रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८९९ “कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि ते अधिक कहब मैं काहा ॥ मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधहुँ पर कोह न काऊ ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥ सिसुपनते परिहरेउँ न संगू। कबहुं न कीन्ह मोर मन भंगू ॥ मैं प्रभु कृपा रीति जिय जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥”(रा०मा० २।२५८।२-४) “महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कहै न बैन । दरसन तृपित न आज लगि प्रेम पियासे नैन ॥” (रा० मा० २।२५९) अब भरत को स्पष्ट भासित होता है— “गुर गोसांई साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥” (रा० मा० २।२५९।४) महाराज के सम्बन्ध में उनके प्रेमपन का ही स्मरण करते हैं— भूपति मरन प्रेमपन राखी ॥” (रा० मा० २।२६०।१) श्रीभरतजी अपने दैन्य, दोष तथा माँ कैकेयी के सम्बन्ध से ग्लानि का स्पष्टीकरण करते हैं । उसपर श्रीभगवान् कहते हैं कि तात ! मेरी दृष्टि में तुम्हारे समान त्रिभुवन में कोई पुण्यश्लोक नहीं हुआ । जो तुम्हारे ऊपर कुटिलता का आरोप करेगा उसके लोक-परलोक बिगड़ जायँगे । माँ कैकेयी के ऊपर भी वे ही लोग दोषारोपण करेंगे, जिन्होंने कभी गुरुओं एवं साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है । तुम निरर्थक तर्क मत करो । वैर और प्रेम छिपाने से भी नहीं छिप सकता । विहङ्गम आदि भी मुनिगणों के पास ही जाते हैं, बाधक बधिकों को देखकर भागते हैं । वर्तमान कठिनाइयों को तुम अच्छी तरह समझते हो । महाराज ने मुझे त्यागकर भी सत्य की रक्षा की और प्रेमपन के लिए प्रिय तन को तृण के तुल्य त्याग दिया। उन महाराज का वचन टालने से मन में सोच अवश्य है । परन्तु उससे भी अधिक तुम्हारा संकोच है। उसके ऊपर भी गुरु महाराज की आज्ञा है । अतः जो कुछ भी तुम कहोगे वही मैं करना चाहूँगा— “राखेउ राय सत्य मोहि त्यागी। तन परिहरेउ प्रेमपन लागी ॥ तासु वचन मेटत मन सोचू । तेहि ते अधिक तुम्हार सँकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥”(रा०मा० २।२६२।३,४) देवता लोग यद्यपि घबड़ा गये । परन्तु सुरगुरु ने उन्हें बताया कि श्रीभरत को तुम श्रीराम की छाया समझो । जैसे छाया काया का ही अनुसरण करती है। उसी तरह भरत श्रीराम की काया की छाया ही हैं । भरत के मन में भी यही बात आयी । “निज पन तजि राखेउ पन मोरा । छोहु सनेह कीन्ह नहि थोरा ॥” (रा० मा० २।२६४।४) और बोले— “कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥ गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटौ मलिन मन कलपित सूला ॥ अपडर डरेउ न सोच समूलें। रविहि न दोष देव दिशि भूलें ॥” (रा० मा०२।२६५।१,२) नाथ ! मेरी कल्पनाएँ मेरे अपडर का ही परिणाम थीं । किसी को दिग्भ्रम होता है तो वह उसी का दोष होता है सूर्य का दोष नहीं होता। उसी प्रकार मेरे अभाग का ही परिणाम था ।