भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 916

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३९ “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ॥” ( श्वेताश्व० उ० ३।१९ ) इसी बात को व्यतिरेकमुखेन शिवमहिम्न में कहा गया है ! ईश्वर किस प्रकार की चेष्टा द्वारा, किस शरीर से, किस उपाय से, किस आधार पर एवं किस उपादान से विश्व का निर्माण करता है, इत्यादि कुतर्क कुछ हतबुद्धि लोगों को जगत् में व्यामोह फैलाने के लिए मुखरित ( वाचाल ) करते हैं । प्रकृत में केवल सजातीय, विजातीय तथा स्वगत भेद से शून्य एक अद्वितीय स्वप्रकाश भगवान् से भिन्न होकर कुछ भी नहीं है । आधार के बिना, उपादान के बिना, शरीर के बिना और चेष्टा के बिना जगत् कैसे बन सकता है ? अतर्क्य ऐश्वर्यवाले कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ भगवान् में उक्त दुस्तर्क अनवसरग्रस्त हैं। उनकी अघटित- घटनापटीयसी माया सब कुछ कर सकती है और स्वयं मिथ्या होने पर भी उनकी सत्ता से सत्य होकर सत्य प्रपञ्च निर्माण बिना आधार आदि के कर सकती है, या वह भगवान् ही अपनी इस अचिन्त्य माया शक्ति के द्वारा बिना साधनों के भी उक्त जगच्चक्र का निर्माण कर सकते हैं । “किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च । अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥” यह संसार रविकरनीर अर्थात् मरुमरीचिका जल ही है। इस मृगतृष्णिकोदक में एक मोह रूपी मकर है जो वदनहीन होने पर भी वहाँ जलपान करने जो जाते हैं उन सभी चराचरों को ग्रस लेता है । यदि पानी ही सत्य नहीं तो उसमें सत्य मकर कैसे होगा ? फिर उसके मुख भी कहाँ ? फिर भी जब तक तत्त्व का साक्षात्कार नहीं होता, भ्रम नहीं मिट जाता, तब तक मिथ्या संसार व्यामोह सबको ग्रस्त करता ही है। “कोउ कह सत्य झूठ कह कोई” पङ्क्तियों का यह अर्थ है कि कुछ लोग जगत को सत्य ( अत्यन्ताबाध्य ) कहते हैं । कुछ झूठ वन्ध्यापुत्र तथा खपुष्पवत् अत्यन्त असत् कहते हैं । कुछ लोग सत् असत् उभयरूप मानते हैं । परन्तु ये तीनों ही पक्ष भ्रान्त हैं । त्रिविध भ्रम परित्याग से ही परमात्मज्ञान हो सकता है । जगत् ब्रह्म के समान सत् नहीं है, क्योंकि वह विनश्वर है, तत्त्वज्ञान से मिट जाता है । अत्यन्त असत् भी नहीं है, क्योंकि वह दुःखादि अनर्थ का मूल है। खपुष्पादि प्रतीत नहीं होते, यह प्रतीत होता है । “क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वानधिकरणत्वमसत्त्वम् ।” जो किसी स्थल में प्रतीयमानत्व धर्म का अधिकरण न हो अर्थात् कहीं सत् रूप से जिसकी प्रतीति न हो वही असत् है । ऐसे खपुष्पादि ही होते हैं, जगत् नहीं ? क्योंकि जगत् सत् रूप से प्रतीत भी होता है एवं इसमें कार्यकारण क्षमता भी है। अतः यह जगत् न सत् है, न असत् है और न सदसत् है । क्योंकि सत् और असत् दोनों विरुद्ध होने से दोनों का समन्वय हो ही नहीं सकता है । अतएव वेदान्त के अनुसार जगत् अनिर्वचनीय है । अविचाररमणीय, मिथ्या और झूठ शब्दों के दो अर्थ होते हैं । एक अपलाप या अत्यन्त असत् अर्थ है। दूसरा पूर्वोक्त सदसद्विलक्षण अविचारितरमणीय अनिर्वचनीय अर्थ है । इसी लिए अध्यासभाष्य में भाष्यकार ने कहा है—मिथ्याशब्दो नापह्नववचनः किन्त्वनिर्वचनीयतावचनः । आक्षेप- भाष्य में मिथ्याशब्द का अर्थ अपह्नव अपलाप अर्थात् इनकार करना है। अनिर्वचनीयता यहाँ मिथ्या शब्द का अर्थ अभिप्रेत नहीं है !