रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३१ परन्तु भरत के प्रेम पर उस समता के कारण कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि भरत ने परमार्थ-स्वार्थ सुखमार की ओर कभी स्वप्न में भी देखा नहीं। उनकी दृष्टि में तो रामपदारविन्द प्रेम ही साधन है वही सिद्धि भी है ऐसा स्वार्थ-परमार्थनिरपेक्ष कभी श्रीराम की आज्ञा के विपरीत सोच भी क्या सकता है। “देवि परंतु भरत रघुवर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥ भरत अवधि सनेह समता की। यद्यपि राम सीम समता की ॥ परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुं निहारे ॥ साधन सिद्धि रामपग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥” (रा०मा० २।२८७।३,४) श्रीजनकजी की दृष्टि में भी महाराज दशरथ की आज्ञा में कोई दोष नहीं था। वे सोचते हैं कि महाराज ने राम के लिए वनवास की आज्ञा प्रदानकर तृणतुल्य प्राणों को त्यागकर के अपने सत्यप्रेम को प्रमाणित किया। “रामहिं राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आप प्रिय प्रेम प्रमाना।।” (रा० मा० २।२९०।२) भरत की दृष्टि उनके ही निम्न वचन से विदित होती है-- “राखि राम रुख धरम ब्रत पराधीन मोहि जानि। सबकै संमत सर्वहित करिय प्रेम पहिचानी ॥” ( रा० मा० २।२९२ ) श्रीराम का रुख और धर्म तथा सत्यव्रत के पराधीन मुझे जानकर जो सर्वसम्मत हित हो वही करें। इससे स्पष्ट है कि श्रीभरत को किसी नये धर्म, नये पन्थ का प्रचार अभीष्ट नहीं था। महाराज दशरथ और महर्षि के वेदादिशास्त्र-सम्मत सिद्धान्त से भिन्न उनका कोई पृथक् सिद्धान्त नहीं था। उनकी दृष्टि में स्वार्थ और स्वामि-सेवा में धर्म का वैसा ही वैर है जैसे अन्ध प्रेम और प्रबोध में विरोध होता है। 'प्रभु पित मात सुहृद गुरु स्वामी । पूज्य परमहित अन्तरयामी ॥ सरल सुसाहिब सील निधानू । प्रनतपाल सर्वज्ञ सुजानू ॥ समरथ सरनागत हितकारी । गुनग्राहक अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाइंहि सरिस गोसांई । मोहि समान मैं साँइ दोहाई ॥ प्रभु पित बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाज सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिय अमरपद माहुर मीचू ॥ रामरजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ तो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई । प्रभु मानी सनेहसेवकाई ॥” (रा०मा०२।२९६।१-४) “कृपा भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर । दूषन भे भूषन सरिस सुजस चारु चहु ओर ॥” (रा० मा० २।२९७) “राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगतबिदित निगमागम गाई ॥” (रा० मा० २।२९७।१) “सोक सनेह कि बाल सुभायें । आयउँ लाय रजायसु बायें ॥ तबहुं कृपाल हेरि निज ओरा। सबहिं भांति भल मानेउ मोरा ॥ देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥ बड़े समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ी चूक साहिब अनुरागू ॥ नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥” (रा० मा० २।२९८।१-४)