रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३० रामायणमीमांसा एकविंश "लखि सब विधि गुरु स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभ नहि मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिय सोई । जनहित प्रभुचित छोभ न होई ॥ जो सेवक साहिबहि सँकोची । निज हित चहहि तासु मति पोची ॥" (रा०मा० २।२६६।१,२) बस ऐसा ही भरत पर विश्वास वसिष्ठजी का था, ऐसा ही सुरगुरु का था और ऐसा ही प्रभु श्रीराम का विश्वास था । राम की काया की छायारूप भरत से ऐसी आशा की ही जा सकती थी । इसके बाद अनेक प्रस्ताव एवं परिस्थितियाँ आयीं । श्रीभरत के सम्बन्ध में कौशल्या की दृष्टि और ही विलक्षण है । वह श्रीसीता की माता से भरत के सम्बन्ध में कहती हैं कि मैं कभी राम की शपथ नहीं करती हूँ पर मैं भरत के सम्बन्ध में राम की शपथ कर के भी कह सकती हूँ कि भरत के शील, गुण, विनय एवं महत्ता, भ्रातृत्व, भक्ति, विश्वास और भलाई सब अनुपम एवं अवर्णनीय हैं । शारदा की मति भी उनके वर्णन में असमर्थ है । भला कहीं सीप के द्वारा महासमुद्र को उलचा जा सकता है । जैसे किसी निकष पर ही कनकभणि की परीक्षा हो सकती है, वैसे ही समय आने पर ही पुरुष की परीक्षा , होती है । उन्होंने मिथिलेश रानी से कहा कि आप अवसर पाकर मिथिलेश से कहिये— "रखिअहिं लखन भरत गवनहिं बन । जो यह मत माने महीपमन ॥ गूढ सनेह भरत मन माहीं । रहे नीक मोहि लागत नाहीं ॥" (रा०मा० २।२८२।१,२) श्रीजनकजी ने भी कौशल्या का सन्देश सुनकर कहा था कि श्रीभरत का व्यवहार सुवर्ण में सुगन्ध है एवं शशिसार की सुधा है— "मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजस सराहन लगे मुदित मन ॥" (रा०मा० २।२८६।१) "धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ यथामति मोर प्रचारू ॥ सो मति मोरि भरत महिमाहीं । कहै काहु छल छुअति न छाहीं ॥ भरत चरित कीरति करतूती । धरम शील गुन बिमल बिभूती ॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥" (रा०मा० २।२८६।२-४) "निरवधि गुन निरुपम पुरुष भरत भरत सम जानि । कहिय सुमेरु कि सेर सम कविकुलमति सकुचानि ॥" ( रा० मा० २।२८७ ) "भरत महा महिमा सुनु रानी । जानहिं राम न सकहिं बखानी ॥" (रा० मा० २।२८७।१) महाराज जनक विचार करते हैं कि यद्यपि धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार में मेरी मति की अव्याहत गति है तथापि भरतमहिमा की छाया का भी वह स्पर्श नहीं कर पाती । ठीक ही हैं क्योंकि वसिष्ठ महर्षि की भी मति भरतमहामहिमा जलराशि के सामने अपने को अबला समझती है । वस्तुतः श्रीभरत तात्त्विक दृष्टि से अव्याकृत तुरीय तत्त्व होते हुए भक्ति की दृष्टि से साक्षात् भगवत्प्रेमस्वरूप ही हैं । भरत की महिमा भगवान् राम इसी लिए जानते है कि वे सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी हैं । सर्वसाक्षी से कुछ भी छिप नहीं सकता । परन्तु वर्णन तो साक्षी का विषय नहीं होता, क्योंकि साक्षी में कर्तृत्व और वर्णयितृत्व नहीं हो सकता । श्रीकौशल्या के प्रस्ताव की चर्चा सुनयना रानी ने की थी । उसमें बहुत कुछ समन्वय की बात थी । परन्तु वे यह समझते हैं कि भरत की प्रीति और विश्वास दोनों ही अतर्क्य हैं । भरतजी स्नेह और ममता की सीमा हैं । क्योंकि—"निर्दोषं हि समं ब्रह्म" निर्दोष समत्व तो ब्रह्म में ही होता हैं— "राम ब्रह्म परमारथरूपा ।", "यद्यपि सम नहि राग न दोषू ॥"