रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४४ रामायणमीमांसा एकविंश कर्म और सृष्टि की परम्परा को अनादि कहना मूल विचार से बचने की प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु वस्तुस्थिति है । आम की गुठली और आम के पौधे की धारा या किसी भी बीज और अङ्कुर की धारा को अनादि बिना स्वीकार किये कैसे समाधान होगा ? वहाँ अनादि कल्पना अन्धपरम्परा कही जाती है जहाँ कार्यकारणभाव के निर्णयार्थ अनादिता का सहारा लेना पड़ता है । प्रकृत में तो स्पष्ट ही बीज से अङ्कुर और अङ्कुर से बीज उत्पन्न होते हुए दिखायी देते हैं । अतः बीज एवं अङ्कुर की अनादि धारा मान्य ही हैं । जगने पर व्यक्ति के मन में सोने से पहले के संस्कार जग उठते हैं । पूर्व पूर्व दिनों के अनुसार ही उत्तरोत्तर दिनों के सब व्यवहार चलते हैं । अतएव सोने तथा जगने की धारा की अनादिता स्पष्ट ही है । जन्म-मरण एवं सृष्टि-प्रलय भी एक प्रकार का सोना-जागना ही है । किसी कारण अत्यन्त विस्मृति होना ही मृत्यु है और सर्वरूप से विषयों की स्वीकृति ही जन्म है— “जन्तौर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युर्त्यन्तविस्मृतिः । जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद ॥ विषयस्वीकृतिं प्राहुर्रथा स्वप्नमनोरथौ ॥” अतः जब सोने और जगने की धारा अनादि हैं ही तब इसी तरह जन्म-मरण और सृष्टि-प्रलय की धारा को भी अनादि मानना उचित ही है । अनादि पदार्थ नहीं हैं यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जीव और ईश्वर अनादि रूप से सबको मान्य हैं ही । ‘ प्रकृतिं पुरुषञ्चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।’ ( गीता० १३।१९ ) उसी अनादि जीव के सम्बन्ध से अनादि जन्म-मरण की धारा चलती है । अनादि ईश्वर के आश्रित अनादि सृष्टि से संहार की परम्परा मान्य है । जैसे कर्मों के अनुसार जन्म-मरण की धारा चलती है। वैसे कर्त्रों के अनुसार ही सृष्टि-प्रलय की धारा भी चलती है । अनादि होने पर भी जैसे पाकज क्रिया से परमाणु की श्यामता नष्ट होती है एवं बीज में अनादि परम्पराप्राप्त अङ्कुरोत्पादिनी शक्ति बीजाग्निसंयोग से नष्ट हो जाती है, वैसे ही अनादि होने पर भी तत्त्वज्ञान के सम्बन्ध से अनादि सृष्टि कर्म की धारा तथा कर्म जन्म धारा बन्द हो जाती है। अतएव माया, जीव आदि अनादि सान्त होते हैं । केवल एक परमेश्वर ही अनादि-अनन्त होता है। इसलिए अनादि माया, अज्ञान एवं संसार की बाधसामग्री ब्रह्मात्मज्ञान है और अनादि ब्रह्म के बाध की सामग्री नहीं है । अतः वह अनन्त है । सुख, दुःख, सम्पत्ति, विपत्ति सब व्यावहारिक लौकिक वस्तुएँ हैं उन्हीं की व्यवस्थाओं का नियामक कर्म हैं । परन्तु तत्त्वज्ञान के द्वारा जैसे माया अज्ञान कार्य संसार बाधित हो जाता है। वैसे ही कर्म भी बाधित हो जाता है— “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ।” ( मु० उ० २।२।८ ) परावर ब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार होने पर हृदयग्रन्थि ( आत्मा एवं अनात्मा का अन्योन्याध्यास ) भिन्न हो जाती हैं । सत्य रज्जु की ग्रन्थि तो ज्ञानमात्र से नहीं खुलती और खुलने पर भी दोनों रस्सियां विद्यमान रहती हैं । परन्तु चिज्जड की ग्रन्थि तो सत्यानृत की ग्रन्थि है। यहाँ तो ग्रन्थि खुलने पर सत्य ही रह जाता है । अनृत मिट जाता है । तभी तो तुलसी ने इसे मृषा मिथ्या कहा है—