भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 918

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४१ मङ्गलाचरण में प्रायः ग्रन्थकार अपना सिद्धान्त ही प्रतिपादन करता है। गोस्वामीजी मङ्गलाचरण में अपने इष्ट देवता भगवान् राम की वन्दना करते हुए कहते हैं— सम्पूर्ण ब्रह्मादि देव एवं असुरसङ्घ सभी जिनकी माया के वशवर्ती हैं जिनके सत्त्व अर्थात् सत्ता से सब कुछ वैसे ही अमृषा अर्थात् सत्य प्रतीत होता है जैसे रज्जु में सर्प का भ्रम सत्य ही प्रतीत होता है एवं भवाम्भोधि तरने की इच्छावालों के लिए जिनके पादारविन्द ही प्लव-जहाज हैं, उन अशेष कारण रामनामवाले सर्वोत्कृष्ट ईश्वर हरि की मैं वन्दना करता हूँ— “यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवा सुरा यत्सत्त्वादमृषेव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः । यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हृदि ॥” रज्जु में सर्प-भ्रम के समान भगवान् में सकल प्रपञ्च है। ऐसा मङ्गलाचरण जगत् के मिथ्यात्व को अङ्गीकार करनेवाले ही करते हैं, अन्य नहीं । भगवान् शिव भी कथारम्भ के पहले मङ्गलाचरण उसी ढङ्ग से करते हैं— “झूठेउ सत्य जाहि बिन जाने । जिमि भुजंग बिन रजु पहिचाने ॥ जेहि जाने जग जाइ हेराई । जागे यथा स्वप्नभ्रम जाई ॥ बन्दउँ बालरूप सोइ रामू । सब निधि सुलभ जपत जस नामू ।” (रा०मा० १।१११।१,२) झूठा भी जगत् जिसको बिना जाने सत्य प्रतीत होता है। जैसे बिना रज्जु को पहचाने सर्प सत्य प्रतीत होता है। जिसको जानने से जगत् हराय जाता है, अत्यन्त बाधित हो जाता है। जगत् का पता नहीं लगता । जैसे जाग जाने पर स्वप्न चला जाता है। स्वप्न की वस्तुओं का कहीं पता भी नहीं लगता । उन बालरूप राम की मैं वन्दना करता हूँ। जिनका नाम जपने से सब प्रकार की सिद्धियां सुलभ हो जाती हैं। अपने भगवान् राम का ही स्वरूप निरूपण करते हुए भगवान् शिव कहते हैं— “जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ज्ञान गुन धामू । जासु सत्यताते जड़ माया । भास सत्य इव मोहसहाया ॥ (रा० मा० १।११६।४) “रजत सीप महँ भास जिमि यथा भानुकर बारि । यद्यपि मृषा तिहुं काल सोइ भ्रम न सकै कोउ टारि ॥ (रा० मा० १।११७) अव्यक्तादि विकारान्त सारा जगत् प्रकाश्य है। प्रकाशक अखण्डबोध राम हैं। जिसकी सत्यता से जड़ माया भी मोह की सहायता से सत्य प्रतीत होती है। यद्यपि सीप में रजत तथा सूर्यरश्मि में जल तीनों कालों में सम्भव नहीं, मिथ्या ही है तथापि जब तक सीप और सूर्यरश्मि का अपरोक्ष साक्षात्कार न हो तब तक उस भ्रम को कोई टाल नहीं सकता है। “एहि विधि जग हरि आश्रित रहई । यदपि असत्य देत दुख अहई ।।” (रा० मा० १।११७।१) इसी तरह जगत् हरि में आश्रित है। वह यद्यपि असत्य ही है तथापि वह दुःखदायी है ही। जैसे कोई स्वप्न में किसी का सिर काटता हो भले वह मिथ्या ही है तथापि जब तक मनुष्य जाग नहीं जाता तब तक स्वप्न के सिर काटने का दुःख होता ही है— “जो सपने सिर काटे कोई । बिन जागे दुख दूर न होई ॥ जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ।।” (रा०मा० १।११७।१,२) १०६