भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८२८ रामायणमीमांसा एकविंश “सब कर हित रुख राउर राखे। आयसु किये मुदित फुर भाखे ॥ प्रथम जो आयसु मो कहँ होई। माथे मानि करौं सिख सोई॥” (रा० मा० २।२५६।२) यहाँ कितनी निष्ठा है गुरुभक्ति में और ‘बिनहि बिचार करिय हित मानी’ की भावना में परन्तु वसिष्ठ तो भरत के प्रेम के वशीभूत हो चुके थे। “कह मुनि राम सत्य तुम भाखा। भरत सनेह बिचार न रखा॥” (रा० मा० २।२५६।३) भरत का प्रेम देखकर मेरी मति विचारशून्यसी हो गयी है। “तेहि ते कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥” यहाँ कहाँ विचारों का संघर्ष है ? कहाँ कुतर्क है ? यदि है तो केवल कलियुगी कथक्कड़ के मन में। मुनि ने अपना निर्णय सुना दिया। “मोरे जान भरत रुचि राखी। जो कीजिय सो सुभ सिव साखी॥” अतः आप भरत की प्रार्थना को सुन फिर विचार कर के जो साधु-मत, लोक-मत और नृपनीति और निगम-संमत हो वैसा ही करें— “भरत बिनय सादर सुनिय करिय बिचार बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥” (रा० मा० २।२५७) भरत की गुरुभक्ति देखकर भगवान् परमानन्द निमग्न हो गये और श्रीभरत को धर्म-धुरन्धर और मन, वचन और कर्म से अपना अनन्यभक्त समझ लिया। जो निश्छलरूप गुरुभक्त होता है, वह भगवान् का अनन्यभक्त होगा ही— “गुर अनुराग भरत पर देखी। रामहृदय आनन्द बिसेखी ॥ भरतहि धरमधुरन्धर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥” (रा०मा० २।२५७।१) और बोले— ‘नाथ सपथ पित चरन दोहाई। भयउ न भुवन भरत सम भाई ॥ जे गुरपद अम्बुज अनुरागी। ते लोकहुं वेदहुं बड़भागी ॥ राउर जापर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥”(रा०मा० २।२५७।२,३) कितने मधुरभाव, कितने सुन्दर सम्बन्ध, मुनि के, श्रीराम के एवं श्रीभरत के कहीं किसी कुतर्क, हार- जीत, खण्डन-मण्डन का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। फिर भी न जाने किंकर किंकर्तव्य मूढ़ क्यों ? वास्तव में इस प्रसङ्ग में मानस की पङ्क्तियाँ ही सर्वोत्कृष्ट हैं। कुछ भी कहना सुनना उस महान् दिव्य रस में व्यवधान ही डाल सकता है। श्रीराम ने स्वीकार कर लिया कि भरत के कथन के अनुसार काम करने में सबकी भलाई है— “भरत कहहिं सो किये भलाई।” (रा० मा० २।२५७।४) इससे बढ़कर विश्वास और क्या हो सकता है ? मुनि ने कहा कि तात ! अब संकोच छोड़कर कृपासिन्धु अपने प्रियबन्धु से अपने हृदय की सब बात कहो। भरतजी तो गुरुजी और स्वामी इष्टदेव प्रभु राम की परम अनुकूलता पाकर बोले—