हैं । भरतजी स्नेह और ममता की सीमा हैं । क्योंकि—"निर्दोषं हि समं ब्रह्म" निर्दोष समत्व तो ब्रह्म में ही होता हैं— "राम ब्रह्म परमारथरूपा ।", "यद्यपि सम नहि राग न दोषू ॥"

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३१ परन्तु भरत के प्रेम पर उस समता के कारण कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि भरत ने परमार्थ-स्वार्थ सुखमार की ओर कभी स्वप्न में भी देखा नहीं। उनकी दृष्टि में तो रामपदारविन्द प्रेम ही साधन है वही सिद्धि भी है ऐसा स्वार्थ-परमार्थनिरपेक्ष कभी श्रीराम की आज्ञा के विपरीत सोच भी क्या सकता है। “देवि परंतु भरत रघुवर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥ भरत अवधि सनेह समता की। यद्यपि राम सीम समता की ॥ परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुं निहारे ॥ साधन सिद्धि रामपग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥” (रा०मा० २।२८७।३,४) श्रीजनकजी की दृष्टि में भी महाराज दशरथ की आज्ञा में कोई दोष नहीं था। वे सोचते हैं कि महाराज ने राम के लिए वनवास की आज्ञा प्रदानकर तृणतुल्य प्राणों को त्यागकर के अपने सत्यप्रेम को प्रमाणित किया। “रामहिं राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आप प्रिय प्रेम प्रमाना।।” (रा० मा० २।२९०।२) भरत की दृष्टि उनके ही निम्न वचन से विदित होती है-- “राखि राम रुख धरम ब्रत पराधीन मोहि जानि। सबकै संमत सर्वहित करिय प्रेम पहिचानी ॥” ( रा० मा० २।२९२ ) श्रीराम का रुख और धर्म तथा सत्यव्रत के पराधीन मुझे जानकर जो सर्वसम्मत हित हो वही करें। इससे स्पष्ट है कि श्रीभरत को किसी नये धर्म, नये पन्थ का प्रचार अभीष्ट नहीं था। महाराज दशरथ और महर्षि के वेदादिशास्त्र-सम्मत सिद्धान्त से भिन्न उनका कोई पृथक् सिद्धान्त नहीं था। उनकी दृष्टि में स्वार्थ और स्वामि-सेवा में धर्म का वैसा ही वैर है जैसे अन्ध प्रेम और प्रबोध में विरोध होता है। 'प्रभु पित मात सुहृद गुरु स्वामी । पूज्य परमहित अन्तरयामी ॥ सरल सुसाहिब सील निधानू । प्रनतपाल सर्वज्ञ सुजानू ॥ समरथ सरनागत हितकारी । गुनग्राहक अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाइंहि सरिस गोसांई । मोहि समान मैं साँइ दोहाई ॥ प्रभु पित बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाज सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिय अमरपद माहुर मीचू ॥ रामरजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ तो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई । प्रभु मानी सनेहसेवकाई ॥” (रा०मा०२।२९६।१-४) “कृपा भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर । दूषन भे भूषन सरिस सुजस चारु चहु ओर ॥” (रा० मा० २।२९७) “राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगतबिदित निगमागम गाई ॥” (रा० मा० २।२९७।१) “सोक सनेह कि बाल सुभायें । आयउँ लाय रजायसु बायें ॥ तबहुं कृपाल हेरि निज ओरा। सबहिं भांति भल मानेउ मोरा ॥ देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥ बड़े समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ी चूक साहिब अनुरागू ॥ नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥” (रा० मा० २।२९८।१-४)

८३२ रामायणमीमांसा एकविंश "सुहृद सुजान सु साहिबहिं बहुत कहब बड़ि खोरि । आयसु देइय देव अब सबई सुधारी मोरि ॥" (वा० रा० २।२९९) "प्रभु पद पदम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सींव सोहाई ॥ सो करि कहउँ हिये अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की ॥ सहज सनेह स्वामिसेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ आज्ञा सम न सुसाहिबसेवा । सो प्रसाद जनु पावै देवा ॥" (रा०मा० २।२९९।१,२) उपर्युक्त भरत के वचन गङ्गाजल के तुल्य निर्मल, निश्छल तथा परम पवित्र हैं। उनका अलग से कुछ अभिप्राय वर्णन करना कठिन है। इनमें किसी के प्रति कोई आक्षेप नहीं है। भरत के परमपवित्र दैन्यपूर्ण भक्तिसुधासमुद्र में नयी धर्मव्याख्या का स्थान ही कहाँ है ? वे समाज सहित प्रभु के समीप आने को भी अपनी धृष्टता, आज्ञापालन, सेवा में चलना मानते हैं और चारों पुरुषार्थों से विमुख होकर स्वार्थ एवं छलरहित स्वामी की सेवकाई को ही सर्वोत्कृष्ट धर्म मानते हैं। उनकी दृष्टि में सर्वोत्कृष्ट सेवा स्वामी की आज्ञा का पालन करना ही है। उन्होंने तीर्थराज प्रयाग से भी तो यही कहा था कि— "अर्थ न धर्म न काम रुचि गति न चहौं निरबान । जनम जनम रति रामपद यह बरदान न आन ॥" (रा० मा० २।२०३) श्रीराम प्रभु ने भरत के सम्बन्ध में जो कहा है वह उनके अनुरूप ही है— "तात भरत तुम्ह धरमधुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥" (रा० मा० २।३०२।४) श्रीराम के दरबार में धर्मधुरीण के रूप में भरत प्रसिद्ध हैं। उनके अनुसार ही वे लोक और वेद दोनों के ही ज्ञाता और प्रेम में परम प्रवीण हैं। अतएव श्रीराम कहते हैं कि— "जानहु तात तरनिकुल रीति । सत्यसन्ध पित कीरति नीती ॥ क्या श्रीराम के इन वचनों से महाराज दशरथ का किञ्चित् भी अपकर्ष प्रतीत होता है ? उनमें क्रोध, लोभ या काम का आवेश सिद्ध होता है ? वे भरत से आशा रखते हैं कि वे तरणिकुल की रीति और सत्यसन्ध पिता दशरथ की कीर्ति का पालन करेंगे। "तुम्हहिं बिदित सबही कर करमू । आपन मोर परम हित धरमू ॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा । तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥" (रा० मा० २।३०३।२) श्रीराम श्रीगुरु वसिष्ठ की कृपा से ही सबका कल्याण समझते हैं— "तात तात बिनु बात हमारी । केवल गुरुकुल-कृपा सँभारी ॥" (रा० मा० २।३०३।३) "राजकाज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम । गुरुप्रभाव पालिहि सबहिं भल होइहि परिनाम ॥" (रा० मा० २।३०४) "सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुरुप्रसाद रखवारा ॥" (रा० मा० २।३०४।१) जब मर्यादापुरुषोत्तम वेदशास्त्रपालक भगवान् राम का गुरु के सम्बन्ध में ऐसे पवित्र भाव हैं तो श्रीराम परछाईंस्वरूप श्रीभरतजी का वैसा भाव स्वाभाविक ही है। "मात पिता गुरु स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥" (रा० मा० २।३०४।१)

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३३ माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा सकल धर्मरूप धरणी को धारण करनेवाला भगवान् शेष है। अतः उन सबकी आज्ञा पालन करना ही सब धर्मों का आधार है। "सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुलपालक होहू ।।" (रा० मा० २।३०४।२ ) कितनी मधुर कितनी सुन्दर आज्ञा है या प्रिय परामर्श है। हे तात, उस आज्ञा का तुम भी पालन करो हम से पालन कराओ अर्थात् हमारे उस आज्ञापालन में मदद करो, सहयोगी बनो और ऐसा करके इस तरणिकुल सूर्यवंश की मर्यादा का रक्षण करो। गुरुजनों की आज्ञा का पालन करना साधक के लिए समस्त सिद्धियों को देनेवाली कीर्ति, सुगति और भूति (ऐश्वर्य ) की त्रिवेणी है। यद्यपि इसमें कठिनाई है, संकट है एवं प्रियवियोग आदि संकट सहना पड़ेगा। परन्तु इसमें सबका हित होगा। अतः इस आयी हुई विपत्ति को सब भाइयों को बाँटकर सह लेना चाहिये । चौदह वर्ष तक के लिए तुम्हारे लिए बड़ी कठिनाई है। तुम्हें परम मृदु जानते हुए भी यह कठोर बात कहना इस कुसमय में अनुचित नहीं । कुसमय और कुठाँव में सुबन्धु ही सहायक होता है। तलवार का घाव लगने पर अपने हाथ को ही ओड़ना पड़ता है। सेवक हाथ, पैर तथा नयन के समान होता है। स्वामी मुख के समान होता है। सुकवि ऐसी प्रीति की रीति की सराहना करते हैं— "बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हींह अवधि भरि अति कठिनाई ॥ जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमय तात न अनुचित मोरा ॥ होंहिं कुठावं सुबंधु सहाये । ओड़िअहि हाथ असिनिहुँ के धाये ।।" (रा०मा० २।३०४।३,४) "सेवक कर पद नयन से मुख से साहिब होइ । तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकवि सराहहिं सोइ ।।" (रा० मा० २।३०५ ) प्रभु की प्रेमामृतसमुद्रमयी वाणी को सुनकर सम्पूर्ण समाज सनेह शिथिल होकर समाहित हो गया। ज्ञान- विज्ञान की अधिष्ठात्री महाशक्ति सरस्वती ने चुप्पी साध ली । श्रीभरतजी को परम संतोष हुआ । उससे स्वामी के सांमुख्य का और दुःखदोष के वैमुख्य का अनुभव किया, मुख प्रसन्न हो गया, मन का विषाद मिट गया। मानो मूँगे को गिरा का प्रसाद मिल गया और बोल पड़े— "नाथ भयउ सुख साथ गये को । लहेउँ लाहु जग जनम भये को ॥ अब कृपाल जस आयसु होई । करौं सीस धरि सादर सोई ।।" (रा०मा० २।४०५।३,४) इस प्रकार गोस्वामीजी के मानस में महाराज दशरथ के प्रति महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, मन्त्रिपरिषद्, परिजन एवं पुरजन सहित श्रीभरत की तथा श्रीराम की परम श्रद्धा प्रकट होती है। इसी प्रकार श्रीवसिष्ठ एवं उनकी आज्ञाओं के प्रति श्रीभरत तथा श्रीराम का परम विश्वास, परम श्रद्धा परिलक्षित होती है। वेदादिशास्त्रों एवं तदुक्त धर्म में तो सब की ही परम श्रद्धा है। इसी तरह वेदस्वरूप के सम्बन्ध में भी कई लोगों की भ्रान्तिपूर्ण धारणा है। "बेद बिदित तेहि दशरथ नाऊ।" (रा० मा० १।१८७।४ ) "राम नाम कर अमित प्रभावा । बेद पुरान उपनिषद गावा ।।" (रा० मा० १।४५।१ ) उनके अनुसार "उपर्युक्त पङ्क्तियों में वेद शब्द का अर्थ आजकल के प्रसिद्ध वेदों का बोध नहीं है। उनके अनुसार अब आधुनिक काल में वेदों का जो स्वरूप उपलब्ध है, उसमें दशरथ या राम नाम की महिमा तो दूर नामोल्लेख भी नहीं है। कुछ आधुनिक टीकाकारों ने वेदमन्त्रों में दशरथ, राम और सीता आदि नामों के उल्लेख का समर्थन किया है। किन्तु ऐसे अर्थ शाब्दिक खींचतान के द्वारा किये गये लगते हैं। १०५

८३४ रामायणमीमांसा एकविंश वस्तुतः गोस्वामीजी वेदों का ठीक उतना ही स्वरूप नहीं मानते हैं, जितना ग्रन्थों के रूप में हमें आज उपलब्ध है। वे “रामायन सतकोटि अपारा” कहते हुए जिस मान्यता की स्थापना करते हैं। भले ही सौ करोड़ रामायण आज उपलब्ध नहीं हैं, वही दृष्टि उनकी वेदों के प्रति भी है। भगवान् के निःश्वास से प्रादुर्भूत वेद भगवान् का स्वरूप ही है। वह ज्ञानमय वेद असीम और अनन्त हैं। समुद्र में जिसे जो पाना होता है, वह उससे अपनी आवश्यकता भर ले लेता है। इसी प्रकार वेद की स्थिति हैं। यज्ञों की कर्मकाण्ड-प्रक्रिया में जिन वेदमन्त्रों का प्रयोग है, परम्परा से उनका उपयोग होते रहने से हमें आज वे ही उपलब्ध हैं। हम उनको ही पूर्ण प्रामाणिक मान बैठे हैं।” उक्त कथन अत्यन्त असङ्गत ही है। “अनन्ता वै वेदाः” के अनुसार वेद अनन्त हैं। भगवान् के निःश्वास- भूत होने से अकृत्रिम हैं और अपास्त-समस्तपुंदोषशङ्काकलङ्क होने से परम-प्रमाण हैं। जैसे प्राण प्राणवान् का स्वरूप ही माना जाता है, वैसे ही निःश्वास निःश्वासवान् से अभिन्न हैं। सच्चिदानन्द भगवान् में सत्, चित् और आनन्द तीन रूप प्रतीत होते हैं। यद्यपि सत् की स्वप्रकाशता ही उसकी चिद्रूपता है। सच्चित् की सर्वोपद्रवशून्यता ही आनन्दरूपता है। फिर भी प्रातीतिक भेद के अनुसार सदंश से ज्ञेय प्रपञ्च तथा चित् से वृत्तिविशिष्ट ज्ञान उत्पन्न होता है। उसी चित् से ही सम्पूर्ण वाङ्मयप्रपञ्च की उत्पत्ति होती है। अनन्त संवित् ही शब्दब्रह्म है। उसका ही मूलरूप प्रणव है। प्रणव का ही व्याख्यानभूत अनन्त वेद है। फिर भी वह ज्ञान- मय असीम और अनन्त है। वेद ईश्वर के समान ज्ञानमय असीम और अनन्त ही हैं— “वेदो नारायणः साक्षात्” (भाग० ६।१।४० ), “वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्” (भाग० ११।३।४३) इन वचनों का इतना ही अर्थ है कि वे ईश्वर के निःश्वासभूत होने से ईश्वर के अंश हैं। यद्यपि वैयाकरणों और वेदान्तियों के अनुसार सभी शब्द एवं वेदशब्दराशि सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होकर प्रलय में नष्ट हो जाती है तथापि ईश्वरीय शक्तिरूप से वे प्रलयकाल में विद्यमान रहते हैं। तभी पूर्वकल्पीय आनुपूर्वी के समान ही उत्तरकल्पीय आनुपूर्वी उत्पन्न होती है। शक्ति की दृष्टि से और अविच्छिन्न पारम्पर्य की दृष्टि से वेदवाणी अनादि और अनन्त मानी जाती है। शब्द और वेद और शब्दराशि स्वरूप से सृष्टि से लेकर प्रलय पर्यन्त स्थायी होने से ही नित्य कही जाती हैं। यह नित्यता आपेक्षिक ही है। इसी लिए वेदों की वेदान्तरीति से उत्पत्ति होती है। उत्पन्न सभी पदार्थ कारण से अनन्य होते हैं। तभी वेद भी परमेश्वर से अनन्य हैं। अतः ब्रह्म की अद्वितीयता सिद्ध होती है। अभिधानात्मक प्रपञ्चोपादानानुकूल शक्त्यवच्छिन्न संविदानन्द ब्रह्म के विवर्त होने से ही शब्दों को ज्ञानात्मक कहा जा सकता है। स्वरूपतः शब्द ज्ञान के जनक हैं, ज्ञानरूप नहीं हैं। परन्तु ब्रह्म किसी से उत्पन्न नहीं होता है। उसकी नित्यता आपेक्षिक नहीं है, किन्तु वास्तविक है। वह नित्य ज्ञानरूप हो सकता है। भगवान् प्रतिपाद्य हैं और वेद प्रतिपादक हैं, प्रतिपाद्य नहीं। यदि परमात्मरूप ही वेद हैं तो वे भी परमात्मा के समान ही परोक्ष एवं अग्राह्य रहेंगे। यदि वेद स्वयं ही अनुपलब्ध होंगे तब उनसे ब्रह्म का कैसे उपलम्भ हो सकेगा। हाँ, अनन्त वेद ब्रह्म, सूर्यादि देवताओं के लिए ही ग्राह्य हैं। मानवबुद्धिग्राह्य वेद की श्रीभागवत, महाभाष्य, सीतोपनिषद् आदि के अनुसार ११३१ ग्यारह सौ इकतीस या ११७२ ग्यारह सौ बहत्तर शाखाएँ मानवग्राह्य हैं। आज उनमें से किसी न किसी रूप में नौ या दस शाखाएँ मिलती हैं। साथ ही केवल मन्त्र ही नहीं, किन्तु मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं। ब्राह्मण में ही आरण्यक एवं उपनिषदें भी अन्तर्भूत हैं। वेद केवल मन्त्रभाग ही नहीं हैं, किन्तु मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों ही वेद हैं। उपलब्ध वेदों से भिन्न समुद्रतुल्य कोई वेद उपलब्ध नहीं है। अनुपलब्ध वेद को तो हम किसी विषय के प्रमाण के रूप में नहीं

उपस्थित कर सकते हैं। अन्यथा तो कोई भी किसी ग्रन्थ या किसी बात को वेदसम्मत कह सकता है। फिर वेद- सम्मत क्या है क्या नहीं इसका निर्णय असम्भव ही हो जायगा। अतः परम्परा से प्राप्त मन्त्र और ब्राह्मण भाग को ही वेद माना जाता है और उसी के आधार पर धर्म और ब्रह्म का विचार किया जाता है। शतकोटि रामायण की मान्यता तुलसी द्वारा स्थापित नहीं, किन्तु वह पुराणों द्वारा स्थापित है— “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।” तुलसी ने उसी का प्रतिपादन किया है। यह भी कहना गलत है कि “पौराणिक परम्परा में पराशरपुत्र कृष्णद्वैपायन को 'व्यास' उपाधि दी गयी है। व्यास का अर्थ विस्तार करनेवाला है। उन्होंने लोककल्याण के लिए वेदों का विस्तार करके पुराणों के रूप में सुलभ कर दिया।” क्योंकि पुराणों को वेद परम्परा का अङ्ग मान लेने पर गोस्वामीजी की सैद्धान्तिक यथार्थता सिद्ध हो जाती है, क्योंकि पुराणों में ही वेदव्यास का अर्थ अनेकशाखोपबृंहित मन्त्र-ब्राह्मणात्मक सम्पूर्ण वेदराशि को शाखाभेद से और मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग रूप से उनका विभाजन करना ही हैं। शुक्लयजु के मन्त्र और ब्राह्मण का स्पष्टतया विभाजन है। इसी लिए वह शुक्ल है। कृष्णयजु में शाखा- भेद होने पर भी मन्त्रसंहिता में भी ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणभाग में भी मन्त्र हैं। इसी लिए उसे कृष्ण कहा जाता है। पुराण वेदों का विभाजन नहीं है, किन्तु वेदों का उपबृंहण हैं। पुराणनिर्माता होने के कारण कृष्णद्वैपायन वेदव्यास नहीं, किन्तु वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास हुए हैं। इसी लिए मन्त्र-ब्राह्मणरूप वेदों की पौर्वापर्यरूप आनुपूर्वी नहीं बदलती। सभी कल्पों में मन्त्र और ब्राह्मण एक जैसे ही होते हैं। उनकी आनुपूर्वी में रद्दोबदल नहीं होता है। परन्तु भिन्न-भिन्न कल्पों में पुराणों की आनुपूर्वी बदल जाती है। आठ प्रकार के ब्राह्मणों में आनेवाले इतिहास और पुराण तो वेद ही हैं। उसी दृष्टि से उन्हें भी ईश्वर का निःश्वास कहा गया है—“अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपानिषदः श्लोकाः सूत्राणि” (बृ० उ० २।४।१०) किन्तु छान्दोग्य में वर्णित इतिहास-पुराण विष्णु, पद्मादि पुराण हैं। वे ईश्वर के निःश्वास नहीं हैं, क्योंकि वहाँ 'निःश्वसितम्' पाठ नहीं है। मानस में वर्णित वेदस्तुति एवं भागवत की वेदस्तुति से यह कदापि नहीं सिद्ध होता है कि उसी रूप में वह वेदमन्त्रों में विद्यमान है। किन्तु वेदों के अधिष्ठाता देवताओं या अधिष्ठात्री महाशक्तियों ने भगवान् की स्तुति की है। श्रीभागवत की वेदस्तुति के टीकाकारों ने टीकाओं में स्पष्ट कर दिया है—कौन कौन से वेदांशों ने किन किन अंशों को कहा है। विशेषतः श्रीधर स्वामी ने अपनी टीका में उन उन श्रुतियों का उल्लेख किया है। इस दृष्टि से मन्त्रों में, ब्राह्मणों में और उपनिषदों में दशरथ, राम, सीता आदि का स्पष्ट वर्णन है। उसे शब्दों की खींचा- तानी नहीं कहा जा सकता है। यों तो वेदों के अनेक कठिन मन्त्रों के स्वाभाविक अर्थ में अनभिज्ञों को खींचा-तानी प्रतीत हो सकती है। उक्त बातों का विवरण इसी ग्रन्थ में अध्याय २ पर देखा जा सकता है। कोई भी मनुष्य चाहे ऋषि हो चाहे देवता उन्हें वेदों में संकोच और विकास करने का अधिकार नहीं होता। मनुष्य, ऋषि तथा देवता वेदों का व्याख्यान या अर्थविश्लेषण कर सकते हैं। परन्तु मन्त्रों या ब्राह्मणों की पंक्तियों में हेरफेर, रद्दोबदल नहीं कर सकते। हाँ, यह हो सकता है कि वेदों से उनका अभिप्राय किसी ने न समझा हो तो उसे पुराणों से उनका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। वेदों में ही इन्द्रशब्द का एक अर्थ परमेश्वर ही है—

८३६ रामायणमीमांसा एकविंश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” (ऋ० सं० १।१६४।४६) अन्यत्र देवताविशेष इन्द्र है। प्रथम की शक्ति निःसीम है, दूसरे की शक्ति सीमित है। पुराणों में तथा मानस में इन्द्र का स्मरण देवताविशेष के रूप में ही किया गया है। पुराणों में ही अनेक स्थलों में परमेश्वर के रूप में भी इन्द्र का स्मरण हो गया है। यह ठीक है कि तुलसीदास का रामचरितमानस किसी सम्प्रदाय विशेष का ग्रन्थ नहीं है। किन्तु वह तो मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, पुराण तथा रामायण का अनुसरण करनेवाला ग्रन्थ है। जैसे उन्हीं वेदादि ग्रन्थों के आधार पर विभिन्न सम्प्रदाय अपना अपना सम्प्रदाय सिद्ध करते हैं, उसी तरह तुलसी के मानस से भी भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्त सिद्ध होते हैं। अतएव पुराणादि के समान ही सभी सम्प्रदाय के लोग रामचरितमानस का आदर करते हैं। परन्तु उन उन सम्प्रदायों के महान् महान् आचार्य हुए हैं और उन उन सम्प्रदायों में ईश्वरतुल्य पूज्य भी हुए हैं। परन्तु अन्य सम्प्रदायों में उनके ग्रन्थों की और उनकी उतनी मान्यता नहीं हो सकी है। सम्प्रदाय दर्शनों का अनुसरण करते हैं। उन्हें अनेक विषयों में अपना निर्णय देना पड़ता है। अतः उन निर्णयों का विरोध होना सम्भव है। जैसे सांख्य, योग, न्याय, वेदान्त, पूर्वोत्तरमीमांसा आदि के मतभेद होते हैं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि का कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं है। भले संविधान या कानूनों की विभिन्न धाराओं के विभिन्न न्यायवादी विभिन्न अर्थ करते हों फिर भी उन धाराओं का निश्चित अर्थ होता ही है। उसी का निर्णय करना न्यायालय का कर्तव्य होता है। व्यास, वसिष्ठ आदि के भी अपने निश्चित सिद्धान्त होते ही हैं। इस दृष्टि से तुलसी की भी कुछ निश्चित धारणाएँ हैं ही। यह कहना भी गलत है कि “इदमित्थं कहि जात न सोई” (रा० मा० १।१२०।१) यह अर्धाली ही उनकी मान्यता का सूत्र है।” क्योंकि इस रूप में तो यह भी कहा जा सकता है कि उनके राम भी पूर्ण सत्य नहीं हैं। वे भी सीमित ही सत्य हैं। परन्तु यह कथन श्रुति, स्मृति और युक्ति से विरुद्ध ही है। ब्रह्म का अवतार क्यों होता है केवल इसी अंश के लिए उक्त अर्धाली ठीक है, क्योंकि अनेक हेतु हो सकते हैं। यद्यपि ईश्वर मन और वाणी का विषय नहीं है। कोई तार्किक तर्क के द्वारा उसके विषय में ठीक अनुमान नहीं कर सकता। इसलिए ईश्वर के विषय में जो कुछ भी कहा जाय वह इदमित्थं (यह ऐसा ही) के रूप में सम्भव नहीं। तथापि वेदादि शास्त्रों के द्वारा तथा वेदादिशास्त्रानुसारी तर्कों के द्वारा भगवान् के वास्तविक रूप को साधनचतुष्टयसम्पन्न भगवदनुगृहीत साधक अवश्य ही जानता है। निःसंशय ज्ञान ही मुक्ति का हेतु है— “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” परमेश्वर के परम सत्यरूप का साक्षात्कार करके ही प्राणी मृत्यु का अतिक्रमण कर सकता है— ‘’नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’’ अन्य कोई भी पन्था भगवत्पदप्राप्ति का है ही नहीं। “संशयात्मा विनश्यति” संशयशील प्राणी नष्ट हो काता है। सीमित आपेक्षिक संशयात्मक ज्ञान अनर्थ का हेतु होता है। एक वस्तु में एक ज्ञान ही यथार्थ है। रज्जु में सर्प, धारा, माला, भूछिद्र आदि अनेक ज्ञान होते हैं, परन्तु उनमें समझौता संभव नहीं है। रज्जुज्ञान ही यथार्थ है और सब ज्ञान अयथार्थ हो हैं। ईश्वर मन और वाणी का विषय नहीं है। इसका अर्थ यही है कि ब्रह्म फलव्याप्ति का विषय नहीं है। वृत्त्यभिव्यक्त चैतन्य के द्वारा जैसे घटादि का प्रकाश होता है वैसे मनोवृत्त्यिव्यक्त चैतन्य के द्वारा ब्रह्म का प्रकाश नहीं होता। क्योंकि वह स्वप्रकाश है। स्वप्रकाश के लिए अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं होती है। परन्तु मनोवृत्ति द्वारा ब्रह्मावरक अज्ञान की निवृत्ति तो होती है। इसी लिए जैसे—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३७ “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।” (तै० उ० २।३) “यन्मनसा न मनुते, यद्वाचा नाभ्युदितम्” आदि श्रुतियों में ब्रह्म को मन, बुद्धि तथा वाणी का अविषय कहा गया है। वैसे ही “मनसैवानुद्रष्टव्यम्”, “दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या” आदि श्रुतियों में यह भी कहा गया है कि ब्रह्म मन के द्वारा जाना जाता है। श्रेष्ठ बुद्धि से ब्रह्म-दर्शन होता है। यह भी एक समन्वय है कि शास्त्राचार्योपदेशरूप संस्कार से संस्कृत मन या बुद्धि ब्रह्म को जानने में हेतु है। तद्रहित बुद्धि ब्रह्म-दर्शन में असमर्थ है। इसी तरह अभिधा शक्ति के द्वारा ब्रह्मवाणी या वेद ब्रह्म का बोध नहीं करा सकते । क्योंकि जिसमें जाति, गुण और क्रिया द्वारा या सम्बन्ध द्वारा अथवा स्वरूप द्वारा शब्द के साथ संकेतग्रह सम्भव है, उसी का बोध शब्द से हो सकता है। ब्रह्म रूपादिराहित होने से चाक्षुषादि प्रत्यक्ष का अविषय होने से स्वरूपेण निर्देशार्ह नहीं है। अतः उसका किसी शब्द के साथ सम्बन्धग्रह होना सम्भव नहीं है। डित्थः, डवित्थः आदि शब्दों की प्रवृत्ति स्वरूप से निर्देशयोग्य काष्ठमय मृग या काष्ठमय हस्ती में होती है ! ब्राह्मण, गौ आदि में जाति के निमित्त से शब्द की प्रवृत्ति होती है। नीलमुत्पलम् आदि में शब्द गुण के आधार पर तथा पाचक आदि शब्द क्रिया के बल पर प्रवृत्त होते हैं। धनी, गोमान् आदि शब्द सम्बन्ध के आधार पर प्रवृत्त होते हैं । समुदाय-शक्ति के आधार पर शब्द की प्रवृत्ति रूढ़िवृत्ति कही जाती है। अवयव-शक्ति से शब्द की प्रवृत्ति को योगवृत्ति कहते हैं। उभय योग से प्रवृत्ति को योगरूढ़ कहते हैं। गौः, ब्राह्मणः आदि शब्द रूढ़ शब्द हैं। पाचकः आदि योग शब्द हैं। पङ्कज आदि योगरूढ़ शब्द हैं । ब्रह्म में जाति, गुण, क्रिया का सम्बन्ध न होने से किसी तरह भी शब्दों की अभिधा वृत्ति से ब्रह्म में प्रवृत्ति नहीं होती है। सम्बन्ध न होने से लक्षणा वृत्ति से भी ब्रह्म में किसी शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिए कहा गया है कि कोई भी वाणी या वेद भी ब्रह्म का प्रकाशन नहीं कर सकते हैं। परन्तु सिद्धान्ततः तात्पर्या- नुपपत्तिमूलक लक्षणा के द्वारा आध्यासिक सम्बन्धवाले ब्रह्म में वेद और वेदान्त शब्दों की प्रवृत्ति होती है। इसलिए “सर्वे वेदाः यत्पदमामनन्ति”, “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” (गीता १५।१५) इत्यादि वचनों से ब्रह्म को वेदवेदान्त- वेद्य माना ही गया है। “मन्तव्य” श्रुति के द्वारा ब्रह्म में वेदानुसारी तर्क का भी अवकाश है ही। हाँ, अवतार के कारणों में तो अनेक कारण हो सकते हैं। अतः अमुक ही कारण है, यह नहीं कहा जा सकता है। वहाँ किसी को अकारण या सीमित सत्य कहने की आवश्यकता नहीं है । वैसे सिद्धान्त में भी अनेक वस्तुएँ सीमित सत्य कोटि में ही आती हैं। बल्कि यों कहना चाहिये कि परात्पर परब्रह्म भगवान् को छोड़कर इतर वस्तुएँ सीमित सत्य में ही हैं। विज्ञान के साथ वेदादि शास्त्रों के सिद्धान्त का मेल जितने अंशों में मिलता हो ठीक है। परन्तु विज्ञान का अभी तक कोई भी सिद्धान्त अन्तिम सिद्धान्त नहीं है। सर आइजक, न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त अन्तिम माना जाता रहा था वह आज धराशायी हो गया है। आज वह पूर्ण रीति से खण्डित हो चुका है। डार्विन, हैकल, स्पेंसर आदि के विकासवाद का सिद्धान्त भी पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। अतः विज्ञान के पीछे वेदादि शास्त्रों को चलाने की बात वैसे ही है जैसे किसी सभ्य पुरुष को किसी अन्धे और उन्मत्त भैंसे की पूंछ पकड़कर उसे उसके गन्तव्य स्थल पर पहुँच जाने का आश्वासन देना है। विज्ञान अल्पज्ञ एवं अल्पशक्तिमान् व्यक्तियों के दिमाग का परिणाम है। उनमें अनेक त्रुटियाँ हो सकती हैं। पूर्व काल में जिस गणित के आधार पर सम्पूर्ण यान्त्रिक व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं। आज उसमें भी परिवर्तन हो

८३८ रामायणमीमांसा एकविंश गया है। यान्त्रिक आज भी प्रचलित है ही। इस विषय की विशेष जानकारी के लिए मेरे "मार्क्सवाद और राम- राज्य" ग्रन्थ का विकासवाद देखें। वेद सर्वज्ञ ईश्वर के निःश्वास होने से सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं। वेदोक्त साधनों के अनुष्ठान से ऋषि-महर्षि भी सर्वज्ञकल्प हुए हैं। उनके ज्ञान और विज्ञान अपूर्ण नहीं हैं। तुलसी का मानस उन्हीं शास्त्रों का सार है। वह तुलसी का निजी विचार नहीं है। यह मानस की अनेक पङ्क्तियों से सिद्ध है। संसार के सभी सत्य माया के भीतर की चीजें हैं। माया स्वयं ही भगवान् की सत्ता से ही सत्य प्रतीत होती है। जिस परम सत्य भगवान् से जड़ माया सत्यवत् प्रतीत होती है, वह भगवान् ही अन्तिम सत्य हैं। उनको बिना जाने मिथ्या जगत् एवं उसकी मूलभूत माया भी सत्य प्रतीत होती है। वही पारमार्थिक सत्य वस्तु है। अतएव यह कहना सर्वथा असत्य है कि "गोस्वामीजी किसी भी सिद्धान्त को अङ्गीकार करके तात्कालिक समस्या का समाधान कर लेते हैं। पर वे किसी भी सिद्धान्त को पूर्ण सत्य का पद देने को प्रस्तुत नहीं हैं", क्योंकि यह तो अवसरवादिता ही है। 'गोस्वामीजी किसी मत विशेष के घेरे में नहीं जाते', यह कहना भी अज्ञता ही है। क्योंकि गोस्वामीजी वेदवेदान्त-सिद्धान्त के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। श्रीराम उनकी दृष्टि में भी परम सत्य हैं। पूर्ण सत्य हैं। जो ऐसा नहीं मानता वह नास्तिक, अज्ञ और अभागा है। उसके मनमुकुर में पाप की काई लगी है, यह उनकी ही पङ्क्तियों से सिद्ध है। कहा जाता है— "कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ जुगल प्रबल कोउ माने। तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम तब आपन पहचाने ॥" इस पङ्क्ति में गोस्वामीजी कहते हैं कि कुछ लोग सृष्टि को मिथ्या, कुछ लोग सत्य एवं कुछ लोग सत्या- सत्य के रूप में प्रतिपादित करते हैं। पर ये तीनों भ्रम हैं।" परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्रानभिज्ञता के कारण ही उपर्युक्त भ्रम है। पङ्क्तियों का अर्थ आगे स्पष्ट होगा। "शून्य भोति पर चित्र रङ्ग नहि तनु बिनु लिखे चितेरे। धोये मिटै न मरइ भीति दुख पाइय यहि तनु हेरे॥ रविकर नीर बसे अतिदारुण मकररूप तेहि माहीं। वदनहीन सो ग्रसे चराचर पान करन जे जाहीं ॥ इन पङ्क्तियों का भी निष्कर्ष यही है कि यद्यपि दुनिया में बिना आधार के चित्र का उल्लेख नहीं हो सकता। बिना रङ्ग के और बिना शरीर के कोई चित्रकार चित्र नहीं लिख सकता है। चित्र धुल भी सकता है परन्तु जो चित्र धोने से भी नहीं धुल सकता है। परमेश्वर रूपी चित्रकार ने बिना आधार के ही जगच्चित्र का निर्माण किया है और बिना रङ्ग के यह चित्र बना है। चित्रकार को इसके निर्माण के लिए तन की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि वह तो बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है, बिना पैर के चलता है एवं बिना हाथ के नाना प्रकार के कर्म करता है। तन के बिना स्पर्श और घ्राण के विना सर्वविध गन्धों को ग्रहण करता है— "पग बिन चले सुने बिन काना। कर बिनु कर्म करे बिध नाना ॥ आनन रहित सकल रसभोगी। बिन बाणी बक्ता बड़ योगी ॥" (रा०मा० १।११७।३) तत्त्वज्ञान के बिना यह जगत् किसी के मिटाये मिट भी नहीं सकता। यह सब भी उनकी निजी बात नहीं है। किन्तु श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है। श्रुति भी यही कहती है—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३९ “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ॥” ( श्वेताश्व० उ० ३।१९ ) इसी बात को व्यतिरेकमुखेन शिवमहिम्न में कहा गया है ! ईश्वर किस प्रकार की चेष्टा द्वारा, किस शरीर से, किस उपाय से, किस आधार पर एवं किस उपादान से विश्व का निर्माण करता है, इत्यादि कुतर्क कुछ हतबुद्धि लोगों को जगत् में व्यामोह फैलाने के लिए मुखरित ( वाचाल ) करते हैं । प्रकृत में केवल सजातीय, विजातीय तथा स्वगत भेद से शून्य एक अद्वितीय स्वप्रकाश भगवान् से भिन्न होकर कुछ भी नहीं है । आधार के बिना, उपादान के बिना, शरीर के बिना और चेष्टा के बिना जगत् कैसे बन सकता है ? अतर्क्य ऐश्वर्यवाले कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ भगवान् में उक्त दुस्तर्क अनवसरग्रस्त हैं। उनकी अघटित- घटनापटीयसी माया सब कुछ कर सकती है और स्वयं मिथ्या होने पर भी उनकी सत्ता से सत्य होकर सत्य प्रपञ्च निर्माण बिना आधार आदि के कर सकती है, या वह भगवान् ही अपनी इस अचिन्त्य माया शक्ति के द्वारा बिना साधनों के भी उक्त जगच्चक्र का निर्माण कर सकते हैं । “किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च । अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥” यह संसार रविकरनीर अर्थात् मरुमरीचिका जल ही है। इस मृगतृष्णिकोदक में एक मोह रूपी मकर है जो वदनहीन होने पर भी वहाँ जलपान करने जो जाते हैं उन सभी चराचरों को ग्रस लेता है । यदि पानी ही सत्य नहीं तो उसमें सत्य मकर कैसे होगा ? फिर उसके मुख भी कहाँ ? फिर भी जब तक तत्त्व का साक्षात्कार नहीं होता, भ्रम नहीं मिट जाता, तब तक मिथ्या संसार व्यामोह सबको ग्रस्त करता ही है। “कोउ कह सत्य झूठ कह कोई” पङ्क्तियों का यह अर्थ है कि कुछ लोग जगत को सत्य ( अत्यन्ताबाध्य ) कहते हैं । कुछ झूठ वन्ध्यापुत्र तथा खपुष्पवत् अत्यन्त असत् कहते हैं । कुछ लोग सत् असत् उभयरूप मानते हैं । परन्तु ये तीनों ही पक्ष भ्रान्त हैं । त्रिविध भ्रम परित्याग से ही परमात्मज्ञान हो सकता है । जगत् ब्रह्म के समान सत् नहीं है, क्योंकि वह विनश्वर है, तत्त्वज्ञान से मिट जाता है । अत्यन्त असत् भी नहीं है, क्योंकि वह दुःखादि अनर्थ का मूल है। खपुष्पादि प्रतीत नहीं होते, यह प्रतीत होता है । “क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वानधिकरणत्वमसत्त्वम् ।” जो किसी स्थल में प्रतीयमानत्व धर्म का अधिकरण न हो अर्थात् कहीं सत् रूप से जिसकी प्रतीति न हो वही असत् है । ऐसे खपुष्पादि ही होते हैं, जगत् नहीं ? क्योंकि जगत् सत् रूप से प्रतीत भी होता है एवं इसमें कार्यकारण क्षमता भी है। अतः यह जगत् न सत् है, न असत् है और न सदसत् है । क्योंकि सत् और असत् दोनों विरुद्ध होने से दोनों का समन्वय हो ही नहीं सकता है । अतएव वेदान्त के अनुसार जगत् अनिर्वचनीय है । अविचाररमणीय, मिथ्या और झूठ शब्दों के दो अर्थ होते हैं । एक अपलाप या अत्यन्त असत् अर्थ है। दूसरा पूर्वोक्त सदसद्विलक्षण अविचारितरमणीय अनिर्वचनीय अर्थ है । इसी लिए अध्यासभाष्य में भाष्यकार ने कहा है—मिथ्याशब्दो नापह्नववचनः किन्त्वनिर्वचनीयतावचनः । आक्षेप- भाष्य में मिथ्याशब्द का अर्थ अपह्नव अपलाप अर्थात् इनकार करना है। अनिर्वचनीयता यहाँ मिथ्या शब्द का अर्थ अभिप्रेत नहीं है !

८४० रामायणमीमांसा एकविंश लोक में जैसी वस्तु है उसे वैसा न कहकर उल्टा कहनेवाले को मिथ्यावादी कहा जाता है। बौद्धों का शून्य कोटिचतुष्टयविनिर्मुक्त कहा जाता है। वह सत्, असत्, सदसत् और सदसद्विलक्षण इन चारों पक्षों से भिन्न है। नास्ति बुद्धि का गोचर न होने से बौद्ध शून्य को असत् से विलक्षण मानते हैं। वेदान्तियों का ब्रह्म कोटिचतुष्टयविनिर्मुक्त है। परन्तु उसका अर्थ बौद्धों के अर्थ से अलग यह है कि वह ब्रह्म असत्कार्यवादी नैयायिकों तथा वैशेषिकों एवं असत् कारणवादी बौद्धों के समान असत् नहीं है। सांख्ययोग के सत्कार्यवाद के अनुसार ब्रह्म सत् नहीं है। अनेकान्तवादी के समान ब्रह्म सत्-असत् रूप नहीं है। वेदान्तियों के सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय जगत् के समान ब्रह्म अनिर्वचनीय नहीं है। किन्तु चारों से विलक्षण अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश सत् रूप है। “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” ( छा० उ० ६।२।१ ), “अस्तीत्ये- वोपलब्धव्यः ।” ( उपनिषद् ) यदि झूठ का अर्थ वेदान्तियों का मिथ्यात्व स्वीकार किया जायगा और युगल प्रबल का अर्थ पूर्वोक्त दोनों पक्षों का समुच्चय सत्यासत्य कहा जायेगा तो वह असम्भव ही होगा। क्योंकि वैसा किसी भी दार्शनिक का पक्ष ही नहीं। जगत् को सत्य भी मिथ्या भी दोनों मानना सर्वथा असम्भव है। “करम उपासन ज्ञान वेदमति सो सब भांति खरो” इस पद के पूर्वोक्त-“तुलसीदास परिहरै तीनि भ्रम सो आपन पहचाने” इस पूर्वोक्त से विरुद्ध समझना भी गलत है, क्योंकि भगवान् की सत्यता से ही माया भी सत्य है, जगत् भी सत्य है। यह कहा ही जा चुका है। कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों ही निश्चितरूप से अपना फल प्रदान करते हैं। उनका अपने अपने फल के साथ कार्य-कारणभाव सत्य है। अव्यभिचरित है, व्यभिचरित नहीं । यही उसका खरा होना है। जेहि जाने जग जाई हेराई । जागे यथा स्वप्नभ्रम जाई ॥” ( रा० मा० १।१११।१ ) “एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । यदपि असत्य देत दुख अहई ॥” ( रा० मा० १।११७ १ ) जग नभवाटिका रही है फल फूलि रे । धुवां कैसे धौरहर देख तू न भूलि रे ॥” गोस्वामीजी इन पूर्वोक्त वर्णनों से भी सृष्टि के मिथ्यात्व का ही प्रतिपादन करते हैं। यह भी कहना गलत है कि “इस समाधान को एक सीमा तक गोस्वामीजी यत्र तत्र स्वीकार करते हैं। परन्तु वह सिद्धान्त भी किन्हीं कसौटियों पर खरा नहीं उतरा । अतएव सैद्धान्तिक दृष्टि से उसे भी भ्रम अथवा सीमित सत्य का ही नाम देना होगा” क्योंकि मानस में इसका विरोधी कोई वचन नहीं है। शिवजी के द्वारा इस प्रसङ्ग में राम और जगत् दोनों के याथात्म्य का वर्णन है। जगत् का मिथ्या होना या सीमित सत्य होना दोनों एक ही बात है। हम कह ही चुके हैं कि शुक्ति-रजत एवं रज्जु-सर्प के समान होता हुआ भी संसार शुक्ति, रज्जु आदि के समान सत्य ही माना जाता है। इसी लिए जैसे व्यवहार में कल्पित सर्प और रजत बाधित होते हैं, उसी तरह उसके अधिष्ठानभूत शुक्ति और रज्जु बाधित नहीं होते। वेदान्त में घट, रज्जु, शुक्ति आदि को भी मिथ्या कहा गया है। किन्तु घट के कारण मृत्तिका आदि को सत्य कहा गया है --- “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ।” ( छा० उ० ६।१।४ ) इसी तरह मृत्तिकादि कारण भी अपने कारण की अपेक्षा कार्य विकार होने से मिथ्या हैं। अन्तिम परम कारण या कार्यकारणातीत राम ही परम सत्य हैं। तद्भिन्न सब मिथ्या या सीमित सत्य ही कहे जा सकते हैं। परन्तु सर्वाधिष्ठानभूत भगवान् परम सत्य हैं। सत्य के भी सत्य हैं। उन्हें सीमित सत्य नहीं कहा जा सकता।