भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 922, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 922

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४५ “जड़ चेतनहि ग्रन्थि परि गयी। यद्यपि मृषा छूटत कठिनयी ॥ सब संशय छिन्न हो जाते हैं। प्रारब्ध से अतिरिक्त सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। गीता भी कहती है— “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।” ( गीता ४।३७ ) जब सुख, दुःख, हानि लाभ नहीं तब कर्म का उपयोग भी क्या है ? इसी लिए लखनलाल ठीक ही कहते हैं कि— “योग वियोग भोग भल मन्दा । हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा ॥ जनम करम जहँ लगि जग जालू । संपति विपति करम अरु कालू ॥ देखिय सुनिय गुनिय मन माहीं । मोहमूल परमारथ नाहीं ।। (रा० मा० २।९१।३,४) एक ब्रह्म ही भगवान् ही परमार्थ परम सत्य है । तद्भिन्न सब कुछ मोहमूलक है । परमार्थ नहीं है, मिथ्या है, सीमित सत्य है। यह भी सृष्टि के मिथ्यात्व की कसौटी ही तो है। “सपने होइ भिखारि नृप रङ्क नाकपति होइ । जागे हानि न लाभ कछु तिमि प्रपञ्च जग जोइ ।।” ( रा० मा० २।९१ ) इतने स्पष्ट रूप से प्रपञ्च का मिथ्यात्व परमेश्वर का परम सत्यत्व वर्णित होने पर भी मानस के नाम पर सभी सत्यों को सीमित कहकर अव्यवस्था फैलाना अनुचित है । यदि ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से सुख, दुःखादि प्रपञ्च बाधित हो सकते हैं तब यही तो उसका मिथ्यात्व है । वासनानिवृत्ति, वैराग्य आदि तो वास्तविक ज्ञानाभ्यास के सहभावी होते हैं । तत्त्वज्ञान, मनोनाश, वासनाक्षय का सहाभ्यास हो लाभदायक होता है। जब तत्त्वज्ञान से दृश्य प्रपञ्च का मार्जन हो जाता है तब निर्दृश्य विशुद्ध ब्रह्मात्मा का अवशेष रहता है । फिर चित्त की एकाग्रता या मनोनाश तथा वासनाक्षय होने से पूर्ण जीवन्मुक्ति होती ही है । अतएव मिथ्यात्व सिद्धान्त के साथ वैराग्य के दृष्टिकोण को जोड़ लेने का प्रश्न ही नहीं उठता । “मोह निशा सब सोवनि हारा । देखिय सपन अनेक प्रकारा ॥ एहि जग जामिनि जागहिं योगी । परमारथी प्रपञ्च बियोगी ॥ जानिय तबहिं जीव जब जागा । जब सब विषय विलास बिरागा ॥ होइ बिबेक मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथचरन अनुरागा ।।” (रा०मा०२।९२।१-३) श्रीराम ही परमार्थ सत्य हैं। तद्भिन्न सब अपरमार्थ है। व्यावहारिक या सीमित सत्य है । वस्तुतः शास्त्रों के प्रसिद्ध सिद्धान्तों का ही मानस में वर्णन है। राम ने, लक्ष्मण ने, भरत ने एवं शिवजी ने कोई नया सिद्धान्त नहीं कहा ।- राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अचल अनादि अनूपा ॥ सकल बिकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ।।” (रा०मा०२।९२।३) मिथ्यात्व सिद्धान्त किस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, यह नहीं दिखलाया गया । प्रतिज्ञामात्र से वस्तु- सिद्ध नहीं होती । उसके लिए प्रमाण की अपेक्षा होती है । कहा जाता है कि “बाह्य वर्णव्यवस्था के स्थान पर आन्तर मन की वर्णव्यवस्था को बनाकर विचार करना चाहिये । बाह्य व्यवहार में हम अपने वर्गविशेष से इतने बँध चुके हैं कि सत्य भी हममें आक्रोश की सृष्टि करता है। वह संघर्ष अपनों और परायों का भी बन जाता है। आन्तर में भी वही भेद हैं। पर वहाँ अपने पराये