रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 924, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४७ यह मन्त्र ऋक्, यजु एवं अथर्व तीनों ही वेदों में आता है। साम तो ऋग्वेद के मन्त्रों का गीतिविशेष ही है। इस मन्त्र में यह सन्देह हो सकता था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भगवान् के मुख, बाहु और ऊरु रूप कहे गये हैं। मन्त्र में यह नहीं कहा गया है कि भगवान् के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ है। परन्तु "पद्भ्यां शूद्रोऽजायत" इस अन्तिम पङ्क्ति से स्पष्ट निर्णय हो जाता है। जैसे शूद्र भगवान् के पैर से उत्पन्न हुआ है वैसे ही ब्राह्मणादि भगवान् के मुखादि से ही उत्पन्न हुए हैं। जैसे मृद् (मिट्टी) से उत्पन्न घट के साथ मृद् का "मृद् घटः" इस प्रकार सामानाधिकरण्य देखा जाता है। उसी तरह मुख से जन्म होने के कारण 'ब्राह्मणो मुखम्' यह सामानाधिकरण्य है। इसी का स्पष्टीकरण करते हुए मनु ने "मुखबाहूरुपज्जानाम्" इस पद्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को मुखबाहूरूपज्ज कहा है। अर्थात् ब्राह्मणादि भगवान् के मुखादि से उत्पन्न हुए हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में श्वयोनि, सूकरयोनि के समान ही ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि, शूद्रयोनि तथा चाण्डाल योनि का वर्णन किया है। "तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा ।।" (छा० उ० ५।१०।७) अतः जैसे श्वयोनि, सूकरयोनि में जन्म पाने पर जब तक वह देह रहता है जाति नहीं बदल सकती है वैसे ही ब्राह्मणादि जातियों में भी यावत् देह जाति रहती है तब तक जाति नहीं बदल सकती है। जहाँ भी कहीं कर्म या गुण से जाति का वर्णन है वह वैसे ही गौण ब्राह्मणादि का वर्णन है जैसे सिंह के गुण होने से मनुष्य को भी सिंह गौणी वृत्ति से कहा जाता है। मनुष्य मुख्य सिंह नहीं ही कहा जाता है। अवश्य ही उत्तम गुण होने से उत्तम जाति में जन्म होता है। कुछ लोग कहते हैं कि हनुमान्जी ने रावण के बगीचों के फल खाये । रावण उसको चोरी कहता है । परन्तु हनुमान् की दृष्टि में सारी वस्तु-सम्पत्ति परमेश्वर की है, राम की है। रावण की सम्पत्ति ही नहीं थी । बलि ने वामन भगवान् को दान लेने को कहा, परन्तु यह उसका साहस था । उसकी वस्तु ही क्या थी जो वह देता । वस्तु तो सब भगवान् की ही थी। परन्तु यह सब बुद्धि का अतिरेक ही है। यह बात पीछे भी कही जा चुकी है कि व्यावहारिक सत्ता का अपलाप करने से शास्त्रीय व्यवहार भी बाधित होते हैं। अवश्य अनन्तकोटि ब्रह्माण्डाधिपति परमेश्वर का ही सब कुछ है। तब भी शास्त्रों में जीवों के लिए यज्ञ, दान, व्रत आदि का विधान है और वह सब धन-सम्पत्ति होने पर ही संभव है। यदि जीव का अपना कुछ है ही नहीं तो अन्नदान, अश्वदान आदि कैसे बनेगा ? भगवान् की ही दी हुई वस्तुओं को भगवान् में अर्पित करके भक्त निहाल होता है- "त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये" सूर्य के दिये हुए जल से सूर्य भगवान् को जलाञ्जलि दी जाती है। सूर्य के ही अंश दीप से सूर्य की आरती उतारी जाती है। जैसे सब भूमि राजा की होने पर भी अवान्तर स्वत्व करद राजाओं, जागीर- दारों, काश्तकारों का भी उन उन भूमियों पर होता ही है। राजा को कोई भूमि लेना हो तो उसका प्रतिकर या मुआवजा देना ही पड़ता है। मनमानी अपहरण की बात नहीं चलती है। कई बार ऐसी कार्यवाहियाँ न्यायालयों से अवैध घोषित होती रहती हैं। भले रावण भी भगवान् की शक्ति सीता को चुरानेवाला चोर था । फिर भी इतनेमात्र से चोर की वैध सम्पत्ति भी अवैध नहीं हो जाती है। परन्तु यदि व्यक्तिगत सम्पत्ति मान्य ही नहीं तब जो चोर नहीं हैं उनकी भी