रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३७ “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।” (तै० उ० २।३) “यन्मनसा न मनुते, यद्वाचा नाभ्युदितम्” आदि श्रुतियों में ब्रह्म को मन, बुद्धि तथा वाणी का अविषय कहा गया है। वैसे ही “मनसैवानुद्रष्टव्यम्”, “दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या” आदि श्रुतियों में यह भी कहा गया है कि ब्रह्म मन के द्वारा जाना जाता है। श्रेष्ठ बुद्धि से ब्रह्म-दर्शन होता है। यह भी एक समन्वय है कि शास्त्राचार्योपदेशरूप संस्कार से संस्कृत मन या बुद्धि ब्रह्म को जानने में हेतु है। तद्रहित बुद्धि ब्रह्म-दर्शन में असमर्थ है। इसी तरह अभिधा शक्ति के द्वारा ब्रह्मवाणी या वेद ब्रह्म का बोध नहीं करा सकते । क्योंकि जिसमें जाति, गुण और क्रिया द्वारा या सम्बन्ध द्वारा अथवा स्वरूप द्वारा शब्द के साथ संकेतग्रह सम्भव है, उसी का बोध शब्द से हो सकता है। ब्रह्म रूपादिराहित होने से चाक्षुषादि प्रत्यक्ष का अविषय होने से स्वरूपेण निर्देशार्ह नहीं है। अतः उसका किसी शब्द के साथ सम्बन्धग्रह होना सम्भव नहीं है। डित्थः, डवित्थः आदि शब्दों की प्रवृत्ति स्वरूप से निर्देशयोग्य काष्ठमय मृग या काष्ठमय हस्ती में होती है ! ब्राह्मण, गौ आदि में जाति के निमित्त से शब्द की प्रवृत्ति होती है। नीलमुत्पलम् आदि में शब्द गुण के आधार पर तथा पाचक आदि शब्द क्रिया के बल पर प्रवृत्त होते हैं। धनी, गोमान् आदि शब्द सम्बन्ध के आधार पर प्रवृत्त होते हैं । समुदाय-शक्ति के आधार पर शब्द की प्रवृत्ति रूढ़िवृत्ति कही जाती है। अवयव-शक्ति से शब्द की प्रवृत्ति को योगवृत्ति कहते हैं। उभय योग से प्रवृत्ति को योगरूढ़ कहते हैं। गौः, ब्राह्मणः आदि शब्द रूढ़ शब्द हैं। पाचकः आदि योग शब्द हैं। पङ्कज आदि योगरूढ़ शब्द हैं । ब्रह्म में जाति, गुण, क्रिया का सम्बन्ध न होने से किसी तरह भी शब्दों की अभिधा वृत्ति से ब्रह्म में प्रवृत्ति नहीं होती है। सम्बन्ध न होने से लक्षणा वृत्ति से भी ब्रह्म में किसी शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिए कहा गया है कि कोई भी वाणी या वेद भी ब्रह्म का प्रकाशन नहीं कर सकते हैं। परन्तु सिद्धान्ततः तात्पर्या- नुपपत्तिमूलक लक्षणा के द्वारा आध्यासिक सम्बन्धवाले ब्रह्म में वेद और वेदान्त शब्दों की प्रवृत्ति होती है। इसलिए “सर्वे वेदाः यत्पदमामनन्ति”, “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” (गीता १५।१५) इत्यादि वचनों से ब्रह्म को वेदवेदान्त- वेद्य माना ही गया है। “मन्तव्य” श्रुति के द्वारा ब्रह्म में वेदानुसारी तर्क का भी अवकाश है ही। हाँ, अवतार के कारणों में तो अनेक कारण हो सकते हैं। अतः अमुक ही कारण है, यह नहीं कहा जा सकता है। वहाँ किसी को अकारण या सीमित सत्य कहने की आवश्यकता नहीं है । वैसे सिद्धान्त में भी अनेक वस्तुएँ सीमित सत्य कोटि में ही आती हैं। बल्कि यों कहना चाहिये कि परात्पर परब्रह्म भगवान् को छोड़कर इतर वस्तुएँ सीमित सत्य में ही हैं। विज्ञान के साथ वेदादि शास्त्रों के सिद्धान्त का मेल जितने अंशों में मिलता हो ठीक है। परन्तु विज्ञान का अभी तक कोई भी सिद्धान्त अन्तिम सिद्धान्त नहीं है। सर आइजक, न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त अन्तिम माना जाता रहा था वह आज धराशायी हो गया है। आज वह पूर्ण रीति से खण्डित हो चुका है। डार्विन, हैकल, स्पेंसर आदि के विकासवाद का सिद्धान्त भी पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। अतः विज्ञान के पीछे वेदादि शास्त्रों को चलाने की बात वैसे ही है जैसे किसी सभ्य पुरुष को किसी अन्धे और उन्मत्त भैंसे की पूंछ पकड़कर उसे उसके गन्तव्य स्थल पर पहुँच जाने का आश्वासन देना है। विज्ञान अल्पज्ञ एवं अल्पशक्तिमान् व्यक्तियों के दिमाग का परिणाम है। उनमें अनेक त्रुटियाँ हो सकती हैं। पूर्व काल में जिस गणित के आधार पर सम्पूर्ण यान्त्रिक व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं। आज उसमें भी परिवर्तन हो