रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४९ “खायउँ फल प्रभु लागी भूखा । कपिस्वभाव तें तोरेउँ रूखा ॥ जिन मोहि मारा तिन मैं मारा” ( रा० मा० ४।२१।२,३ ) इतना ही नहीं वे यह भी कहते हैं कि तुम श्रीराम के चरणारविन्द को हृदय में धारण कर के लङ्का का अचल राज्य करो— “रामचरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ।।” ( रा० मा० ५।२२।१ ) उधर भगवान् वामन भी विजय द्वारा प्राप्त बलि की त्रिभुवनसम्पत्ति को दान द्वारा प्राप्त कर के ही इन्द्र को प्रदान करते हैं । यदि बलि की उसमें प्रभुता ही नहीं थी तो दान लेने की अपेक्षा भी क्यों होती । अतः शास्त्र- विरुद्ध ऐसी सब कल्पनाएँ उपेक्ष्य ही समझनी चाहिये । यह तो दाता के सोचने की बात है । वस्तुतः भगवान् की सब वस्तुएँ हैं । उनको समर्पण का अर्थ है— उनकी ही दी हुई वस्तु का उन्हें ही समर्पण करना । जैसा कि बलि की पत्नी विन्ध्यावलि ने कहा था— “क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं च तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्य त आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥” ( भाग० ८।२२।२० ) हे भगवन् ! आपने अपनी क्रीड़ा के लिए त्रिजगत् का निर्माण किया है। आपके निर्मित विश्व में कुबुद्धि लोग अपना स्वामित्व जमा लेते हैं । वास्तव में सम्पूर्ण विश्व के परमकर्ता आपको वे लोग क्या दे सकते हैं । वे निर्लज्ज हैं जो आपको देने का अभिमान करते हैं, क्योंकि कर्तृत्ववाद का आरोप भी तो आपमें ही है । अधिष्ठानभूत परात्पर परब्रह्म में ही कर्तृत्वविशिष्ट जीव भी तो कल्पित ही हैं । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र द्वारा प्रतिपादित स्वत्व का अपलाप कर दिया जाय । भले सब कुछ भगवान् का ही है तो भी जगत् के निर्माण में जहाँ भगवान् उपादान और निमित्त कारण हैं । वहीं जीव भी अपने शुभाशुभ कर्मों द्वारा विश्वप्रपञ्च के निर्माण में हेतु होता है । तभी वह विश्व के द्वारा सुख दुःख का भोक्ता होता है और तभी ईश्वर विषम सृष्टि निर्माण करने पर भी नैर्घृण्य ( निर्दयता ) और विषमता रूप दोष का भागी नहीं होता । जैसे स्वामी के द्वारा प्रदान की हुई वस्तु का सेवक स्वामी होता है, उसी तरह अपने कर्मों द्वारा और वैध मार्ग दाय, जय, क्रय आदि द्वारा प्राप्त वस्तुओं का स्वामी जीव भी होता ही है । तभी तो भगवान् ने भी अदिति की तपस्या से सन्तुष्ट होकर अदिति-पुत्रों देवताओं के हितार्थ बलि से दान के रूप में त्रिजगत् प्राप्त कर के देवताओं को प्रदान किया था । “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।” इस प्रकार के वचनों से यह नहीं समझना चाहिये कि श्रद्धा और विश्वास ही भवानी और शङ्कर हैं । श्रद्धा और विश्वास से अतिरिक्त भवानी और शङ्कर नहीं हैं । श्रीराम, जानकी तथा लक्ष्मण के लिए जीव, ब्रह्म और माया का दृष्टान्त किया गया है— “उभय मध्य सिय सोहै कैसी । जीव ब्रह्म बिच माया जैसी ॥ उपमा बहुरि कहहुँ जिय जोही । जिमि बिधु बुध बिच रोहिनि सोही ॥” (रा०मा० २।१२१।१,२) १०७