रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 923, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें[८४६ : रामायणमीमांसा : एकविंश]
का भेद नहीं है । सत्ता की भूख, ऐश्वर्य की भूख एवं शरीर की भूख यह तो जीवन के साथ जुड़ी हुई है। हमारा मन अलग अलग समयों में किसी को महत्त्व देता रहता है । सत्ता की भूख ही मन का क्षत्रियत्व है। कभी वैभव ऐश्वर्य के लिए योजना बनाता है तब मन का वैश्यत्व जाग उठता है । कभी शरीर की आवश्यकता की पूति के लिए व्यग्र हो उठता है, यह मन का शूद्रभाव है। जब मन ऊँचे आदर्शों की ओर प्रेरित होता है। व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति से हटकर समाज के कल्याण की भावना से भर उठता है। सुख-सुविधाओं को छोड़कर कष्ट और तप का जीवन अपनाना चाहता है यही वृत्ति ब्राह्मण है।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त गुण तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब में ही समय समय पर आविर्भूत होते ही रहते हैं। फिर तो इससे कोई व्यवस्था नहीं बनती है। आप स्वयं मानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के लिए एक सी मनःस्थिति न सदा सम्भव ही है न आवश्यक ही है। ऐसी स्थिति में व्यवहारतः किसको ब्राह्मण एवं किसको क्षत्रियादि कहा जाय ? ब्राह्मण मनोवृत्ति आवश्यक है तो सभी के लिए आवश्यक है । वस्तुतः शास्त्रों में तो ब्राह्मणादि वर्णव्यवस्था संस्कारों एवं कर्मों के लिए अपेक्षित है। जैसे ब्राह्मण का वसन्त में उपनयन किया जाय, क्षत्रिय का ग्रीष्म में एवं वैश्य का शरद् में। शूद्र का उपनयन संस्कार नहीं, जिनका उपनयन संस्कार होगा वही वेदाध्ययन एवं वेदार्थानुष्ठान के अधिकारी होंगे। प्रश्न तो यह है कि यदि जन्मना शूद्र में ब्राह्मण या क्षत्रिय की वृत्ति पैदा हो जाय तो उसे वेदाध्ययन, वेदार्थानुष्ठान का अधिकार है या नहीं ? निषाद में बड़े उत्तम गुण आ गये थे । क्या उसको ब्राह्मण मान लिया गया था और उसे वेदाध्ययन एवं वेदोक्त यज्ञों के अनुष्ठान का अधिकार मिल गया था ? शास्त्रों की दृष्टि से तो यह सब असम्भव ही है। वाजपेय यज्ञ में ब्राह्मण और क्षत्रिय का ही अधिकार है। राजसूय में केवल क्षत्रिय का एवं जन्मना क्षत्रिय का ही अधिकार है। वैश्यस्तोम में वैश्य का ही अधिकार है। किसी कर्म में निषाद का एवं किसी में रथकार जाति का ही अधिकार है। इन सब बातों का वृत्ति और गुण से मुख्य सम्बन्ध नहीं है । जैसे सिंह से सिंही में उत्पन्न एवं शौर्य, क्रौर्यादि गुणों से युक्त मुख्य सिंह होता है । केवल गुण होने से मनुष्य को भी सिंह कहा जा सकता है। परन्तु गुण न होने पर योनिमात्र सम्बन्ध से जातिसिंह का ही व्यवहार होता है । निकृष्ट अधम यहाँ तक कि मृत सिंह को भी सिंह ही कहा जाता है। ठीक इसी तरह विद्या, तप और योनि तीनों के होने पर मुख्य ब्राह्मण होता है । विद्या और तप न होने से तो केवल जातिब्राह्मण ही होता है। यह महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलि का कहना है— “विद्या तपश्च योनिश्च त्रयं ब्राह्मणकारणम् । विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ॥” शास्त्रों में साङ्कर्य को महान् दोष माना गया है। अब यदि वृत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण माने जायें तब तो ब्राह्मण पति-पत्नी में भी समय समय पर वृत्ति एवं गुणों में रद्दोबदल होता ही है । इस स्थिति में यदि पत्नी में ब्राह्मण गुण बढ़े हों पति में क्षत्रिय या शूद्रगुण आ गये हों तब तो आपके मत से चाण्डाल आदि प्रतिलोम सङ्करों की सृष्टि सम्भव है ही । नामकरण में व्यवस्था है और जन्म से दस दिनों के बाद ही नामकरण संस्कार होता है। दस दिन के बालक में ब्राह्मण, क्षत्रियादि वृत्तियों का निर्णय होना संभव ही न होगा। अतः शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि नाम- करण कैसे होगा ? अतएव वेदों में जन्मना वर्णव्यवस्था का ही वर्णन है । “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥”