रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३२ रामायणमीमांसा एकविंश "सुहृद सुजान सु साहिबहिं बहुत कहब बड़ि खोरि । आयसु देइय देव अब सबई सुधारी मोरि ॥" (वा० रा० २।२९९) "प्रभु पद पदम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सींव सोहाई ॥ सो करि कहउँ हिये अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की ॥ सहज सनेह स्वामिसेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ आज्ञा सम न सुसाहिबसेवा । सो प्रसाद जनु पावै देवा ॥" (रा०मा० २।२९९।१,२) उपर्युक्त भरत के वचन गङ्गाजल के तुल्य निर्मल, निश्छल तथा परम पवित्र हैं। उनका अलग से कुछ अभिप्राय वर्णन करना कठिन है। इनमें किसी के प्रति कोई आक्षेप नहीं है। भरत के परमपवित्र दैन्यपूर्ण भक्तिसुधासमुद्र में नयी धर्मव्याख्या का स्थान ही कहाँ है ? वे समाज सहित प्रभु के समीप आने को भी अपनी धृष्टता, आज्ञापालन, सेवा में चलना मानते हैं और चारों पुरुषार्थों से विमुख होकर स्वार्थ एवं छलरहित स्वामी की सेवकाई को ही सर्वोत्कृष्ट धर्म मानते हैं। उनकी दृष्टि में सर्वोत्कृष्ट सेवा स्वामी की आज्ञा का पालन करना ही है। उन्होंने तीर्थराज प्रयाग से भी तो यही कहा था कि— "अर्थ न धर्म न काम रुचि गति न चहौं निरबान । जनम जनम रति रामपद यह बरदान न आन ॥" (रा० मा० २।२०३) श्रीराम प्रभु ने भरत के सम्बन्ध में जो कहा है वह उनके अनुरूप ही है— "तात भरत तुम्ह धरमधुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥" (रा० मा० २।३०२।४) श्रीराम के दरबार में धर्मधुरीण के रूप में भरत प्रसिद्ध हैं। उनके अनुसार ही वे लोक और वेद दोनों के ही ज्ञाता और प्रेम में परम प्रवीण हैं। अतएव श्रीराम कहते हैं कि— "जानहु तात तरनिकुल रीति । सत्यसन्ध पित कीरति नीती ॥ क्या श्रीराम के इन वचनों से महाराज दशरथ का किञ्चित् भी अपकर्ष प्रतीत होता है ? उनमें क्रोध, लोभ या काम का आवेश सिद्ध होता है ? वे भरत से आशा रखते हैं कि वे तरणिकुल की रीति और सत्यसन्ध पिता दशरथ की कीर्ति का पालन करेंगे। "तुम्हहिं बिदित सबही कर करमू । आपन मोर परम हित धरमू ॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा । तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥" (रा० मा० २।३०३।२) श्रीराम श्रीगुरु वसिष्ठ की कृपा से ही सबका कल्याण समझते हैं— "तात तात बिनु बात हमारी । केवल गुरुकुल-कृपा सँभारी ॥" (रा० मा० २।३०३।३) "राजकाज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम । गुरुप्रभाव पालिहि सबहिं भल होइहि परिनाम ॥" (रा० मा० २।३०४) "सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुरुप्रसाद रखवारा ॥" (रा० मा० २।३०४।१) जब मर्यादापुरुषोत्तम वेदशास्त्रपालक भगवान् राम का गुरु के सम्बन्ध में ऐसे पवित्र भाव हैं तो श्रीराम परछाईंस्वरूप श्रीभरतजी का वैसा भाव स्वाभाविक ही है। "मात पिता गुरु स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥" (रा० मा० २।३०४।१)