रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 920, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४३ "यदचिन्त्यं तु तद्देवम्......।।" (वा० रा० १।२२।२०) तीव्रतम पुरुषार्थ करने पर भी सफलता नहीं मिलती तब फलबलकल्प्य प्रबल दैव को जानकर संतोष किया जा सकता है। यही अभिप्राय निम्नोक्त वचनों का है— "काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता। निजकृत करम भोग सुन भ्राता।।" "सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता। परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।।" इत्यादि अधिक सूक्ष्म विचार करने पर यह भी सिद्ध होता है कि संसार में वास्तव में कोई शत्रु या मित्र नहीं। अपने आप ही प्राणी अपना मित्र है और वही अपना शत्रु है—"आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" (गीता ६।५) प्राणी का शुभ कर्म ही उसका मित्र बनकर सुख देता है। उसका अशुभ कर्म ही उसका शत्रु बन उसे दुःख देता है। अतः व्यावहारिकरूप से धर्मशास्त्र तथा नीतिशास्त्र के अनुसार देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार उचित कर्तव्य पालन करते हुए भी प्राणी राग-द्वेष से मुक्त होकर स्वस्थ शोकमोहातीत हो सकता है। यह कहना भी गलत है कि "कर्मसिद्धान्त अकाट्य प्रमाणित नहीं है। यह सिद्धान्त जितना शक्तिशाली है मूलका प्रश्न आते ही इसकी निर्बलता उतनी ही प्रकट होती है। यदि कर्म के अभाव में सृष्टि संभव न हो तो विश्वोद्भव के प्रथम अवसर पर कर्म का निर्माण कैसे हुआ ? यदि पूर्व में कर्म नहीं था तो सृष्टि कैसे बनी ? पर यदि सृष्टि ही न होगी तो कर्म कैसे होगा ? अतः कर्म और सृष्टि के आदि का विचार करते हुए असंगति लगने लगती है। अनादि कहकर मूल पर विचार करने की परिस्थिति से बचने की प्रवृत्ति यहाँ स्पष्ट हो जाती है।" क्योंकि यह सब शास्त्रीय व्यवस्थाओं के न जानने का परिणाम है। सब ज्ञान मानस से ही नहीं होगा। शास्त्रों की भी अपेक्षा है। विवाह, जनेऊ आदि संस्कार भी केवल मानस की चौपाइयों से ही कराने की कोशिश करना मानस- भक्ति का दुरुपयोग ही है। ब्रह्मसूत्र में विचार—श्रुति कहती है कि परमेश्वर जिसे उत्कृष्ट ब्रह्म, इन्द्र आदि लोकों में ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है। ईश्वर जिसे निकृष्ट लोकों में ले जाना चाहता है उसे निकृष्ट कर्मों में लगा देता है—"एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते" (कौ० उ० ३।८) परन्तु ऐसी स्थिति में ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष उपस्थित होते हैं। वह क्यों किसी से साधु कर्म कराता है और क्यों किसी से असाधु कर्म कराता है ? क्यों किसी को उत्कृष्ट लोक में ले जाता है एवं क्यों किसी को निकृष्ट लोकों में ले जाता है ? वह तो सर्वत्र समान है। उसका कोई द्वेष्य अप्रिय नहीं है। फिर ऐसी विषम सृष्टि रचना से किसी को उन्नत और किसी को दीन-हीन, दरिद्र, दुःखी बनाने से तो उसमें विषमता, निर्दयता आदि दोष उपस्थित होते ही हैं। इन सब बातों का समाधान करते हुए कहा गया है कि "वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति (ब्र० सू० २।१।३४) ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष नहीं होंगे, क्योंकि वह कर्मसापेक्ष होकर कर्मों के अनुसार ही विषम सृष्टि की रचना करता है। प्राणियों के कर्मों की विषमता से ही सृष्टि में विषमता होती है। वृष्टि होने पर धरित्री से विविध विलक्षण पौधे उत्पन्न होते हैं। बीजों की विलक्षणता से ही पौधों में विलक्षणता होती है। शासन भी कर्मों के अनुसार ही निग्रहानुग्रह करता है। वैसे ही परमेश्वर भी कर्मों के अनुसार ही प्राणियों को विविध देह तथा सुख, दुःख एवं तदनुगुण सामग्रियाँ प्रदान करता है। ऐसी स्थिति में विश्वोद्भव के प्रथम अवसर का प्रश्न ही नहीं उठता है।