भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 910

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३३ माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा सकल धर्मरूप धरणी को धारण करनेवाला भगवान् शेष है। अतः उन सबकी आज्ञा पालन करना ही सब धर्मों का आधार है। "सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुलपालक होहू ।।" (रा० मा० २।३०४।२ ) कितनी मधुर कितनी सुन्दर आज्ञा है या प्रिय परामर्श है। हे तात, उस आज्ञा का तुम भी पालन करो हम से पालन कराओ अर्थात् हमारे उस आज्ञापालन में मदद करो, सहयोगी बनो और ऐसा करके इस तरणिकुल सूर्यवंश की मर्यादा का रक्षण करो। गुरुजनों की आज्ञा का पालन करना साधक के लिए समस्त सिद्धियों को देनेवाली कीर्ति, सुगति और भूति (ऐश्वर्य ) की त्रिवेणी है। यद्यपि इसमें कठिनाई है, संकट है एवं प्रियवियोग आदि संकट सहना पड़ेगा। परन्तु इसमें सबका हित होगा। अतः इस आयी हुई विपत्ति को सब भाइयों को बाँटकर सह लेना चाहिये । चौदह वर्ष तक के लिए तुम्हारे लिए बड़ी कठिनाई है। तुम्हें परम मृदु जानते हुए भी यह कठोर बात कहना इस कुसमय में अनुचित नहीं । कुसमय और कुठाँव में सुबन्धु ही सहायक होता है। तलवार का घाव लगने पर अपने हाथ को ही ओड़ना पड़ता है। सेवक हाथ, पैर तथा नयन के समान होता है। स्वामी मुख के समान होता है। सुकवि ऐसी प्रीति की रीति की सराहना करते हैं— "बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हींह अवधि भरि अति कठिनाई ॥ जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमय तात न अनुचित मोरा ॥ होंहिं कुठावं सुबंधु सहाये । ओड़िअहि हाथ असिनिहुँ के धाये ।।" (रा०मा० २।३०४।३,४) "सेवक कर पद नयन से मुख से साहिब होइ । तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकवि सराहहिं सोइ ।।" (रा० मा० २।३०५ ) प्रभु की प्रेमामृतसमुद्रमयी वाणी को सुनकर सम्पूर्ण समाज सनेह शिथिल होकर समाहित हो गया। ज्ञान- विज्ञान की अधिष्ठात्री महाशक्ति सरस्वती ने चुप्पी साध ली । श्रीभरतजी को परम संतोष हुआ । उससे स्वामी के सांमुख्य का और दुःखदोष के वैमुख्य का अनुभव किया, मुख प्रसन्न हो गया, मन का विषाद मिट गया। मानो मूँगे को गिरा का प्रसाद मिल गया और बोल पड़े— "नाथ भयउ सुख साथ गये को । लहेउँ लाहु जग जनम भये को ॥ अब कृपाल जस आयसु होई । करौं सीस धरि सादर सोई ।।" (रा०मा० २।४०५।३,४) इस प्रकार गोस्वामीजी के मानस में महाराज दशरथ के प्रति महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, मन्त्रिपरिषद्, परिजन एवं पुरजन सहित श्रीभरत की तथा श्रीराम की परम श्रद्धा प्रकट होती है। इसी प्रकार श्रीवसिष्ठ एवं उनकी आज्ञाओं के प्रति श्रीभरत तथा श्रीराम का परम विश्वास, परम श्रद्धा परिलक्षित होती है। वेदादिशास्त्रों एवं तदुक्त धर्म में तो सब की ही परम श्रद्धा है। इसी तरह वेदस्वरूप के सम्बन्ध में भी कई लोगों की भ्रान्तिपूर्ण धारणा है। "बेद बिदित तेहि दशरथ नाऊ।" (रा० मा० १।१८७।४ ) "राम नाम कर अमित प्रभावा । बेद पुरान उपनिषद गावा ।।" (रा० मा० १।४५।१ ) उनके अनुसार "उपर्युक्त पङ्क्तियों में वेद शब्द का अर्थ आजकल के प्रसिद्ध वेदों का बोध नहीं है। उनके अनुसार अब आधुनिक काल में वेदों का जो स्वरूप उपलब्ध है, उसमें दशरथ या राम नाम की महिमा तो दूर नामोल्लेख भी नहीं है। कुछ आधुनिक टीकाकारों ने वेदमन्त्रों में दशरथ, राम और सीता आदि नामों के उल्लेख का समर्थन किया है। किन्तु ऐसे अर्थ शाब्दिक खींचतान के द्वारा किये गये लगते हैं। १०५