रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 912, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपस्थित कर सकते हैं। अन्यथा तो कोई भी किसी ग्रन्थ या किसी बात को वेदसम्मत कह सकता है। फिर वेद- सम्मत क्या है क्या नहीं इसका निर्णय असम्भव ही हो जायगा। अतः परम्परा से प्राप्त मन्त्र और ब्राह्मण भाग को ही वेद माना जाता है और उसी के आधार पर धर्म और ब्रह्म का विचार किया जाता है। शतकोटि रामायण की मान्यता तुलसी द्वारा स्थापित नहीं, किन्तु वह पुराणों द्वारा स्थापित है— “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।” तुलसी ने उसी का प्रतिपादन किया है। यह भी कहना गलत है कि “पौराणिक परम्परा में पराशरपुत्र कृष्णद्वैपायन को 'व्यास' उपाधि दी गयी है। व्यास का अर्थ विस्तार करनेवाला है। उन्होंने लोककल्याण के लिए वेदों का विस्तार करके पुराणों के रूप में सुलभ कर दिया।” क्योंकि पुराणों को वेद परम्परा का अङ्ग मान लेने पर गोस्वामीजी की सैद्धान्तिक यथार्थता सिद्ध हो जाती है, क्योंकि पुराणों में ही वेदव्यास का अर्थ अनेकशाखोपबृंहित मन्त्र-ब्राह्मणात्मक सम्पूर्ण वेदराशि को शाखाभेद से और मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग रूप से उनका विभाजन करना ही हैं। शुक्लयजु के मन्त्र और ब्राह्मण का स्पष्टतया विभाजन है। इसी लिए वह शुक्ल है। कृष्णयजु में शाखा- भेद होने पर भी मन्त्रसंहिता में भी ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणभाग में भी मन्त्र हैं। इसी लिए उसे कृष्ण कहा जाता है। पुराण वेदों का विभाजन नहीं है, किन्तु वेदों का उपबृंहण हैं। पुराणनिर्माता होने के कारण कृष्णद्वैपायन वेदव्यास नहीं, किन्तु वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास हुए हैं। इसी लिए मन्त्र-ब्राह्मणरूप वेदों की पौर्वापर्यरूप आनुपूर्वी नहीं बदलती। सभी कल्पों में मन्त्र और ब्राह्मण एक जैसे ही होते हैं। उनकी आनुपूर्वी में रद्दोबदल नहीं होता है। परन्तु भिन्न-भिन्न कल्पों में पुराणों की आनुपूर्वी बदल जाती है। आठ प्रकार के ब्राह्मणों में आनेवाले इतिहास और पुराण तो वेद ही हैं। उसी दृष्टि से उन्हें भी ईश्वर का निःश्वास कहा गया है—“अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपानिषदः श्लोकाः सूत्राणि” (बृ० उ० २।४।१०) किन्तु छान्दोग्य में वर्णित इतिहास-पुराण विष्णु, पद्मादि पुराण हैं। वे ईश्वर के निःश्वास नहीं हैं, क्योंकि वहाँ 'निःश्वसितम्' पाठ नहीं है। मानस में वर्णित वेदस्तुति एवं भागवत की वेदस्तुति से यह कदापि नहीं सिद्ध होता है कि उसी रूप में वह वेदमन्त्रों में विद्यमान है। किन्तु वेदों के अधिष्ठाता देवताओं या अधिष्ठात्री महाशक्तियों ने भगवान् की स्तुति की है। श्रीभागवत की वेदस्तुति के टीकाकारों ने टीकाओं में स्पष्ट कर दिया है—कौन कौन से वेदांशों ने किन किन अंशों को कहा है। विशेषतः श्रीधर स्वामी ने अपनी टीका में उन उन श्रुतियों का उल्लेख किया है। इस दृष्टि से मन्त्रों में, ब्राह्मणों में और उपनिषदों में दशरथ, राम, सीता आदि का स्पष्ट वर्णन है। उसे शब्दों की खींचा- तानी नहीं कहा जा सकता है। यों तो वेदों के अनेक कठिन मन्त्रों के स्वाभाविक अर्थ में अनभिज्ञों को खींचा-तानी प्रतीत हो सकती है। उक्त बातों का विवरण इसी ग्रन्थ में अध्याय २ पर देखा जा सकता है। कोई भी मनुष्य चाहे ऋषि हो चाहे देवता उन्हें वेदों में संकोच और विकास करने का अधिकार नहीं होता। मनुष्य, ऋषि तथा देवता वेदों का व्याख्यान या अर्थविश्लेषण कर सकते हैं। परन्तु मन्त्रों या ब्राह्मणों की पंक्तियों में हेरफेर, रद्दोबदल नहीं कर सकते। हाँ, यह हो सकता है कि वेदों से उनका अभिप्राय किसी ने न समझा हो तो उसे पुराणों से उनका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। वेदों में ही इन्द्रशब्द का एक अर्थ परमेश्वर ही है—