रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४० रामायणमीमांसा एकविंश लोक में जैसी वस्तु है उसे वैसा न कहकर उल्टा कहनेवाले को मिथ्यावादी कहा जाता है। बौद्धों का शून्य कोटिचतुष्टयविनिर्मुक्त कहा जाता है। वह सत्, असत्, सदसत् और सदसद्विलक्षण इन चारों पक्षों से भिन्न है। नास्ति बुद्धि का गोचर न होने से बौद्ध शून्य को असत् से विलक्षण मानते हैं। वेदान्तियों का ब्रह्म कोटिचतुष्टयविनिर्मुक्त है। परन्तु उसका अर्थ बौद्धों के अर्थ से अलग यह है कि वह ब्रह्म असत्कार्यवादी नैयायिकों तथा वैशेषिकों एवं असत् कारणवादी बौद्धों के समान असत् नहीं है। सांख्ययोग के सत्कार्यवाद के अनुसार ब्रह्म सत् नहीं है। अनेकान्तवादी के समान ब्रह्म सत्-असत् रूप नहीं है। वेदान्तियों के सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय जगत् के समान ब्रह्म अनिर्वचनीय नहीं है। किन्तु चारों से विलक्षण अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश सत् रूप है। “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” ( छा० उ० ६।२।१ ), “अस्तीत्ये- वोपलब्धव्यः ।” ( उपनिषद् ) यदि झूठ का अर्थ वेदान्तियों का मिथ्यात्व स्वीकार किया जायगा और युगल प्रबल का अर्थ पूर्वोक्त दोनों पक्षों का समुच्चय सत्यासत्य कहा जायेगा तो वह असम्भव ही होगा। क्योंकि वैसा किसी भी दार्शनिक का पक्ष ही नहीं। जगत् को सत्य भी मिथ्या भी दोनों मानना सर्वथा असम्भव है। “करम उपासन ज्ञान वेदमति सो सब भांति खरो” इस पद के पूर्वोक्त-“तुलसीदास परिहरै तीनि भ्रम सो आपन पहचाने” इस पूर्वोक्त से विरुद्ध समझना भी गलत है, क्योंकि भगवान् की सत्यता से ही माया भी सत्य है, जगत् भी सत्य है। यह कहा ही जा चुका है। कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों ही निश्चितरूप से अपना फल प्रदान करते हैं। उनका अपने अपने फल के साथ कार्य-कारणभाव सत्य है। अव्यभिचरित है, व्यभिचरित नहीं । यही उसका खरा होना है। जेहि जाने जग जाई हेराई । जागे यथा स्वप्नभ्रम जाई ॥” ( रा० मा० १।१११।१ ) “एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । यदपि असत्य देत दुख अहई ॥” ( रा० मा० १।११७ १ ) जग नभवाटिका रही है फल फूलि रे । धुवां कैसे धौरहर देख तू न भूलि रे ॥” गोस्वामीजी इन पूर्वोक्त वर्णनों से भी सृष्टि के मिथ्यात्व का ही प्रतिपादन करते हैं। यह भी कहना गलत है कि “इस समाधान को एक सीमा तक गोस्वामीजी यत्र तत्र स्वीकार करते हैं। परन्तु वह सिद्धान्त भी किन्हीं कसौटियों पर खरा नहीं उतरा । अतएव सैद्धान्तिक दृष्टि से उसे भी भ्रम अथवा सीमित सत्य का ही नाम देना होगा” क्योंकि मानस में इसका विरोधी कोई वचन नहीं है। शिवजी के द्वारा इस प्रसङ्ग में राम और जगत् दोनों के याथात्म्य का वर्णन है। जगत् का मिथ्या होना या सीमित सत्य होना दोनों एक ही बात है। हम कह ही चुके हैं कि शुक्ति-रजत एवं रज्जु-सर्प के समान होता हुआ भी संसार शुक्ति, रज्जु आदि के समान सत्य ही माना जाता है। इसी लिए जैसे व्यवहार में कल्पित सर्प और रजत बाधित होते हैं, उसी तरह उसके अधिष्ठानभूत शुक्ति और रज्जु बाधित नहीं होते। वेदान्त में घट, रज्जु, शुक्ति आदि को भी मिथ्या कहा गया है। किन्तु घट के कारण मृत्तिका आदि को सत्य कहा गया है --- “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ।” ( छा० उ० ६।१।४ ) इसी तरह मृत्तिकादि कारण भी अपने कारण की अपेक्षा कार्य विकार होने से मिथ्या हैं। अन्तिम परम कारण या कार्यकारणातीत राम ही परम सत्य हैं। तद्भिन्न सब मिथ्या या सीमित सत्य ही कहे जा सकते हैं। परन्तु सर्वाधिष्ठानभूत भगवान् परम सत्य हैं। सत्य के भी सत्य हैं। उन्हें सीमित सत्य नहीं कहा जा सकता।