भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 915, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 915

८३८ रामायणमीमांसा एकविंश गया है। यान्त्रिक आज भी प्रचलित है ही। इस विषय की विशेष जानकारी के लिए मेरे "मार्क्सवाद और राम- राज्य" ग्रन्थ का विकासवाद देखें। वेद सर्वज्ञ ईश्वर के निःश्वास होने से सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं। वेदोक्त साधनों के अनुष्ठान से ऋषि-महर्षि भी सर्वज्ञकल्प हुए हैं। उनके ज्ञान और विज्ञान अपूर्ण नहीं हैं। तुलसी का मानस उन्हीं शास्त्रों का सार है। वह तुलसी का निजी विचार नहीं है। यह मानस की अनेक पङ्क्तियों से सिद्ध है। संसार के सभी सत्य माया के भीतर की चीजें हैं। माया स्वयं ही भगवान् की सत्ता से ही सत्य प्रतीत होती है। जिस परम सत्य भगवान् से जड़ माया सत्यवत् प्रतीत होती है, वह भगवान् ही अन्तिम सत्य हैं। उनको बिना जाने मिथ्या जगत् एवं उसकी मूलभूत माया भी सत्य प्रतीत होती है। वही पारमार्थिक सत्य वस्तु है। अतएव यह कहना सर्वथा असत्य है कि "गोस्वामीजी किसी भी सिद्धान्त को अङ्गीकार करके तात्कालिक समस्या का समाधान कर लेते हैं। पर वे किसी भी सिद्धान्त को पूर्ण सत्य का पद देने को प्रस्तुत नहीं हैं", क्योंकि यह तो अवसरवादिता ही है। 'गोस्वामीजी किसी मत विशेष के घेरे में नहीं जाते', यह कहना भी अज्ञता ही है। क्योंकि गोस्वामीजी वेदवेदान्त-सिद्धान्त के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। श्रीराम उनकी दृष्टि में भी परम सत्य हैं। पूर्ण सत्य हैं। जो ऐसा नहीं मानता वह नास्तिक, अज्ञ और अभागा है। उसके मनमुकुर में पाप की काई लगी है, यह उनकी ही पङ्क्तियों से सिद्ध है। कहा जाता है— "कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ जुगल प्रबल कोउ माने। तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम तब आपन पहचाने ॥" इस पङ्क्ति में गोस्वामीजी कहते हैं कि कुछ लोग सृष्टि को मिथ्या, कुछ लोग सत्य एवं कुछ लोग सत्या- सत्य के रूप में प्रतिपादित करते हैं। पर ये तीनों भ्रम हैं।" परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्रानभिज्ञता के कारण ही उपर्युक्त भ्रम है। पङ्क्तियों का अर्थ आगे स्पष्ट होगा। "शून्य भोति पर चित्र रङ्ग नहि तनु बिनु लिखे चितेरे। धोये मिटै न मरइ भीति दुख पाइय यहि तनु हेरे॥ रविकर नीर बसे अतिदारुण मकररूप तेहि माहीं। वदनहीन सो ग्रसे चराचर पान करन जे जाहीं ॥ इन पङ्क्तियों का भी निष्कर्ष यही है कि यद्यपि दुनिया में बिना आधार के चित्र का उल्लेख नहीं हो सकता। बिना रङ्ग के और बिना शरीर के कोई चित्रकार चित्र नहीं लिख सकता है। चित्र धुल भी सकता है परन्तु जो चित्र धोने से भी नहीं धुल सकता है। परमेश्वर रूपी चित्रकार ने बिना आधार के ही जगच्चित्र का निर्माण किया है और बिना रङ्ग के यह चित्र बना है। चित्रकार को इसके निर्माण के लिए तन की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि वह तो बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है, बिना पैर के चलता है एवं बिना हाथ के नाना प्रकार के कर्म करता है। तन के बिना स्पर्श और घ्राण के विना सर्वविध गन्धों को ग्रहण करता है— "पग बिन चले सुने बिन काना। कर बिनु कर्म करे बिध नाना ॥ आनन रहित सकल रसभोगी। बिन बाणी बक्ता बड़ योगी ॥" (रा०मा० १।११७।३) तत्त्वज्ञान के बिना यह जगत् किसी के मिटाये मिट भी नहीं सकता। यह सब भी उनकी निजी बात नहीं है। किन्तु श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है। श्रुति भी यही कहती है—

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