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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 913

८३६ रामायणमीमांसा एकविंश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” (ऋ० सं० १।१६४।४६) अन्यत्र देवताविशेष इन्द्र है। प्रथम की शक्ति निःसीम है, दूसरे की शक्ति सीमित है। पुराणों में तथा मानस में इन्द्र का स्मरण देवताविशेष के रूप में ही किया गया है। पुराणों में ही अनेक स्थलों में परमेश्वर के रूप में भी इन्द्र का स्मरण हो गया है। यह ठीक है कि तुलसीदास का रामचरितमानस किसी सम्प्रदाय विशेष का ग्रन्थ नहीं है। किन्तु वह तो मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, पुराण तथा रामायण का अनुसरण करनेवाला ग्रन्थ है। जैसे उन्हीं वेदादि ग्रन्थों के आधार पर विभिन्न सम्प्रदाय अपना अपना सम्प्रदाय सिद्ध करते हैं, उसी तरह तुलसी के मानस से भी भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्त सिद्ध होते हैं। अतएव पुराणादि के समान ही सभी सम्प्रदाय के लोग रामचरितमानस का आदर करते हैं। परन्तु उन उन सम्प्रदायों के महान् महान् आचार्य हुए हैं और उन उन सम्प्रदायों में ईश्वरतुल्य पूज्य भी हुए हैं। परन्तु अन्य सम्प्रदायों में उनके ग्रन्थों की और उनकी उतनी मान्यता नहीं हो सकी है। सम्प्रदाय दर्शनों का अनुसरण करते हैं। उन्हें अनेक विषयों में अपना निर्णय देना पड़ता है। अतः उन निर्णयों का विरोध होना सम्भव है। जैसे सांख्य, योग, न्याय, वेदान्त, पूर्वोत्तरमीमांसा आदि के मतभेद होते हैं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि का कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं है। भले संविधान या कानूनों की विभिन्न धाराओं के विभिन्न न्यायवादी विभिन्न अर्थ करते हों फिर भी उन धाराओं का निश्चित अर्थ होता ही है। उसी का निर्णय करना न्यायालय का कर्तव्य होता है। व्यास, वसिष्ठ आदि के भी अपने निश्चित सिद्धान्त होते ही हैं। इस दृष्टि से तुलसी की भी कुछ निश्चित धारणाएँ हैं ही। यह कहना भी गलत है कि “इदमित्थं कहि जात न सोई” (रा० मा० १।१२०।१) यह अर्धाली ही उनकी मान्यता का सूत्र है।” क्योंकि इस रूप में तो यह भी कहा जा सकता है कि उनके राम भी पूर्ण सत्य नहीं हैं। वे भी सीमित ही सत्य हैं। परन्तु यह कथन श्रुति, स्मृति और युक्ति से विरुद्ध ही है। ब्रह्म का अवतार क्यों होता है केवल इसी अंश के लिए उक्त अर्धाली ठीक है, क्योंकि अनेक हेतु हो सकते हैं। यद्यपि ईश्वर मन और वाणी का विषय नहीं है। कोई तार्किक तर्क के द्वारा उसके विषय में ठीक अनुमान नहीं कर सकता। इसलिए ईश्वर के विषय में जो कुछ भी कहा जाय वह इदमित्थं (यह ऐसा ही) के रूप में सम्भव नहीं। तथापि वेदादि शास्त्रों के द्वारा तथा वेदादिशास्त्रानुसारी तर्कों के द्वारा भगवान् के वास्तविक रूप को साधनचतुष्टयसम्पन्न भगवदनुगृहीत साधक अवश्य ही जानता है। निःसंशय ज्ञान ही मुक्ति का हेतु है— “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” परमेश्वर के परम सत्यरूप का साक्षात्कार करके ही प्राणी मृत्यु का अतिक्रमण कर सकता है— ‘’नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’’ अन्य कोई भी पन्था भगवत्पदप्राप्ति का है ही नहीं। “संशयात्मा विनश्यति” संशयशील प्राणी नष्ट हो काता है। सीमित आपेक्षिक संशयात्मक ज्ञान अनर्थ का हेतु होता है। एक वस्तु में एक ज्ञान ही यथार्थ है। रज्जु में सर्प, धारा, माला, भूछिद्र आदि अनेक ज्ञान होते हैं, परन्तु उनमें समझौता संभव नहीं है। रज्जुज्ञान ही यथार्थ है और सब ज्ञान अयथार्थ हो हैं। ईश्वर मन और वाणी का विषय नहीं है। इसका अर्थ यही है कि ब्रह्म फलव्याप्ति का विषय नहीं है। वृत्त्यभिव्यक्त चैतन्य के द्वारा जैसे घटादि का प्रकाश होता है वैसे मनोवृत्त्यिव्यक्त चैतन्य के द्वारा ब्रह्म का प्रकाश नहीं होता। क्योंकि वह स्वप्रकाश है। स्वप्रकाश के लिए अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं होती है। परन्तु मनोवृत्ति द्वारा ब्रह्मावरक अज्ञान की निवृत्ति तो होती है। इसी लिए जैसे—