भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८३४ रामायणमीमांसा एकविंश वस्तुतः गोस्वामीजी वेदों का ठीक उतना ही स्वरूप नहीं मानते हैं, जितना ग्रन्थों के रूप में हमें आज उपलब्ध है। वे “रामायन सतकोटि अपारा” कहते हुए जिस मान्यता की स्थापना करते हैं। भले ही सौ करोड़ रामायण आज उपलब्ध नहीं हैं, वही दृष्टि उनकी वेदों के प्रति भी है। भगवान् के निःश्वास से प्रादुर्भूत वेद भगवान् का स्वरूप ही है। वह ज्ञानमय वेद असीम और अनन्त हैं। समुद्र में जिसे जो पाना होता है, वह उससे अपनी आवश्यकता भर ले लेता है। इसी प्रकार वेद की स्थिति हैं। यज्ञों की कर्मकाण्ड-प्रक्रिया में जिन वेदमन्त्रों का प्रयोग है, परम्परा से उनका उपयोग होते रहने से हमें आज वे ही उपलब्ध हैं। हम उनको ही पूर्ण प्रामाणिक मान बैठे हैं।” उक्त कथन अत्यन्त असङ्गत ही है। “अनन्ता वै वेदाः” के अनुसार वेद अनन्त हैं। भगवान् के निःश्वास- भूत होने से अकृत्रिम हैं और अपास्त-समस्तपुंदोषशङ्काकलङ्क होने से परम-प्रमाण हैं। जैसे प्राण प्राणवान् का स्वरूप ही माना जाता है, वैसे ही निःश्वास निःश्वासवान् से अभिन्न हैं। सच्चिदानन्द भगवान् में सत्, चित् और आनन्द तीन रूप प्रतीत होते हैं। यद्यपि सत् की स्वप्रकाशता ही उसकी चिद्रूपता है। सच्चित् की सर्वोपद्रवशून्यता ही आनन्दरूपता है। फिर भी प्रातीतिक भेद के अनुसार सदंश से ज्ञेय प्रपञ्च तथा चित् से वृत्तिविशिष्ट ज्ञान उत्पन्न होता है। उसी चित् से ही सम्पूर्ण वाङ्मयप्रपञ्च की उत्पत्ति होती है। अनन्त संवित् ही शब्दब्रह्म है। उसका ही मूलरूप प्रणव है। प्रणव का ही व्याख्यानभूत अनन्त वेद है। फिर भी वह ज्ञान- मय असीम और अनन्त है। वेद ईश्वर के समान ज्ञानमय असीम और अनन्त ही हैं— “वेदो नारायणः साक्षात्” (भाग० ६।१।४० ), “वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्” (भाग० ११।३।४३) इन वचनों का इतना ही अर्थ है कि वे ईश्वर के निःश्वासभूत होने से ईश्वर के अंश हैं। यद्यपि वैयाकरणों और वेदान्तियों के अनुसार सभी शब्द एवं वेदशब्दराशि सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होकर प्रलय में नष्ट हो जाती है तथापि ईश्वरीय शक्तिरूप से वे प्रलयकाल में विद्यमान रहते हैं। तभी पूर्वकल्पीय आनुपूर्वी के समान ही उत्तरकल्पीय आनुपूर्वी उत्पन्न होती है। शक्ति की दृष्टि से और अविच्छिन्न पारम्पर्य की दृष्टि से वेदवाणी अनादि और अनन्त मानी जाती है। शब्द और वेद और शब्दराशि स्वरूप से सृष्टि से लेकर प्रलय पर्यन्त स्थायी होने से ही नित्य कही जाती हैं। यह नित्यता आपेक्षिक ही है। इसी लिए वेदों की वेदान्तरीति से उत्पत्ति होती है। उत्पन्न सभी पदार्थ कारण से अनन्य होते हैं। तभी वेद भी परमेश्वर से अनन्य हैं। अतः ब्रह्म की अद्वितीयता सिद्ध होती है। अभिधानात्मक प्रपञ्चोपादानानुकूल शक्त्यवच्छिन्न संविदानन्द ब्रह्म के विवर्त होने से ही शब्दों को ज्ञानात्मक कहा जा सकता है। स्वरूपतः शब्द ज्ञान के जनक हैं, ज्ञानरूप नहीं हैं। परन्तु ब्रह्म किसी से उत्पन्न नहीं होता है। उसकी नित्यता आपेक्षिक नहीं है, किन्तु वास्तविक है। वह नित्य ज्ञानरूप हो सकता है। भगवान् प्रतिपाद्य हैं और वेद प्रतिपादक हैं, प्रतिपाद्य नहीं। यदि परमात्मरूप ही वेद हैं तो वे भी परमात्मा के समान ही परोक्ष एवं अग्राह्य रहेंगे। यदि वेद स्वयं ही अनुपलब्ध होंगे तब उनसे ब्रह्म का कैसे उपलम्भ हो सकेगा। हाँ, अनन्त वेद ब्रह्म, सूर्यादि देवताओं के लिए ही ग्राह्य हैं। मानवबुद्धिग्राह्य वेद की श्रीभागवत, महाभाष्य, सीतोपनिषद् आदि के अनुसार ११३१ ग्यारह सौ इकतीस या ११७२ ग्यारह सौ बहत्तर शाखाएँ मानवग्राह्य हैं। आज उनमें से किसी न किसी रूप में नौ या दस शाखाएँ मिलती हैं। साथ ही केवल मन्त्र ही नहीं, किन्तु मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं। ब्राह्मण में ही आरण्यक एवं उपनिषदें भी अन्तर्भूत हैं। वेद केवल मन्त्रभाग ही नहीं हैं, किन्तु मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों ही वेद हैं। उपलब्ध वेदों से भिन्न समुद्रतुल्य कोई वेद उपलब्ध नहीं है। अनुपलब्ध वेद को तो हम किसी विषय के प्रमाण के रूप में नहीं