भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 925

८४८ रामायणमीमांसा एकविंश सम्पत्ति उनकी न मानी जायगी। फिर तो कोई डाकू और चोर भी किसी मालिक से कह सकता है कि तुम्हारी सम्पत्ति ही नहीं है यह तो भगवान् की है। फिर तो यह जैसे तुम्हारी है वैसे ही हमारी है। पर क्या यह कथन उचित होगा ? वस्तुतः उक्त प्रसङ्ग में हनुमान् पर चौर्य का आरोप था भी नही ओर हो भी नहीं सकता था, क्योंकि युद्ध ठन जाने पर एक राजा दूसरे की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर देता है। इसी दृष्टि से राजसूय यज्ञ में राजाओं को जीतकर उनका धन लाकर यज्ञ के काम में लगाया जाता है। जैसे दाय से सम्पत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त होता है, वैसे ही जय के द्वारा भी सम्पत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त होता है— “सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभो जयः क्रयः ।” ( मनु १०।११५ ) रावण भी देवताओं को जीतकर उनके विविध रत्नों का स्वामी हुआ था। लङ्का भी तो कुबेर की ही थी। उसने जय के द्वारा उसपर अधिकार प्राप्त किया था। अतः जब सीताहरण के कारण युद्ध छिड़ गया तब आक्रामक राम के दूत हनुमान् को अधिकार है ही कि वे रावण की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर दें। रावण का मुख्य प्रश्न यही था कि तू कौन है ? और किसके बलपर तूने बन उजाड़ा ? और किस अपराध पर राक्षसों को मारा— “कह लंकेश कौन तैं कीसा। केहिके बल घालेसि बन खीसा ।। मारे निसचर केहि अपराधा ।” ( रा० मा० ५।२०।१,२ ) इसी का उत्तर हनुमान् ने दिया था— “सुन रावन ब्रह्माण्डनिकाया। पाइ जासु बल विरचति माया ।। जाके बल बिरञ्चि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ॥” (रा० मा० ३।२०।२,३) जाके बल लवलेस ते जितैहु चराचर झारि । तासु दूत मैं जासु कर हरि आनेसि प्रिय नारि ॥” ( रा० मा० ५।२१ ) जिसके बल से माया अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण करती है। जिसके बल से ब्रह्मादि विश्व की सृष्टि आदि करते हैं। जिसके ही बल से लवलेश से तुमने चराचर को जीता है। मैं उसी का दूत हूँ, तुमने जिसकी प्रिय नारी का अपहरण या चौर्य किया है। प्रह्लाद ने भी हिरण्यकशिपु से कहा था कि राजन् ! मेरा ही नहीं आपका बल भी वही है और सभी बलवानों का भी बल वही है। केन उपनिषद् की आख्यायिका से यह सिद्ध ही है कि जिन अग्नि और वायु के सम्बन्ध से सभी देवता, दानव और मानव बलवान् पहलवान् होते हैं एवं जिनका सम्बन्ध भङ्ग होने से सब ठण्डे निष्प्राण मुर्दे हो जाते हैं, वे अग्नि और वायु भी भगवान् के अनुग्रह के बिना तृण भी जलाने और उड़ाने में समर्थ नहीं हो सके थे। अतः उन्हीं के बल से सब बलवान् हैं, यह सिद्धान्त मानना चाहिये । मुझे भूख लगी थी, इसी लिए फल खाये। वानर-जाति के स्वभावानुसार मैंने कुछ वृक्षों को तोड़ डाला। जिन लोगों ने मुझे मारा उन्हें मैंने भी मारा। हनुमान् जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि यह सम्पत्ति तुम्हारी नहीं है, रामजी की सम्पत्ति है, मैंने वाटिका की स्वामिनी से आज्ञा ले ली है—