रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४२ रामायणमीमांसा एकत्रिंश इससे बढ़कर कौन सी कसौटी चाहिये, जगत् की असत्यता में और भगवान् की सत्यता में। इसके विरोध में तुलसी, शिव, याज्ञवल्क्य, भुशुण्डि किसी ने कहीं भी कुछ नहीं कहा। फिर इन सिद्धान्त-वचनों को असत्य कैसे कहा जा सकता है। "सुनि शिव के भ्रमभंजन बचना। मिट गइ सब कुतर्क की रचना ॥" (रा० मा० १।११८।४) भगवान् सिव के भवभञ्जन वचन में भी भ्रम की कल्पना सचमुच मोह एवं अहङ्कार रूपी भूत की ही करामात है। इसी प्रकार कर्मसिद्धान्त भी सिद्धान्त ही है। "कर्मप्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥" (रा० मा० १।२१७।१) गोस्वामीजी भी यही कहते हैं— "यद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पुन्य पाप गुन दोषू ॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा० मा० २।२१७।२, ३) कर्मसिद्धान्त की व्यावहारिक स्थिति का सांकर्य करना असंगत ही है। भले ही किसी व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार मरना हो तथापि मारनेवाला यह कहकर मुक्त नहीं हो सकता कि वह अपने कर्म के अनुसार मरा है। इसमें हमारा दोष नहीं। किसी को फाँसी की सजा भी सुनायी गयी हो तथापि फांसी देने के लिए अधिकृत व्यक्ति ही. उसे फाँसी दे सकता है। अनधिकृत व्यक्ति वैसा करेगा तो वह स्वयं ही दण्ड का भागी होगा। हर व्यक्ति के सामने अपना कर्तव्य है। भले ही व्यवहार में मुकाबले में प्रहार करनेवाले के प्रहार को विफल करने का एवं अपने रन्ध्रों के गोपन पर रन्ध्रान्वेषण करके प्रहर्त्ता को दण्ड देने का प्रयास भी किया जाता है और वैसा करना नीतिशास्त्र से सम्मत है। वैसा न करना ही दोष है। जैसा कि भगवान् ने कहा है कि—अर्जुन ! यदि तुम धर्मयुक्त संग्राम से मुँह मोड़ोगे तो स्वधर्म एवं कीर्ति को त्यागकर पाप के भागी बनोगे— "अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिञ्च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥" (गीता २।३३) अतः वह विचार गलत है जो तुमने सोचा था कि यदि प्रतीकार न करनेवाले और शस्त्र न उठानेवाले मुझपर शस्त्रपाणि दुर्योधनादि धार्तराष्ट्र प्रहार कर हनन करेंगे तो यह मेरे लिए अच्छा है— "यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥" (गीता १।४६) प्रारब्ध दैव और प्राक्तन कर्म सिद्धान्त को समझनेवाला व्यक्ति किसी भी इष्टानिष्ट घटनाओं के घट जाने पर उन्हें प्रारब्धजनित जानकर शोक-मोहरहित होकर रागद्वेष से अलिप्त होकर कर्तव्य पालन में लगता है। सामान्यतया दैव अदृष्ट प्रारब्ध कर्म अचिन्त्य होता है। फल के पहले उसका ज्ञान ही नहीं होता है। वह फलबल से ही कल्प्य होता है। फल होने के बाद दैव का ज्ञान होता है। परन्तु तब वह रहता ही नहीं, फिर उससे युद्ध कैसा ? यही बात श्रीराम ने लक्ष्मण को समझाते हुए तब कही थी जब उन्होंने कहा था कि आज मेरे बाणों से विदीर्ण हो रणाङ्गण में पड़े हुए दैव को लोग देखेंगे।