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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३३ माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा सकल धर्मरूप धरणी को धारण करनेवाला भगवान् शेष है। अतः उन सबकी आज्ञा पालन करना ही सब धर्मों का आधार है। "सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुलपालक होहू ।।" (रा० मा० २।३०४।२ ) कितनी मधुर कितनी सुन्दर आज्ञा है या प्रिय परामर्श है। हे तात, उस आज्ञा का तुम भी पालन करो हम से पालन कराओ अर्थात् हमारे उस आज्ञापालन में मदद करो, सहयोगी बनो और ऐसा करके इस तरणिकुल सूर्यवंश की मर्यादा का रक्षण करो। गुरुजनों की आज्ञा का पालन करना साधक के लिए समस्त सिद्धियों को देनेवाली कीर्ति, सुगति और भूति (ऐश्वर्य ) की त्रिवेणी है। यद्यपि इसमें कठिनाई है, संकट है एवं प्रियवियोग आदि संकट सहना पड़ेगा। परन्तु इसमें सबका हित होगा। अतः इस आयी हुई विपत्ति को सब भाइयों को बाँटकर सह लेना चाहिये । चौदह वर्ष तक के लिए तुम्हारे लिए बड़ी कठिनाई है। तुम्हें परम मृदु जानते हुए भी यह कठोर बात कहना इस कुसमय में अनुचित नहीं । कुसमय और कुठाँव में सुबन्धु ही सहायक होता है। तलवार का घाव लगने पर अपने हाथ को ही ओड़ना पड़ता है। सेवक हाथ, पैर तथा नयन के समान होता है। स्वामी मुख के समान होता है। सुकवि ऐसी प्रीति की रीति की सराहना करते हैं— "बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हींह अवधि भरि अति कठिनाई ॥ जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमय तात न अनुचित मोरा ॥ होंहिं कुठावं सुबंधु सहाये । ओड़िअहि हाथ असिनिहुँ के धाये ।।" (रा०मा० २।३०४।३,४) "सेवक कर पद नयन से मुख से साहिब होइ । तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकवि सराहहिं सोइ ।।" (रा० मा० २।३०५ ) प्रभु की प्रेमामृतसमुद्रमयी वाणी को सुनकर सम्पूर्ण समाज सनेह शिथिल होकर समाहित हो गया। ज्ञान- विज्ञान की अधिष्ठात्री महाशक्ति सरस्वती ने चुप्पी साध ली । श्रीभरतजी को परम संतोष हुआ । उससे स्वामी के सांमुख्य का और दुःखदोष के वैमुख्य का अनुभव किया, मुख प्रसन्न हो गया, मन का विषाद मिट गया। मानो मूँगे को गिरा का प्रसाद मिल गया और बोल पड़े— "नाथ भयउ सुख साथ गये को । लहेउँ लाहु जग जनम भये को ॥ अब कृपाल जस आयसु होई । करौं सीस धरि सादर सोई ।।" (रा०मा० २।४०५।३,४) इस प्रकार गोस्वामीजी के मानस में महाराज दशरथ के प्रति महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, मन्त्रिपरिषद्, परिजन एवं पुरजन सहित श्रीभरत की तथा श्रीराम की परम श्रद्धा प्रकट होती है। इसी प्रकार श्रीवसिष्ठ एवं उनकी आज्ञाओं के प्रति श्रीभरत तथा श्रीराम का परम विश्वास, परम श्रद्धा परिलक्षित होती है। वेदादिशास्त्रों एवं तदुक्त धर्म में तो सब की ही परम श्रद्धा है। इसी तरह वेदस्वरूप के सम्बन्ध में भी कई लोगों की भ्रान्तिपूर्ण धारणा है। "बेद बिदित तेहि दशरथ नाऊ।" (रा० मा० १।१८७।४ ) "राम नाम कर अमित प्रभावा । बेद पुरान उपनिषद गावा ।।" (रा० मा० १।४५।१ ) उनके अनुसार "उपर्युक्त पङ्क्तियों में वेद शब्द का अर्थ आजकल के प्रसिद्ध वेदों का बोध नहीं है। उनके अनुसार अब आधुनिक काल में वेदों का जो स्वरूप उपलब्ध है, उसमें दशरथ या राम नाम की महिमा तो दूर नामोल्लेख भी नहीं है। कुछ आधुनिक टीकाकारों ने वेदमन्त्रों में दशरथ, राम और सीता आदि नामों के उल्लेख का समर्थन किया है। किन्तु ऐसे अर्थ शाब्दिक खींचतान के द्वारा किये गये लगते हैं। १०५

८३४ रामायणमीमांसा एकविंश वस्तुतः गोस्वामीजी वेदों का ठीक उतना ही स्वरूप नहीं मानते हैं, जितना ग्रन्थों के रूप में हमें आज उपलब्ध है। वे “रामायन सतकोटि अपारा” कहते हुए जिस मान्यता की स्थापना करते हैं। भले ही सौ करोड़ रामायण आज उपलब्ध नहीं हैं, वही दृष्टि उनकी वेदों के प्रति भी है। भगवान् के निःश्वास से प्रादुर्भूत वेद भगवान् का स्वरूप ही है। वह ज्ञानमय वेद असीम और अनन्त हैं। समुद्र में जिसे जो पाना होता है, वह उससे अपनी आवश्यकता भर ले लेता है। इसी प्रकार वेद की स्थिति हैं। यज्ञों की कर्मकाण्ड-प्रक्रिया में जिन वेदमन्त्रों का प्रयोग है, परम्परा से उनका उपयोग होते रहने से हमें आज वे ही उपलब्ध हैं। हम उनको ही पूर्ण प्रामाणिक मान बैठे हैं।” उक्त कथन अत्यन्त असङ्गत ही है। “अनन्ता वै वेदाः” के अनुसार वेद अनन्त हैं। भगवान् के निःश्वास- भूत होने से अकृत्रिम हैं और अपास्त-समस्तपुंदोषशङ्काकलङ्क होने से परम-प्रमाण हैं। जैसे प्राण प्राणवान् का स्वरूप ही माना जाता है, वैसे ही निःश्वास निःश्वासवान् से अभिन्न हैं। सच्चिदानन्द भगवान् में सत्, चित् और आनन्द तीन रूप प्रतीत होते हैं। यद्यपि सत् की स्वप्रकाशता ही उसकी चिद्रूपता है। सच्चित् की सर्वोपद्रवशून्यता ही आनन्दरूपता है। फिर भी प्रातीतिक भेद के अनुसार सदंश से ज्ञेय प्रपञ्च तथा चित् से वृत्तिविशिष्ट ज्ञान उत्पन्न होता है। उसी चित् से ही सम्पूर्ण वाङ्मयप्रपञ्च की उत्पत्ति होती है। अनन्त संवित् ही शब्दब्रह्म है। उसका ही मूलरूप प्रणव है। प्रणव का ही व्याख्यानभूत अनन्त वेद है। फिर भी वह ज्ञान- मय असीम और अनन्त है। वेद ईश्वर के समान ज्ञानमय असीम और अनन्त ही हैं— “वेदो नारायणः साक्षात्” (भाग० ६।१।४० ), “वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्” (भाग० ११।३।४३) इन वचनों का इतना ही अर्थ है कि वे ईश्वर के निःश्वासभूत होने से ईश्वर के अंश हैं। यद्यपि वैयाकरणों और वेदान्तियों के अनुसार सभी शब्द एवं वेदशब्दराशि सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होकर प्रलय में नष्ट हो जाती है तथापि ईश्वरीय शक्तिरूप से वे प्रलयकाल में विद्यमान रहते हैं। तभी पूर्वकल्पीय आनुपूर्वी के समान ही उत्तरकल्पीय आनुपूर्वी उत्पन्न होती है। शक्ति की दृष्टि से और अविच्छिन्न पारम्पर्य की दृष्टि से वेदवाणी अनादि और अनन्त मानी जाती है। शब्द और वेद और शब्दराशि स्वरूप से सृष्टि से लेकर प्रलय पर्यन्त स्थायी होने से ही नित्य कही जाती हैं। यह नित्यता आपेक्षिक ही है। इसी लिए वेदों की वेदान्तरीति से उत्पत्ति होती है। उत्पन्न सभी पदार्थ कारण से अनन्य होते हैं। तभी वेद भी परमेश्वर से अनन्य हैं। अतः ब्रह्म की अद्वितीयता सिद्ध होती है। अभिधानात्मक प्रपञ्चोपादानानुकूल शक्त्यवच्छिन्न संविदानन्द ब्रह्म के विवर्त होने से ही शब्दों को ज्ञानात्मक कहा जा सकता है। स्वरूपतः शब्द ज्ञान के जनक हैं, ज्ञानरूप नहीं हैं। परन्तु ब्रह्म किसी से उत्पन्न नहीं होता है। उसकी नित्यता आपेक्षिक नहीं है, किन्तु वास्तविक है। वह नित्य ज्ञानरूप हो सकता है। भगवान् प्रतिपाद्य हैं और वेद प्रतिपादक हैं, प्रतिपाद्य नहीं। यदि परमात्मरूप ही वेद हैं तो वे भी परमात्मा के समान ही परोक्ष एवं अग्राह्य रहेंगे। यदि वेद स्वयं ही अनुपलब्ध होंगे तब उनसे ब्रह्म का कैसे उपलम्भ हो सकेगा। हाँ, अनन्त वेद ब्रह्म, सूर्यादि देवताओं के लिए ही ग्राह्य हैं। मानवबुद्धिग्राह्य वेद की श्रीभागवत, महाभाष्य, सीतोपनिषद् आदि के अनुसार ११३१ ग्यारह सौ इकतीस या ११७२ ग्यारह सौ बहत्तर शाखाएँ मानवग्राह्य हैं। आज उनमें से किसी न किसी रूप में नौ या दस शाखाएँ मिलती हैं। साथ ही केवल मन्त्र ही नहीं, किन्तु मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं। ब्राह्मण में ही आरण्यक एवं उपनिषदें भी अन्तर्भूत हैं। वेद केवल मन्त्रभाग ही नहीं हैं, किन्तु मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों ही वेद हैं। उपलब्ध वेदों से भिन्न समुद्रतुल्य कोई वेद उपलब्ध नहीं है। अनुपलब्ध वेद को तो हम किसी विषय के प्रमाण के रूप में नहीं

उपस्थित कर सकते हैं। अन्यथा तो कोई भी किसी ग्रन्थ या किसी बात को वेदसम्मत कह सकता है। फिर वेद- सम्मत क्या है क्या नहीं इसका निर्णय असम्भव ही हो जायगा। अतः परम्परा से प्राप्त मन्त्र और ब्राह्मण भाग को ही वेद माना जाता है और उसी के आधार पर धर्म और ब्रह्म का विचार किया जाता है। शतकोटि रामायण की मान्यता तुलसी द्वारा स्थापित नहीं, किन्तु वह पुराणों द्वारा स्थापित है— “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।” तुलसी ने उसी का प्रतिपादन किया है। यह भी कहना गलत है कि “पौराणिक परम्परा में पराशरपुत्र कृष्णद्वैपायन को 'व्यास' उपाधि दी गयी है। व्यास का अर्थ विस्तार करनेवाला है। उन्होंने लोककल्याण के लिए वेदों का विस्तार करके पुराणों के रूप में सुलभ कर दिया।” क्योंकि पुराणों को वेद परम्परा का अङ्ग मान लेने पर गोस्वामीजी की सैद्धान्तिक यथार्थता सिद्ध हो जाती है, क्योंकि पुराणों में ही वेदव्यास का अर्थ अनेकशाखोपबृंहित मन्त्र-ब्राह्मणात्मक सम्पूर्ण वेदराशि को शाखाभेद से और मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभाग रूप से उनका विभाजन करना ही हैं। शुक्लयजु के मन्त्र और ब्राह्मण का स्पष्टतया विभाजन है। इसी लिए वह शुक्ल है। कृष्णयजु में शाखा- भेद होने पर भी मन्त्रसंहिता में भी ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणभाग में भी मन्त्र हैं। इसी लिए उसे कृष्ण कहा जाता है। पुराण वेदों का विभाजन नहीं है, किन्तु वेदों का उपबृंहण हैं। पुराणनिर्माता होने के कारण कृष्णद्वैपायन वेदव्यास नहीं, किन्तु वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास हुए हैं। इसी लिए मन्त्र-ब्राह्मणरूप वेदों की पौर्वापर्यरूप आनुपूर्वी नहीं बदलती। सभी कल्पों में मन्त्र और ब्राह्मण एक जैसे ही होते हैं। उनकी आनुपूर्वी में रद्दोबदल नहीं होता है। परन्तु भिन्न-भिन्न कल्पों में पुराणों की आनुपूर्वी बदल जाती है। आठ प्रकार के ब्राह्मणों में आनेवाले इतिहास और पुराण तो वेद ही हैं। उसी दृष्टि से उन्हें भी ईश्वर का निःश्वास कहा गया है—“अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपानिषदः श्लोकाः सूत्राणि” (बृ० उ० २।४।१०) किन्तु छान्दोग्य में वर्णित इतिहास-पुराण विष्णु, पद्मादि पुराण हैं। वे ईश्वर के निःश्वास नहीं हैं, क्योंकि वहाँ 'निःश्वसितम्' पाठ नहीं है। मानस में वर्णित वेदस्तुति एवं भागवत की वेदस्तुति से यह कदापि नहीं सिद्ध होता है कि उसी रूप में वह वेदमन्त्रों में विद्यमान है। किन्तु वेदों के अधिष्ठाता देवताओं या अधिष्ठात्री महाशक्तियों ने भगवान् की स्तुति की है। श्रीभागवत की वेदस्तुति के टीकाकारों ने टीकाओं में स्पष्ट कर दिया है—कौन कौन से वेदांशों ने किन किन अंशों को कहा है। विशेषतः श्रीधर स्वामी ने अपनी टीका में उन उन श्रुतियों का उल्लेख किया है। इस दृष्टि से मन्त्रों में, ब्राह्मणों में और उपनिषदों में दशरथ, राम, सीता आदि का स्पष्ट वर्णन है। उसे शब्दों की खींचा- तानी नहीं कहा जा सकता है। यों तो वेदों के अनेक कठिन मन्त्रों के स्वाभाविक अर्थ में अनभिज्ञों को खींचा-तानी प्रतीत हो सकती है। उक्त बातों का विवरण इसी ग्रन्थ में अध्याय २ पर देखा जा सकता है। कोई भी मनुष्य चाहे ऋषि हो चाहे देवता उन्हें वेदों में संकोच और विकास करने का अधिकार नहीं होता। मनुष्य, ऋषि तथा देवता वेदों का व्याख्यान या अर्थविश्लेषण कर सकते हैं। परन्तु मन्त्रों या ब्राह्मणों की पंक्तियों में हेरफेर, रद्दोबदल नहीं कर सकते। हाँ, यह हो सकता है कि वेदों से उनका अभिप्राय किसी ने न समझा हो तो उसे पुराणों से उनका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। वेदों में ही इन्द्रशब्द का एक अर्थ परमेश्वर ही है—

८३६ रामायणमीमांसा एकविंश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।” (ऋ० सं० १।१६४।४६) अन्यत्र देवताविशेष इन्द्र है। प्रथम की शक्ति निःसीम है, दूसरे की शक्ति सीमित है। पुराणों में तथा मानस में इन्द्र का स्मरण देवताविशेष के रूप में ही किया गया है। पुराणों में ही अनेक स्थलों में परमेश्वर के रूप में भी इन्द्र का स्मरण हो गया है। यह ठीक है कि तुलसीदास का रामचरितमानस किसी सम्प्रदाय विशेष का ग्रन्थ नहीं है। किन्तु वह तो मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, पुराण तथा रामायण का अनुसरण करनेवाला ग्रन्थ है। जैसे उन्हीं वेदादि ग्रन्थों के आधार पर विभिन्न सम्प्रदाय अपना अपना सम्प्रदाय सिद्ध करते हैं, उसी तरह तुलसी के मानस से भी भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्त सिद्ध होते हैं। अतएव पुराणादि के समान ही सभी सम्प्रदाय के लोग रामचरितमानस का आदर करते हैं। परन्तु उन उन सम्प्रदायों के महान् महान् आचार्य हुए हैं और उन उन सम्प्रदायों में ईश्वरतुल्य पूज्य भी हुए हैं। परन्तु अन्य सम्प्रदायों में उनके ग्रन्थों की और उनकी उतनी मान्यता नहीं हो सकी है। सम्प्रदाय दर्शनों का अनुसरण करते हैं। उन्हें अनेक विषयों में अपना निर्णय देना पड़ता है। अतः उन निर्णयों का विरोध होना सम्भव है। जैसे सांख्य, योग, न्याय, वेदान्त, पूर्वोत्तरमीमांसा आदि के मतभेद होते हैं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत आदि का कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं है। भले संविधान या कानूनों की विभिन्न धाराओं के विभिन्न न्यायवादी विभिन्न अर्थ करते हों फिर भी उन धाराओं का निश्चित अर्थ होता ही है। उसी का निर्णय करना न्यायालय का कर्तव्य होता है। व्यास, वसिष्ठ आदि के भी अपने निश्चित सिद्धान्त होते ही हैं। इस दृष्टि से तुलसी की भी कुछ निश्चित धारणाएँ हैं ही। यह कहना भी गलत है कि “इदमित्थं कहि जात न सोई” (रा० मा० १।१२०।१) यह अर्धाली ही उनकी मान्यता का सूत्र है।” क्योंकि इस रूप में तो यह भी कहा जा सकता है कि उनके राम भी पूर्ण सत्य नहीं हैं। वे भी सीमित ही सत्य हैं। परन्तु यह कथन श्रुति, स्मृति और युक्ति से विरुद्ध ही है। ब्रह्म का अवतार क्यों होता है केवल इसी अंश के लिए उक्त अर्धाली ठीक है, क्योंकि अनेक हेतु हो सकते हैं। यद्यपि ईश्वर मन और वाणी का विषय नहीं है। कोई तार्किक तर्क के द्वारा उसके विषय में ठीक अनुमान नहीं कर सकता। इसलिए ईश्वर के विषय में जो कुछ भी कहा जाय वह इदमित्थं (यह ऐसा ही) के रूप में सम्भव नहीं। तथापि वेदादि शास्त्रों के द्वारा तथा वेदादिशास्त्रानुसारी तर्कों के द्वारा भगवान् के वास्तविक रूप को साधनचतुष्टयसम्पन्न भगवदनुगृहीत साधक अवश्य ही जानता है। निःसंशय ज्ञान ही मुक्ति का हेतु है— “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” परमेश्वर के परम सत्यरूप का साक्षात्कार करके ही प्राणी मृत्यु का अतिक्रमण कर सकता है— ‘’नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’’ अन्य कोई भी पन्था भगवत्पदप्राप्ति का है ही नहीं। “संशयात्मा विनश्यति” संशयशील प्राणी नष्ट हो काता है। सीमित आपेक्षिक संशयात्मक ज्ञान अनर्थ का हेतु होता है। एक वस्तु में एक ज्ञान ही यथार्थ है। रज्जु में सर्प, धारा, माला, भूछिद्र आदि अनेक ज्ञान होते हैं, परन्तु उनमें समझौता संभव नहीं है। रज्जुज्ञान ही यथार्थ है और सब ज्ञान अयथार्थ हो हैं। ईश्वर मन और वाणी का विषय नहीं है। इसका अर्थ यही है कि ब्रह्म फलव्याप्ति का विषय नहीं है। वृत्त्यभिव्यक्त चैतन्य के द्वारा जैसे घटादि का प्रकाश होता है वैसे मनोवृत्त्यिव्यक्त चैतन्य के द्वारा ब्रह्म का प्रकाश नहीं होता। क्योंकि वह स्वप्रकाश है। स्वप्रकाश के लिए अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं होती है। परन्तु मनोवृत्ति द्वारा ब्रह्मावरक अज्ञान की निवृत्ति तो होती है। इसी लिए जैसे—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३७ “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।” (तै० उ० २।३) “यन्मनसा न मनुते, यद्वाचा नाभ्युदितम्” आदि श्रुतियों में ब्रह्म को मन, बुद्धि तथा वाणी का अविषय कहा गया है। वैसे ही “मनसैवानुद्रष्टव्यम्”, “दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या” आदि श्रुतियों में यह भी कहा गया है कि ब्रह्म मन के द्वारा जाना जाता है। श्रेष्ठ बुद्धि से ब्रह्म-दर्शन होता है। यह भी एक समन्वय है कि शास्त्राचार्योपदेशरूप संस्कार से संस्कृत मन या बुद्धि ब्रह्म को जानने में हेतु है। तद्रहित बुद्धि ब्रह्म-दर्शन में असमर्थ है। इसी तरह अभिधा शक्ति के द्वारा ब्रह्मवाणी या वेद ब्रह्म का बोध नहीं करा सकते । क्योंकि जिसमें जाति, गुण और क्रिया द्वारा या सम्बन्ध द्वारा अथवा स्वरूप द्वारा शब्द के साथ संकेतग्रह सम्भव है, उसी का बोध शब्द से हो सकता है। ब्रह्म रूपादिराहित होने से चाक्षुषादि प्रत्यक्ष का अविषय होने से स्वरूपेण निर्देशार्ह नहीं है। अतः उसका किसी शब्द के साथ सम्बन्धग्रह होना सम्भव नहीं है। डित्थः, डवित्थः आदि शब्दों की प्रवृत्ति स्वरूप से निर्देशयोग्य काष्ठमय मृग या काष्ठमय हस्ती में होती है ! ब्राह्मण, गौ आदि में जाति के निमित्त से शब्द की प्रवृत्ति होती है। नीलमुत्पलम् आदि में शब्द गुण के आधार पर तथा पाचक आदि शब्द क्रिया के बल पर प्रवृत्त होते हैं। धनी, गोमान् आदि शब्द सम्बन्ध के आधार पर प्रवृत्त होते हैं । समुदाय-शक्ति के आधार पर शब्द की प्रवृत्ति रूढ़िवृत्ति कही जाती है। अवयव-शक्ति से शब्द की प्रवृत्ति को योगवृत्ति कहते हैं। उभय योग से प्रवृत्ति को योगरूढ़ कहते हैं। गौः, ब्राह्मणः आदि शब्द रूढ़ शब्द हैं। पाचकः आदि योग शब्द हैं। पङ्कज आदि योगरूढ़ शब्द हैं । ब्रह्म में जाति, गुण, क्रिया का सम्बन्ध न होने से किसी तरह भी शब्दों की अभिधा वृत्ति से ब्रह्म में प्रवृत्ति नहीं होती है। सम्बन्ध न होने से लक्षणा वृत्ति से भी ब्रह्म में किसी शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिए कहा गया है कि कोई भी वाणी या वेद भी ब्रह्म का प्रकाशन नहीं कर सकते हैं। परन्तु सिद्धान्ततः तात्पर्या- नुपपत्तिमूलक लक्षणा के द्वारा आध्यासिक सम्बन्धवाले ब्रह्म में वेद और वेदान्त शब्दों की प्रवृत्ति होती है। इसलिए “सर्वे वेदाः यत्पदमामनन्ति”, “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” (गीता १५।१५) इत्यादि वचनों से ब्रह्म को वेदवेदान्त- वेद्य माना ही गया है। “मन्तव्य” श्रुति के द्वारा ब्रह्म में वेदानुसारी तर्क का भी अवकाश है ही। हाँ, अवतार के कारणों में तो अनेक कारण हो सकते हैं। अतः अमुक ही कारण है, यह नहीं कहा जा सकता है। वहाँ किसी को अकारण या सीमित सत्य कहने की आवश्यकता नहीं है । वैसे सिद्धान्त में भी अनेक वस्तुएँ सीमित सत्य कोटि में ही आती हैं। बल्कि यों कहना चाहिये कि परात्पर परब्रह्म भगवान् को छोड़कर इतर वस्तुएँ सीमित सत्य में ही हैं। विज्ञान के साथ वेदादि शास्त्रों के सिद्धान्त का मेल जितने अंशों में मिलता हो ठीक है। परन्तु विज्ञान का अभी तक कोई भी सिद्धान्त अन्तिम सिद्धान्त नहीं है। सर आइजक, न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त अन्तिम माना जाता रहा था वह आज धराशायी हो गया है। आज वह पूर्ण रीति से खण्डित हो चुका है। डार्विन, हैकल, स्पेंसर आदि के विकासवाद का सिद्धान्त भी पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। अतः विज्ञान के पीछे वेदादि शास्त्रों को चलाने की बात वैसे ही है जैसे किसी सभ्य पुरुष को किसी अन्धे और उन्मत्त भैंसे की पूंछ पकड़कर उसे उसके गन्तव्य स्थल पर पहुँच जाने का आश्वासन देना है। विज्ञान अल्पज्ञ एवं अल्पशक्तिमान् व्यक्तियों के दिमाग का परिणाम है। उनमें अनेक त्रुटियाँ हो सकती हैं। पूर्व काल में जिस गणित के आधार पर सम्पूर्ण यान्त्रिक व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं। आज उसमें भी परिवर्तन हो

८३८ रामायणमीमांसा एकविंश गया है। यान्त्रिक आज भी प्रचलित है ही। इस विषय की विशेष जानकारी के लिए मेरे "मार्क्सवाद और राम- राज्य" ग्रन्थ का विकासवाद देखें। वेद सर्वज्ञ ईश्वर के निःश्वास होने से सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं। वेदोक्त साधनों के अनुष्ठान से ऋषि-महर्षि भी सर्वज्ञकल्प हुए हैं। उनके ज्ञान और विज्ञान अपूर्ण नहीं हैं। तुलसी का मानस उन्हीं शास्त्रों का सार है। वह तुलसी का निजी विचार नहीं है। यह मानस की अनेक पङ्क्तियों से सिद्ध है। संसार के सभी सत्य माया के भीतर की चीजें हैं। माया स्वयं ही भगवान् की सत्ता से ही सत्य प्रतीत होती है। जिस परम सत्य भगवान् से जड़ माया सत्यवत् प्रतीत होती है, वह भगवान् ही अन्तिम सत्य हैं। उनको बिना जाने मिथ्या जगत् एवं उसकी मूलभूत माया भी सत्य प्रतीत होती है। वही पारमार्थिक सत्य वस्तु है। अतएव यह कहना सर्वथा असत्य है कि "गोस्वामीजी किसी भी सिद्धान्त को अङ्गीकार करके तात्कालिक समस्या का समाधान कर लेते हैं। पर वे किसी भी सिद्धान्त को पूर्ण सत्य का पद देने को प्रस्तुत नहीं हैं", क्योंकि यह तो अवसरवादिता ही है। 'गोस्वामीजी किसी मत विशेष के घेरे में नहीं जाते', यह कहना भी अज्ञता ही है। क्योंकि गोस्वामीजी वेदवेदान्त-सिद्धान्त के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। श्रीराम उनकी दृष्टि में भी परम सत्य हैं। पूर्ण सत्य हैं। जो ऐसा नहीं मानता वह नास्तिक, अज्ञ और अभागा है। उसके मनमुकुर में पाप की काई लगी है, यह उनकी ही पङ्क्तियों से सिद्ध है। कहा जाता है— "कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ जुगल प्रबल कोउ माने। तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम तब आपन पहचाने ॥" इस पङ्क्ति में गोस्वामीजी कहते हैं कि कुछ लोग सृष्टि को मिथ्या, कुछ लोग सत्य एवं कुछ लोग सत्या- सत्य के रूप में प्रतिपादित करते हैं। पर ये तीनों भ्रम हैं।" परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्रानभिज्ञता के कारण ही उपर्युक्त भ्रम है। पङ्क्तियों का अर्थ आगे स्पष्ट होगा। "शून्य भोति पर चित्र रङ्ग नहि तनु बिनु लिखे चितेरे। धोये मिटै न मरइ भीति दुख पाइय यहि तनु हेरे॥ रविकर नीर बसे अतिदारुण मकररूप तेहि माहीं। वदनहीन सो ग्रसे चराचर पान करन जे जाहीं ॥ इन पङ्क्तियों का भी निष्कर्ष यही है कि यद्यपि दुनिया में बिना आधार के चित्र का उल्लेख नहीं हो सकता। बिना रङ्ग के और बिना शरीर के कोई चित्रकार चित्र नहीं लिख सकता है। चित्र धुल भी सकता है परन्तु जो चित्र धोने से भी नहीं धुल सकता है। परमेश्वर रूपी चित्रकार ने बिना आधार के ही जगच्चित्र का निर्माण किया है और बिना रङ्ग के यह चित्र बना है। चित्रकार को इसके निर्माण के लिए तन की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि वह तो बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है, बिना पैर के चलता है एवं बिना हाथ के नाना प्रकार के कर्म करता है। तन के बिना स्पर्श और घ्राण के विना सर्वविध गन्धों को ग्रहण करता है— "पग बिन चले सुने बिन काना। कर बिनु कर्म करे बिध नाना ॥ आनन रहित सकल रसभोगी। बिन बाणी बक्ता बड़ योगी ॥" (रा०मा० १।११७।३) तत्त्वज्ञान के बिना यह जगत् किसी के मिटाये मिट भी नहीं सकता। यह सब भी उनकी निजी बात नहीं है। किन्तु श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है। श्रुति भी यही कहती है—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३९ “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ॥” ( श्वेताश्व० उ० ३।१९ ) इसी बात को व्यतिरेकमुखेन शिवमहिम्न में कहा गया है ! ईश्वर किस प्रकार की चेष्टा द्वारा, किस शरीर से, किस उपाय से, किस आधार पर एवं किस उपादान से विश्व का निर्माण करता है, इत्यादि कुतर्क कुछ हतबुद्धि लोगों को जगत् में व्यामोह फैलाने के लिए मुखरित ( वाचाल ) करते हैं । प्रकृत में केवल सजातीय, विजातीय तथा स्वगत भेद से शून्य एक अद्वितीय स्वप्रकाश भगवान् से भिन्न होकर कुछ भी नहीं है । आधार के बिना, उपादान के बिना, शरीर के बिना और चेष्टा के बिना जगत् कैसे बन सकता है ? अतर्क्य ऐश्वर्यवाले कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ भगवान् में उक्त दुस्तर्क अनवसरग्रस्त हैं। उनकी अघटित- घटनापटीयसी माया सब कुछ कर सकती है और स्वयं मिथ्या होने पर भी उनकी सत्ता से सत्य होकर सत्य प्रपञ्च निर्माण बिना आधार आदि के कर सकती है, या वह भगवान् ही अपनी इस अचिन्त्य माया शक्ति के द्वारा बिना साधनों के भी उक्त जगच्चक्र का निर्माण कर सकते हैं । “किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च । अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥” यह संसार रविकरनीर अर्थात् मरुमरीचिका जल ही है। इस मृगतृष्णिकोदक में एक मोह रूपी मकर है जो वदनहीन होने पर भी वहाँ जलपान करने जो जाते हैं उन सभी चराचरों को ग्रस लेता है । यदि पानी ही सत्य नहीं तो उसमें सत्य मकर कैसे होगा ? फिर उसके मुख भी कहाँ ? फिर भी जब तक तत्त्व का साक्षात्कार नहीं होता, भ्रम नहीं मिट जाता, तब तक मिथ्या संसार व्यामोह सबको ग्रस्त करता ही है। “कोउ कह सत्य झूठ कह कोई” पङ्क्तियों का यह अर्थ है कि कुछ लोग जगत को सत्य ( अत्यन्ताबाध्य ) कहते हैं । कुछ झूठ वन्ध्यापुत्र तथा खपुष्पवत् अत्यन्त असत् कहते हैं । कुछ लोग सत् असत् उभयरूप मानते हैं । परन्तु ये तीनों ही पक्ष भ्रान्त हैं । त्रिविध भ्रम परित्याग से ही परमात्मज्ञान हो सकता है । जगत् ब्रह्म के समान सत् नहीं है, क्योंकि वह विनश्वर है, तत्त्वज्ञान से मिट जाता है । अत्यन्त असत् भी नहीं है, क्योंकि वह दुःखादि अनर्थ का मूल है। खपुष्पादि प्रतीत नहीं होते, यह प्रतीत होता है । “क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वानधिकरणत्वमसत्त्वम् ।” जो किसी स्थल में प्रतीयमानत्व धर्म का अधिकरण न हो अर्थात् कहीं सत् रूप से जिसकी प्रतीति न हो वही असत् है । ऐसे खपुष्पादि ही होते हैं, जगत् नहीं ? क्योंकि जगत् सत् रूप से प्रतीत भी होता है एवं इसमें कार्यकारण क्षमता भी है। अतः यह जगत् न सत् है, न असत् है और न सदसत् है । क्योंकि सत् और असत् दोनों विरुद्ध होने से दोनों का समन्वय हो ही नहीं सकता है । अतएव वेदान्त के अनुसार जगत् अनिर्वचनीय है । अविचाररमणीय, मिथ्या और झूठ शब्दों के दो अर्थ होते हैं । एक अपलाप या अत्यन्त असत् अर्थ है। दूसरा पूर्वोक्त सदसद्विलक्षण अविचारितरमणीय अनिर्वचनीय अर्थ है । इसी लिए अध्यासभाष्य में भाष्यकार ने कहा है—मिथ्याशब्दो नापह्नववचनः किन्त्वनिर्वचनीयतावचनः । आक्षेप- भाष्य में मिथ्याशब्द का अर्थ अपह्नव अपलाप अर्थात् इनकार करना है। अनिर्वचनीयता यहाँ मिथ्या शब्द का अर्थ अभिप्रेत नहीं है !

८४० रामायणमीमांसा एकविंश लोक में जैसी वस्तु है उसे वैसा न कहकर उल्टा कहनेवाले को मिथ्यावादी कहा जाता है। बौद्धों का शून्य कोटिचतुष्टयविनिर्मुक्त कहा जाता है। वह सत्, असत्, सदसत् और सदसद्विलक्षण इन चारों पक्षों से भिन्न है। नास्ति बुद्धि का गोचर न होने से बौद्ध शून्य को असत् से विलक्षण मानते हैं। वेदान्तियों का ब्रह्म कोटिचतुष्टयविनिर्मुक्त है। परन्तु उसका अर्थ बौद्धों के अर्थ से अलग यह है कि वह ब्रह्म असत्कार्यवादी नैयायिकों तथा वैशेषिकों एवं असत् कारणवादी बौद्धों के समान असत् नहीं है। सांख्ययोग के सत्कार्यवाद के अनुसार ब्रह्म सत् नहीं है। अनेकान्तवादी के समान ब्रह्म सत्-असत् रूप नहीं है। वेदान्तियों के सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय जगत् के समान ब्रह्म अनिर्वचनीय नहीं है। किन्तु चारों से विलक्षण अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाश सत् रूप है। “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” ( छा० उ० ६।२।१ ), “अस्तीत्ये- वोपलब्धव्यः ।” ( उपनिषद् ) यदि झूठ का अर्थ वेदान्तियों का मिथ्यात्व स्वीकार किया जायगा और युगल प्रबल का अर्थ पूर्वोक्त दोनों पक्षों का समुच्चय सत्यासत्य कहा जायेगा तो वह असम्भव ही होगा। क्योंकि वैसा किसी भी दार्शनिक का पक्ष ही नहीं। जगत् को सत्य भी मिथ्या भी दोनों मानना सर्वथा असम्भव है। “करम उपासन ज्ञान वेदमति सो सब भांति खरो” इस पद के पूर्वोक्त-“तुलसीदास परिहरै तीनि भ्रम सो आपन पहचाने” इस पूर्वोक्त से विरुद्ध समझना भी गलत है, क्योंकि भगवान् की सत्यता से ही माया भी सत्य है, जगत् भी सत्य है। यह कहा ही जा चुका है। कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों ही निश्चितरूप से अपना फल प्रदान करते हैं। उनका अपने अपने फल के साथ कार्य-कारणभाव सत्य है। अव्यभिचरित है, व्यभिचरित नहीं । यही उसका खरा होना है। जेहि जाने जग जाई हेराई । जागे यथा स्वप्नभ्रम जाई ॥” ( रा० मा० १।१११।१ ) “एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । यदपि असत्य देत दुख अहई ॥” ( रा० मा० १।११७ १ ) जग नभवाटिका रही है फल फूलि रे । धुवां कैसे धौरहर देख तू न भूलि रे ॥” गोस्वामीजी इन पूर्वोक्त वर्णनों से भी सृष्टि के मिथ्यात्व का ही प्रतिपादन करते हैं। यह भी कहना गलत है कि “इस समाधान को एक सीमा तक गोस्वामीजी यत्र तत्र स्वीकार करते हैं। परन्तु वह सिद्धान्त भी किन्हीं कसौटियों पर खरा नहीं उतरा । अतएव सैद्धान्तिक दृष्टि से उसे भी भ्रम अथवा सीमित सत्य का ही नाम देना होगा” क्योंकि मानस में इसका विरोधी कोई वचन नहीं है। शिवजी के द्वारा इस प्रसङ्ग में राम और जगत् दोनों के याथात्म्य का वर्णन है। जगत् का मिथ्या होना या सीमित सत्य होना दोनों एक ही बात है। हम कह ही चुके हैं कि शुक्ति-रजत एवं रज्जु-सर्प के समान होता हुआ भी संसार शुक्ति, रज्जु आदि के समान सत्य ही माना जाता है। इसी लिए जैसे व्यवहार में कल्पित सर्प और रजत बाधित होते हैं, उसी तरह उसके अधिष्ठानभूत शुक्ति और रज्जु बाधित नहीं होते। वेदान्त में घट, रज्जु, शुक्ति आदि को भी मिथ्या कहा गया है। किन्तु घट के कारण मृत्तिका आदि को सत्य कहा गया है --- “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ।” ( छा० उ० ६।१।४ ) इसी तरह मृत्तिकादि कारण भी अपने कारण की अपेक्षा कार्य विकार होने से मिथ्या हैं। अन्तिम परम कारण या कार्यकारणातीत राम ही परम सत्य हैं। तद्भिन्न सब मिथ्या या सीमित सत्य ही कहे जा सकते हैं। परन्तु सर्वाधिष्ठानभूत भगवान् परम सत्य हैं। सत्य के भी सत्य हैं। उन्हें सीमित सत्य नहीं कहा जा सकता।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४१ मङ्गलाचरण में प्रायः ग्रन्थकार अपना सिद्धान्त ही प्रतिपादन करता है। गोस्वामीजी मङ्गलाचरण में अपने इष्ट देवता भगवान् राम की वन्दना करते हुए कहते हैं— सम्पूर्ण ब्रह्मादि देव एवं असुरसङ्घ सभी जिनकी माया के वशवर्ती हैं जिनके सत्त्व अर्थात् सत्ता से सब कुछ वैसे ही अमृषा अर्थात् सत्य प्रतीत होता है जैसे रज्जु में सर्प का भ्रम सत्य ही प्रतीत होता है एवं भवाम्भोधि तरने की इच्छावालों के लिए जिनके पादारविन्द ही प्लव-जहाज हैं, उन अशेष कारण रामनामवाले सर्वोत्कृष्ट ईश्वर हरि की मैं वन्दना करता हूँ— “यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवा सुरा यत्सत्त्वादमृषेव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः । यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हृदि ॥” रज्जु में सर्प-भ्रम के समान भगवान् में सकल प्रपञ्च है। ऐसा मङ्गलाचरण जगत् के मिथ्यात्व को अङ्गीकार करनेवाले ही करते हैं, अन्य नहीं । भगवान् शिव भी कथारम्भ के पहले मङ्गलाचरण उसी ढङ्ग से करते हैं— “झूठेउ सत्य जाहि बिन जाने । जिमि भुजंग बिन रजु पहिचाने ॥ जेहि जाने जग जाइ हेराई । जागे यथा स्वप्नभ्रम जाई ॥ बन्दउँ बालरूप सोइ रामू । सब निधि सुलभ जपत जस नामू ।” (रा०मा० १।१११।१,२) झूठा भी जगत् जिसको बिना जाने सत्य प्रतीत होता है। जैसे बिना रज्जु को पहचाने सर्प सत्य प्रतीत होता है। जिसको जानने से जगत् हराय जाता है, अत्यन्त बाधित हो जाता है। जगत् का पता नहीं लगता । जैसे जाग जाने पर स्वप्न चला जाता है। स्वप्न की वस्तुओं का कहीं पता भी नहीं लगता । उन बालरूप राम की मैं वन्दना करता हूँ। जिनका नाम जपने से सब प्रकार की सिद्धियां सुलभ हो जाती हैं। अपने भगवान् राम का ही स्वरूप निरूपण करते हुए भगवान् शिव कहते हैं— “जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ज्ञान गुन धामू । जासु सत्यताते जड़ माया । भास सत्य इव मोहसहाया ॥ (रा० मा० १।११६।४) “रजत सीप महँ भास जिमि यथा भानुकर बारि । यद्यपि मृषा तिहुं काल सोइ भ्रम न सकै कोउ टारि ॥ (रा० मा० १।११७) अव्यक्तादि विकारान्त सारा जगत् प्रकाश्य है। प्रकाशक अखण्डबोध राम हैं। जिसकी सत्यता से जड़ माया भी मोह की सहायता से सत्य प्रतीत होती है। यद्यपि सीप में रजत तथा सूर्यरश्मि में जल तीनों कालों में सम्भव नहीं, मिथ्या ही है तथापि जब तक सीप और सूर्यरश्मि का अपरोक्ष साक्षात्कार न हो तब तक उस भ्रम को कोई टाल नहीं सकता है। “एहि विधि जग हरि आश्रित रहई । यदपि असत्य देत दुख अहई ।।” (रा० मा० १।११७।१) इसी तरह जगत् हरि में आश्रित है। वह यद्यपि असत्य ही है तथापि वह दुःखदायी है ही। जैसे कोई स्वप्न में किसी का सिर काटता हो भले वह मिथ्या ही है तथापि जब तक मनुष्य जाग नहीं जाता तब तक स्वप्न के सिर काटने का दुःख होता ही है— “जो सपने सिर काटे कोई । बिन जागे दुख दूर न होई ॥ जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ।।” (रा०मा० १।११७।१,२) १०६

८४२ रामायणमीमांसा एकत्रिंश इससे बढ़कर कौन सी कसौटी चाहिये, जगत् की असत्यता में और भगवान् की सत्यता में। इसके विरोध में तुलसी, शिव, याज्ञवल्क्य, भुशुण्डि किसी ने कहीं भी कुछ नहीं कहा। फिर इन सिद्धान्त-वचनों को असत्य कैसे कहा जा सकता है। "सुनि शिव के भ्रमभंजन बचना। मिट गइ सब कुतर्क की रचना ॥" (रा० मा० १।११८।४) भगवान् सिव के भवभञ्जन वचन में भी भ्रम की कल्पना सचमुच मोह एवं अहङ्कार रूपी भूत की ही करामात है। इसी प्रकार कर्मसिद्धान्त भी सिद्धान्त ही है। "कर्मप्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥" (रा० मा० १।२१७।१) गोस्वामीजी भी यही कहते हैं— "यद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पुन्य पाप गुन दोषू ॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा० मा० २।२१७।२, ३) कर्मसिद्धान्त की व्यावहारिक स्थिति का सांकर्य करना असंगत ही है। भले ही किसी व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार मरना हो तथापि मारनेवाला यह कहकर मुक्त नहीं हो सकता कि वह अपने कर्म के अनुसार मरा है। इसमें हमारा दोष नहीं। किसी को फाँसी की सजा भी सुनायी गयी हो तथापि फांसी देने के लिए अधिकृत व्यक्ति ही. उसे फाँसी दे सकता है। अनधिकृत व्यक्ति वैसा करेगा तो वह स्वयं ही दण्ड का भागी होगा। हर व्यक्ति के सामने अपना कर्तव्य है। भले ही व्यवहार में मुकाबले में प्रहार करनेवाले के प्रहार को विफल करने का एवं अपने रन्ध्रों के गोपन पर रन्ध्रान्वेषण करके प्रहर्त्ता को दण्ड देने का प्रयास भी किया जाता है और वैसा करना नीतिशास्त्र से सम्मत है। वैसा न करना ही दोष है। जैसा कि भगवान् ने कहा है कि—अर्जुन ! यदि तुम धर्मयुक्त संग्राम से मुँह मोड़ोगे तो स्वधर्म एवं कीर्ति को त्यागकर पाप के भागी बनोगे— "अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिञ्च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥" (गीता २।३३) अतः वह विचार गलत है जो तुमने सोचा था कि यदि प्रतीकार न करनेवाले और शस्त्र न उठानेवाले मुझपर शस्त्रपाणि दुर्योधनादि धार्तराष्ट्र प्रहार कर हनन करेंगे तो यह मेरे लिए अच्छा है— "यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥" (गीता १।४६) प्रारब्ध दैव और प्राक्तन कर्म सिद्धान्त को समझनेवाला व्यक्ति किसी भी इष्टानिष्ट घटनाओं के घट जाने पर उन्हें प्रारब्धजनित जानकर शोक-मोहरहित होकर रागद्वेष से अलिप्त होकर कर्तव्य पालन में लगता है। सामान्यतया दैव अदृष्ट प्रारब्ध कर्म अचिन्त्य होता है। फल के पहले उसका ज्ञान ही नहीं होता है। वह फलबल से ही कल्प्य होता है। फल होने के बाद दैव का ज्ञान होता है। परन्तु तब वह रहता ही नहीं, फिर उससे युद्ध कैसा ? यही बात श्रीराम ने लक्ष्मण को समझाते हुए तब कही थी जब उन्होंने कहा था कि आज मेरे बाणों से विदीर्ण हो रणाङ्गण में पड़े हुए दैव को लोग देखेंगे।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४३ "यदचिन्त्यं तु तद्देवम्......।।" (वा० रा० १।२२।२०) तीव्रतम पुरुषार्थ करने पर भी सफलता नहीं मिलती तब फलबलकल्प्य प्रबल दैव को जानकर संतोष किया जा सकता है। यही अभिप्राय निम्नोक्त वचनों का है— "काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता। निजकृत करम भोग सुन भ्राता।।" "सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता। परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।।" इत्यादि अधिक सूक्ष्म विचार करने पर यह भी सिद्ध होता है कि संसार में वास्तव में कोई शत्रु या मित्र नहीं। अपने आप ही प्राणी अपना मित्र है और वही अपना शत्रु है—"आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" (गीता ६।५) प्राणी का शुभ कर्म ही उसका मित्र बनकर सुख देता है। उसका अशुभ कर्म ही उसका शत्रु बन उसे दुःख देता है। अतः व्यावहारिकरूप से धर्मशास्त्र तथा नीतिशास्त्र के अनुसार देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार उचित कर्तव्य पालन करते हुए भी प्राणी राग-द्वेष से मुक्त होकर स्वस्थ शोकमोहातीत हो सकता है। यह कहना भी गलत है कि "कर्मसिद्धान्त अकाट्य प्रमाणित नहीं है। यह सिद्धान्त जितना शक्तिशाली है मूलका प्रश्न आते ही इसकी निर्बलता उतनी ही प्रकट होती है। यदि कर्म के अभाव में सृष्टि संभव न हो तो विश्वोद्भव के प्रथम अवसर पर कर्म का निर्माण कैसे हुआ ? यदि पूर्व में कर्म नहीं था तो सृष्टि कैसे बनी ? पर यदि सृष्टि ही न होगी तो कर्म कैसे होगा ? अतः कर्म और सृष्टि के आदि का विचार करते हुए असंगति लगने लगती है। अनादि कहकर मूल पर विचार करने की परिस्थिति से बचने की प्रवृत्ति यहाँ स्पष्ट हो जाती है।" क्योंकि यह सब शास्त्रीय व्यवस्थाओं के न जानने का परिणाम है। सब ज्ञान मानस से ही नहीं होगा। शास्त्रों की भी अपेक्षा है। विवाह, जनेऊ आदि संस्कार भी केवल मानस की चौपाइयों से ही कराने की कोशिश करना मानस- भक्ति का दुरुपयोग ही है। ब्रह्मसूत्र में विचार—श्रुति कहती है कि परमेश्वर जिसे उत्कृष्ट ब्रह्म, इन्द्र आदि लोकों में ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है। ईश्वर जिसे निकृष्ट लोकों में ले जाना चाहता है उसे निकृष्ट कर्मों में लगा देता है—"एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते" (कौ० उ० ३।८) परन्तु ऐसी स्थिति में ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष उपस्थित होते हैं। वह क्यों किसी से साधु कर्म कराता है और क्यों किसी से असाधु कर्म कराता है ? क्यों किसी को उत्कृष्ट लोक में ले जाता है एवं क्यों किसी को निकृष्ट लोकों में ले जाता है ? वह तो सर्वत्र समान है। उसका कोई द्वेष्य अप्रिय नहीं है। फिर ऐसी विषम सृष्टि रचना से किसी को उन्नत और किसी को दीन-हीन, दरिद्र, दुःखी बनाने से तो उसमें विषमता, निर्दयता आदि दोष उपस्थित होते ही हैं। इन सब बातों का समाधान करते हुए कहा गया है कि "वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति (ब्र० सू० २।१।३४) ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष नहीं होंगे, क्योंकि वह कर्मसापेक्ष होकर कर्मों के अनुसार ही विषम सृष्टि की रचना करता है। प्राणियों के कर्मों की विषमता से ही सृष्टि में विषमता होती है। वृष्टि होने पर धरित्री से विविध विलक्षण पौधे उत्पन्न होते हैं। बीजों की विलक्षणता से ही पौधों में विलक्षणता होती है। शासन भी कर्मों के अनुसार ही निग्रहानुग्रह करता है। वैसे ही परमेश्वर भी कर्मों के अनुसार ही प्राणियों को विविध देह तथा सुख, दुःख एवं तदनुगुण सामग्रियाँ प्रदान करता है। ऐसी स्थिति में विश्वोद्भव के प्रथम अवसर का प्रश्न ही नहीं उठता है।

८४४ रामायणमीमांसा एकविंश कर्म और सृष्टि की परम्परा को अनादि कहना मूल विचार से बचने की प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु वस्तुस्थिति है । आम की गुठली और आम के पौधे की धारा या किसी भी बीज और अङ्कुर की धारा को अनादि बिना स्वीकार किये कैसे समाधान होगा ? वहाँ अनादि कल्पना अन्धपरम्परा कही जाती है जहाँ कार्यकारणभाव के निर्णयार्थ अनादिता का सहारा लेना पड़ता है । प्रकृत में तो स्पष्ट ही बीज से अङ्कुर और अङ्कुर से बीज उत्पन्न होते हुए दिखायी देते हैं । अतः बीज एवं अङ्कुर की अनादि धारा मान्य ही हैं । जगने पर व्यक्ति के मन में सोने से पहले के संस्कार जग उठते हैं । पूर्व पूर्व दिनों के अनुसार ही उत्तरोत्तर दिनों के सब व्यवहार चलते हैं । अतएव सोने तथा जगने की धारा की अनादिता स्पष्ट ही है । जन्म-मरण एवं सृष्टि-प्रलय भी एक प्रकार का सोना-जागना ही है । किसी कारण अत्यन्त विस्मृति होना ही मृत्यु है और सर्वरूप से विषयों की स्वीकृति ही जन्म है— “जन्तौर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युर्त्यन्तविस्मृतिः । जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद ॥ विषयस्वीकृतिं प्राहुर्रथा स्वप्नमनोरथौ ॥” अतः जब सोने और जगने की धारा अनादि हैं ही तब इसी तरह जन्म-मरण और सृष्टि-प्रलय की धारा को भी अनादि मानना उचित ही है । अनादि पदार्थ नहीं हैं यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जीव और ईश्वर अनादि रूप से सबको मान्य हैं ही । ‘ प्रकृतिं पुरुषञ्चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।’ ( गीता० १३।१९ ) उसी अनादि जीव के सम्बन्ध से अनादि जन्म-मरण की धारा चलती है । अनादि ईश्वर के आश्रित अनादि सृष्टि से संहार की परम्परा मान्य है । जैसे कर्मों के अनुसार जन्म-मरण की धारा चलती है। वैसे कर्त्रों के अनुसार ही सृष्टि-प्रलय की धारा भी चलती है । अनादि होने पर भी जैसे पाकज क्रिया से परमाणु की श्यामता नष्ट होती है एवं बीज में अनादि परम्पराप्राप्त अङ्कुरोत्पादिनी शक्ति बीजाग्निसंयोग से नष्ट हो जाती है, वैसे ही अनादि होने पर भी तत्त्वज्ञान के सम्बन्ध से अनादि सृष्टि कर्म की धारा तथा कर्म जन्म धारा बन्द हो जाती है। अतएव माया, जीव आदि अनादि सान्त होते हैं । केवल एक परमेश्वर ही अनादि-अनन्त होता है। इसलिए अनादि माया, अज्ञान एवं संसार की बाधसामग्री ब्रह्मात्मज्ञान है और अनादि ब्रह्म के बाध की सामग्री नहीं है । अतः वह अनन्त है । सुख, दुःख, सम्पत्ति, विपत्ति सब व्यावहारिक लौकिक वस्तुएँ हैं उन्हीं की व्यवस्थाओं का नियामक कर्म हैं । परन्तु तत्त्वज्ञान के द्वारा जैसे माया अज्ञान कार्य संसार बाधित हो जाता है। वैसे ही कर्म भी बाधित हो जाता है— “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ।” ( मु० उ० २।२।८ ) परावर ब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार होने पर हृदयग्रन्थि ( आत्मा एवं अनात्मा का अन्योन्याध्यास ) भिन्न हो जाती हैं । सत्य रज्जु की ग्रन्थि तो ज्ञानमात्र से नहीं खुलती और खुलने पर भी दोनों रस्सियां विद्यमान रहती हैं । परन्तु चिज्जड की ग्रन्थि तो सत्यानृत की ग्रन्थि है। यहाँ तो ग्रन्थि खुलने पर सत्य ही रह जाता है । अनृत मिट जाता है । तभी तो तुलसी ने इसे मृषा मिथ्या कहा है—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४५ “जड़ चेतनहि ग्रन्थि परि गयी। यद्यपि मृषा छूटत कठिनयी ॥ सब संशय छिन्न हो जाते हैं। प्रारब्ध से अतिरिक्त सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। गीता भी कहती है— “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।” ( गीता ४।३७ ) जब सुख, दुःख, हानि लाभ नहीं तब कर्म का उपयोग भी क्या है ? इसी लिए लखनलाल ठीक ही कहते हैं कि— “योग वियोग भोग भल मन्दा । हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा ॥ जनम करम जहँ लगि जग जालू । संपति विपति करम अरु कालू ॥ देखिय सुनिय गुनिय मन माहीं । मोहमूल परमारथ नाहीं ।। (रा० मा० २।९१।३,४) एक ब्रह्म ही भगवान् ही परमार्थ परम सत्य है । तद्भिन्न सब कुछ मोहमूलक है । परमार्थ नहीं है, मिथ्या है, सीमित सत्य है। यह भी सृष्टि के मिथ्यात्व की कसौटी ही तो है। “सपने होइ भिखारि नृप रङ्क नाकपति होइ । जागे हानि न लाभ कछु तिमि प्रपञ्च जग जोइ ।।” ( रा० मा० २।९१ ) इतने स्पष्ट रूप से प्रपञ्च का मिथ्यात्व परमेश्वर का परम सत्यत्व वर्णित होने पर भी मानस के नाम पर सभी सत्यों को सीमित कहकर अव्यवस्था फैलाना अनुचित है । यदि ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से सुख, दुःखादि प्रपञ्च बाधित हो सकते हैं तब यही तो उसका मिथ्यात्व है । वासनानिवृत्ति, वैराग्य आदि तो वास्तविक ज्ञानाभ्यास के सहभावी होते हैं । तत्त्वज्ञान, मनोनाश, वासनाक्षय का सहाभ्यास हो लाभदायक होता है। जब तत्त्वज्ञान से दृश्य प्रपञ्च का मार्जन हो जाता है तब निर्दृश्य विशुद्ध ब्रह्मात्मा का अवशेष रहता है । फिर चित्त की एकाग्रता या मनोनाश तथा वासनाक्षय होने से पूर्ण जीवन्मुक्ति होती ही है । अतएव मिथ्यात्व सिद्धान्त के साथ वैराग्य के दृष्टिकोण को जोड़ लेने का प्रश्न ही नहीं उठता । “मोह निशा सब सोवनि हारा । देखिय सपन अनेक प्रकारा ॥ एहि जग जामिनि जागहिं योगी । परमारथी प्रपञ्च बियोगी ॥ जानिय तबहिं जीव जब जागा । जब सब विषय विलास बिरागा ॥ होइ बिबेक मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथचरन अनुरागा ।।” (रा०मा०२।९२।१-३) श्रीराम ही परमार्थ सत्य हैं। तद्भिन्न सब अपरमार्थ है। व्यावहारिक या सीमित सत्य है । वस्तुतः शास्त्रों के प्रसिद्ध सिद्धान्तों का ही मानस में वर्णन है। राम ने, लक्ष्मण ने, भरत ने एवं शिवजी ने कोई नया सिद्धान्त नहीं कहा ।- राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अचल अनादि अनूपा ॥ सकल बिकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ।।” (रा०मा०२।९२।३) मिथ्यात्व सिद्धान्त किस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, यह नहीं दिखलाया गया । प्रतिज्ञामात्र से वस्तु- सिद्ध नहीं होती । उसके लिए प्रमाण की अपेक्षा होती है । कहा जाता है कि “बाह्य वर्णव्यवस्था के स्थान पर आन्तर मन की वर्णव्यवस्था को बनाकर विचार करना चाहिये । बाह्य व्यवहार में हम अपने वर्गविशेष से इतने बँध चुके हैं कि सत्य भी हममें आक्रोश की सृष्टि करता है। वह संघर्ष अपनों और परायों का भी बन जाता है। आन्तर में भी वही भेद हैं। पर वहाँ अपने पराये

[८४६ : रामायणमीमांसा : एकविंश]

का भेद नहीं है । सत्ता की भूख, ऐश्वर्य की भूख एवं शरीर की भूख यह तो जीवन के साथ जुड़ी हुई है। हमारा मन अलग अलग समयों में किसी को महत्त्व देता रहता है । सत्ता की भूख ही मन का क्षत्रियत्व है। कभी वैभव ऐश्वर्य के लिए योजना बनाता है तब मन का वैश्यत्व जाग उठता है । कभी शरीर की आवश्यकता की पूति के लिए व्यग्र हो उठता है, यह मन का शूद्रभाव है। जब मन ऊँचे आदर्शों की ओर प्रेरित होता है। व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति से हटकर समाज के कल्याण की भावना से भर उठता है। सुख-सुविधाओं को छोड़कर कष्ट और तप का जीवन अपनाना चाहता है यही वृत्ति ब्राह्मण है।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त गुण तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब में ही समय समय पर आविर्भूत होते ही रहते हैं। फिर तो इससे कोई व्यवस्था नहीं बनती है। आप स्वयं मानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के लिए एक सी मनःस्थिति न सदा सम्भव ही है न आवश्यक ही है। ऐसी स्थिति में व्यवहारतः किसको ब्राह्मण एवं किसको क्षत्रियादि कहा जाय ? ब्राह्मण मनोवृत्ति आवश्यक है तो सभी के लिए आवश्यक है । वस्तुतः शास्त्रों में तो ब्राह्मणादि वर्णव्यवस्था संस्कारों एवं कर्मों के लिए अपेक्षित है। जैसे ब्राह्मण का वसन्त में उपनयन किया जाय, क्षत्रिय का ग्रीष्म में एवं वैश्य का शरद् में। शूद्र का उपनयन संस्कार नहीं, जिनका उपनयन संस्कार होगा वही वेदाध्ययन एवं वेदार्थानुष्ठान के अधिकारी होंगे। प्रश्न तो यह है कि यदि जन्मना शूद्र में ब्राह्मण या क्षत्रिय की वृत्ति पैदा हो जाय तो उसे वेदाध्ययन, वेदार्थानुष्ठान का अधिकार है या नहीं ? निषाद में बड़े उत्तम गुण आ गये थे । क्या उसको ब्राह्मण मान लिया गया था और उसे वेदाध्ययन एवं वेदोक्त यज्ञों के अनुष्ठान का अधिकार मिल गया था ? शास्त्रों की दृष्टि से तो यह सब असम्भव ही है। वाजपेय यज्ञ में ब्राह्मण और क्षत्रिय का ही अधिकार है। राजसूय में केवल क्षत्रिय का एवं जन्मना क्षत्रिय का ही अधिकार है। वैश्यस्तोम में वैश्य का ही अधिकार है। किसी कर्म में निषाद का एवं किसी में रथकार जाति का ही अधिकार है। इन सब बातों का वृत्ति और गुण से मुख्य सम्बन्ध नहीं है । जैसे सिंह से सिंही में उत्पन्न एवं शौर्य, क्रौर्यादि गुणों से युक्त मुख्य सिंह होता है । केवल गुण होने से मनुष्य को भी सिंह कहा जा सकता है। परन्तु गुण न होने पर योनिमात्र सम्बन्ध से जातिसिंह का ही व्यवहार होता है । निकृष्ट अधम यहाँ तक कि मृत सिंह को भी सिंह ही कहा जाता है। ठीक इसी तरह विद्या, तप और योनि तीनों के होने पर मुख्य ब्राह्मण होता है । विद्या और तप न होने से तो केवल जातिब्राह्मण ही होता है। यह महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलि का कहना है— “विद्या तपश्च योनिश्च त्रयं ब्राह्मणकारणम् । विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ॥” शास्त्रों में साङ्कर्य को महान् दोष माना गया है। अब यदि वृत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण माने जायें तब तो ब्राह्मण पति-पत्नी में भी समय समय पर वृत्ति एवं गुणों में रद्दोबदल होता ही है । इस स्थिति में यदि पत्नी में ब्राह्मण गुण बढ़े हों पति में क्षत्रिय या शूद्रगुण आ गये हों तब तो आपके मत से चाण्डाल आदि प्रतिलोम सङ्करों की सृष्टि सम्भव है ही । नामकरण में व्यवस्था है और जन्म से दस दिनों के बाद ही नामकरण संस्कार होता है। दस दिन के बालक में ब्राह्मण, क्षत्रियादि वृत्तियों का निर्णय होना संभव ही न होगा। अतः शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि नाम- करण कैसे होगा ? अतएव वेदों में जन्मना वर्णव्यवस्था का ही वर्णन है । “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥”

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४७ यह मन्त्र ऋक्, यजु एवं अथर्व तीनों ही वेदों में आता है। साम तो ऋग्वेद के मन्त्रों का गीतिविशेष ही है। इस मन्त्र में यह सन्देह हो सकता था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भगवान् के मुख, बाहु और ऊरु रूप कहे गये हैं। मन्त्र में यह नहीं कहा गया है कि भगवान् के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ है। परन्तु "पद्भ्यां शूद्रोऽजायत" इस अन्तिम पङ्क्ति से स्पष्ट निर्णय हो जाता है। जैसे शूद्र भगवान् के पैर से उत्पन्न हुआ है वैसे ही ब्राह्मणादि भगवान् के मुखादि से ही उत्पन्न हुए हैं। जैसे मृद् (मिट्टी) से उत्पन्न घट के साथ मृद् का "मृद् घटः" इस प्रकार सामानाधिकरण्य देखा जाता है। उसी तरह मुख से जन्म होने के कारण 'ब्राह्मणो मुखम्' यह सामानाधिकरण्य है। इसी का स्पष्टीकरण करते हुए मनु ने "मुखबाहूरुपज्जानाम्" इस पद्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को मुखबाहूरूपज्ज कहा है। अर्थात् ब्राह्मणादि भगवान् के मुखादि से उत्पन्न हुए हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में श्वयोनि, सूकरयोनि के समान ही ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि, शूद्रयोनि तथा चाण्डाल योनि का वर्णन किया है। "तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा ।।" (छा० उ० ५।१०।७) अतः जैसे श्वयोनि, सूकरयोनि में जन्म पाने पर जब तक वह देह रहता है जाति नहीं बदल सकती है वैसे ही ब्राह्मणादि जातियों में भी यावत् देह जाति रहती है तब तक जाति नहीं बदल सकती है। जहाँ भी कहीं कर्म या गुण से जाति का वर्णन है वह वैसे ही गौण ब्राह्मणादि का वर्णन है जैसे सिंह के गुण होने से मनुष्य को भी सिंह गौणी वृत्ति से कहा जाता है। मनुष्य मुख्य सिंह नहीं ही कहा जाता है। अवश्य ही उत्तम गुण होने से उत्तम जाति में जन्म होता है। कुछ लोग कहते हैं कि हनुमान्जी ने रावण के बगीचों के फल खाये । रावण उसको चोरी कहता है । परन्तु हनुमान् की दृष्टि में सारी वस्तु-सम्पत्ति परमेश्वर की है, राम की है। रावण की सम्पत्ति ही नहीं थी । बलि ने वामन भगवान् को दान लेने को कहा, परन्तु यह उसका साहस था । उसकी वस्तु ही क्या थी जो वह देता । वस्तु तो सब भगवान् की ही थी। परन्तु यह सब बुद्धि का अतिरेक ही है। यह बात पीछे भी कही जा चुकी है कि व्यावहारिक सत्ता का अपलाप करने से शास्त्रीय व्यवहार भी बाधित होते हैं। अवश्य अनन्तकोटि ब्रह्माण्डाधिपति परमेश्वर का ही सब कुछ है। तब भी शास्त्रों में जीवों के लिए यज्ञ, दान, व्रत आदि का विधान है और वह सब धन-सम्पत्ति होने पर ही संभव है। यदि जीव का अपना कुछ है ही नहीं तो अन्नदान, अश्वदान आदि कैसे बनेगा ? भगवान् की ही दी हुई वस्तुओं को भगवान् में अर्पित करके भक्त निहाल होता है- "त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये" सूर्य के दिये हुए जल से सूर्य भगवान् को जलाञ्जलि दी जाती है। सूर्य के ही अंश दीप से सूर्य की आरती उतारी जाती है। जैसे सब भूमि राजा की होने पर भी अवान्तर स्वत्व करद राजाओं, जागीर- दारों, काश्तकारों का भी उन उन भूमियों पर होता ही है। राजा को कोई भूमि लेना हो तो उसका प्रतिकर या मुआवजा देना ही पड़ता है। मनमानी अपहरण की बात नहीं चलती है। कई बार ऐसी कार्यवाहियाँ न्यायालयों से अवैध घोषित होती रहती हैं। भले रावण भी भगवान् की शक्ति सीता को चुरानेवाला चोर था । फिर भी इतनेमात्र से चोर की वैध सम्पत्ति भी अवैध नहीं हो जाती है। परन्तु यदि व्यक्तिगत सम्पत्ति मान्य ही नहीं तब जो चोर नहीं हैं उनकी भी

८४८ रामायणमीमांसा एकविंश सम्पत्ति उनकी न मानी जायगी। फिर तो कोई डाकू और चोर भी किसी मालिक से कह सकता है कि तुम्हारी सम्पत्ति ही नहीं है यह तो भगवान् की है। फिर तो यह जैसे तुम्हारी है वैसे ही हमारी है। पर क्या यह कथन उचित होगा ? वस्तुतः उक्त प्रसङ्ग में हनुमान् पर चौर्य का आरोप था भी नही ओर हो भी नहीं सकता था, क्योंकि युद्ध ठन जाने पर एक राजा दूसरे की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर देता है। इसी दृष्टि से राजसूय यज्ञ में राजाओं को जीतकर उनका धन लाकर यज्ञ के काम में लगाया जाता है। जैसे दाय से सम्पत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त होता है, वैसे ही जय के द्वारा भी सम्पत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त होता है— “सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभो जयः क्रयः ।” ( मनु १०।११५ ) रावण भी देवताओं को जीतकर उनके विविध रत्नों का स्वामी हुआ था। लङ्का भी तो कुबेर की ही थी। उसने जय के द्वारा उसपर अधिकार प्राप्त किया था। अतः जब सीताहरण के कारण युद्ध छिड़ गया तब आक्रामक राम के दूत हनुमान् को अधिकार है ही कि वे रावण की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर दें। रावण का मुख्य प्रश्न यही था कि तू कौन है ? और किसके बलपर तूने बन उजाड़ा ? और किस अपराध पर राक्षसों को मारा— “कह लंकेश कौन तैं कीसा। केहिके बल घालेसि बन खीसा ।। मारे निसचर केहि अपराधा ।” ( रा० मा० ५।२०।१,२ ) इसी का उत्तर हनुमान् ने दिया था— “सुन रावन ब्रह्माण्डनिकाया। पाइ जासु बल विरचति माया ।। जाके बल बिरञ्चि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ॥” (रा० मा० ३।२०।२,३) जाके बल लवलेस ते जितैहु चराचर झारि । तासु दूत मैं जासु कर हरि आनेसि प्रिय नारि ॥” ( रा० मा० ५।२१ ) जिसके बल से माया अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण करती है। जिसके बल से ब्रह्मादि विश्व की सृष्टि आदि करते हैं। जिसके ही बल से लवलेश से तुमने चराचर को जीता है। मैं उसी का दूत हूँ, तुमने जिसकी प्रिय नारी का अपहरण या चौर्य किया है। प्रह्लाद ने भी हिरण्यकशिपु से कहा था कि राजन् ! मेरा ही नहीं आपका बल भी वही है और सभी बलवानों का भी बल वही है। केन उपनिषद् की आख्यायिका से यह सिद्ध ही है कि जिन अग्नि और वायु के सम्बन्ध से सभी देवता, दानव और मानव बलवान् पहलवान् होते हैं एवं जिनका सम्बन्ध भङ्ग होने से सब ठण्डे निष्प्राण मुर्दे हो जाते हैं, वे अग्नि और वायु भी भगवान् के अनुग्रह के बिना तृण भी जलाने और उड़ाने में समर्थ नहीं हो सके थे। अतः उन्हीं के बल से सब बलवान् हैं, यह सिद्धान्त मानना चाहिये । मुझे भूख लगी थी, इसी लिए फल खाये। वानर-जाति के स्वभावानुसार मैंने कुछ वृक्षों को तोड़ डाला। जिन लोगों ने मुझे मारा उन्हें मैंने भी मारा। हनुमान् जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि यह सम्पत्ति तुम्हारी नहीं है, रामजी की सम्पत्ति है, मैंने वाटिका की स्वामिनी से आज्ञा ले ली है—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४९ “खायउँ फल प्रभु लागी भूखा । कपिस्वभाव तें तोरेउँ रूखा ॥ जिन मोहि मारा तिन मैं मारा” ( रा० मा० ४।२१।२,३ ) इतना ही नहीं वे यह भी कहते हैं कि तुम श्रीराम के चरणारविन्द को हृदय में धारण कर के लङ्का का अचल राज्य करो— “रामचरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ।।” ( रा० मा० ५।२२।१ ) उधर भगवान् वामन भी विजय द्वारा प्राप्त बलि की त्रिभुवनसम्पत्ति को दान द्वारा प्राप्त कर के ही इन्द्र को प्रदान करते हैं । यदि बलि की उसमें प्रभुता ही नहीं थी तो दान लेने की अपेक्षा भी क्यों होती । अतः शास्त्र- विरुद्ध ऐसी सब कल्पनाएँ उपेक्ष्य ही समझनी चाहिये । यह तो दाता के सोचने की बात है । वस्तुतः भगवान् की सब वस्तुएँ हैं । उनको समर्पण का अर्थ है— उनकी ही दी हुई वस्तु का उन्हें ही समर्पण करना । जैसा कि बलि की पत्नी विन्ध्यावलि ने कहा था— “क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं च तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्य त आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥” ( भाग० ८।२२।२० ) हे भगवन् ! आपने अपनी क्रीड़ा के लिए त्रिजगत् का निर्माण किया है। आपके निर्मित विश्व में कुबुद्धि लोग अपना स्वामित्व जमा लेते हैं । वास्तव में सम्पूर्ण विश्व के परमकर्ता आपको वे लोग क्या दे सकते हैं । वे निर्लज्ज हैं जो आपको देने का अभिमान करते हैं, क्योंकि कर्तृत्ववाद का आरोप भी तो आपमें ही है । अधिष्ठानभूत परात्पर परब्रह्म में ही कर्तृत्वविशिष्ट जीव भी तो कल्पित ही हैं । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र द्वारा प्रतिपादित स्वत्व का अपलाप कर दिया जाय । भले सब कुछ भगवान् का ही है तो भी जगत् के निर्माण में जहाँ भगवान् उपादान और निमित्त कारण हैं । वहीं जीव भी अपने शुभाशुभ कर्मों द्वारा विश्वप्रपञ्च के निर्माण में हेतु होता है । तभी वह विश्व के द्वारा सुख दुःख का भोक्ता होता है और तभी ईश्वर विषम सृष्टि निर्माण करने पर भी नैर्घृण्य ( निर्दयता ) और विषमता रूप दोष का भागी नहीं होता । जैसे स्वामी के द्वारा प्रदान की हुई वस्तु का सेवक स्वामी होता है, उसी तरह अपने कर्मों द्वारा और वैध मार्ग दाय, जय, क्रय आदि द्वारा प्राप्त वस्तुओं का स्वामी जीव भी होता ही है । तभी तो भगवान् ने भी अदिति की तपस्या से सन्तुष्ट होकर अदिति-पुत्रों देवताओं के हितार्थ बलि से दान के रूप में त्रिजगत् प्राप्त कर के देवताओं को प्रदान किया था । “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।” इस प्रकार के वचनों से यह नहीं समझना चाहिये कि श्रद्धा और विश्वास ही भवानी और शङ्कर हैं । श्रद्धा और विश्वास से अतिरिक्त भवानी और शङ्कर नहीं हैं । श्रीराम, जानकी तथा लक्ष्मण के लिए जीव, ब्रह्म और माया का दृष्टान्त किया गया है— “उभय मध्य सिय सोहै कैसी । जीव ब्रह्म बिच माया जैसी ॥ उपमा बहुरि कहहुँ जिय जोही । जिमि बिधु बुध बिच रोहिनि सोही ॥” (रा०मा० २।१२१।१,२) १०७

८५० रामायणमीमांसा एकविंश "लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत । सोह मदन मुनि बेष जनु रति ऋतुराज समेत ॥” (रा० मा० २।१३२) स्पष्ट ही है। वस्तुतः जीव, ब्रह्म, माया या विधु, बुध, रोहिणी रूप ही राम, सीता और लक्ष्मण नहीं हैं। इसी तरह मदन, रति और ऋतुराज भी वे नहीं हैं। वस्तुतः रति को तो गोस्वामीजी ने सीता की उपमा के योग्य भी नहीं समझा— “केहि पटतरिय तीय सम सीया। जग अस युवति कहाँ कमनीया ॥ गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥ विष वारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥” (रा० मा० १।२४६।२,३) fleuraron/divider/asterisk

द्वाविंश अध्याय रामायण आदि का रचना-काल कहा जाता है कि ईसा से एक शताब्दी पूर्व रामायण महाकाव्य पहले पहल पाश्चात्य देशों में विख्यात होने लगा था। उस समय अनेक लोगों का मत था कि इसकी रचना अत्यन्त प्राचीन काल में हुई थी। ए० श्लेगल के अनुसार ११ शती ई० पू० तथा जी० गोरेसियों के अनुसार लगभग १२ शती ई० पू० । इस मत के प्रतिक्रिया- स्वरूप जी० टी व्हीलर तथा डाक्टर वेबर ने रामायण पर यूनानी तथा बौद्ध प्रभाव मानकर उसकी रचना अपेक्षा कृत नवीन समझी है। इन दोनों मतों का खण्डन रामकथा के द्वितीय भाग में श्रीबुल्के ने किया है। आगे चलकर रामायण के रचना-काल के विषय में लिखते हुए विद्वान् प्रायः आदिरामायण तथा प्रचलित बाल्मीकिरामायण का अलग-अलग रचना-काल मानते हैं। एम्० विंटरनित्स इस प्रश्न का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद एच्० याकोबी के परिणाम पर पहुँचते हैं। एच्० याकोबी पहली अथवा दूसरी शताब्दी ई० को प्रचलित रामायण का रचना-काल मानते हैं। एम्० विंटरनित्स दूसरी शती ई० अधिक समीचीन समझते हैं। सी० वी० वैद्य इसका काल दूसरी शती ई० पू० तथा दूसरी श० ई० के बीच में मानते हैं। यद्यपि वह पहली शती ई० पू० अधिक सम्भव समझते हैं। कालिदास के समय में रामायण ने अपना प्रचलित रूप धारण कर लिया था तथा भारत के आरण्यक पर्व के रचना-काल में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की कुछ सामग्री प्रचलित हो गयी थी, अतः अधिक सम्भव है कि प्रचलित-रामायण का रूप दूसरी शती ई० के बाद का नहीं है। प्रामाणिक वाल्मीकिकृत रामायण में बौद्ध धर्म की ओर निर्देश नहीं है, अतः इसकी रचना बुद्ध के पूर्व ही अथवा पाँचवीं शती ई० पू० में हुई होगी, यह एम्० मोनियर विलियम्स तथा सी० वी० वैद्य का प्रधान तर्क प्रतीत होता है। डा० याकोबी रामायण का रचना-काल पाँचवीं शती ई० पू० से छठी और आठवीं शती ई० पू० के बीच में मानते हैं। ए० ए० मैकडोनेल भी याकोबी के तर्क दुहराकर रामायण की उत्पत्ति बौद्ध धर्म से पूर्व मानते हैं। ए० बो० कीथ डा० याकोबी के ग्रन्थ के बीस वर्ष बाद उनके तर्कों का विस्तृत विश्लेषण तथा खण्डन करके रामायण की रचना चौथी शती ई० पू० में रखते हैं। श्रीबुल्के महाभारत और रामायण शीर्षक में कहते हैं कि रामायण में महाभारत के वीरों का निर्देश नहीं मिलता दूसरी ओर महाभारत में न केवल रामकथा का वरन् वाल्मीकिकृत रामायण का भी उल्लेख है इससे स्पष्ट है कि रामायण की रचना के पश्चात् महाभारत को अपना वर्तमान रूप मिला हो। फिर भी बहुत सम्भव है कि भारत (अर्थात् महाभारत का प्राचीन रूप) रामायण के पूर्व उत्पन्न हुआ हो। चतुर्विंशतिसाहस्री भारतसंहिता तथा शतसहस्र महाभारत इन दो सोपानों का महाभारत में ही उल्लेख मिलता है। प्रायः समस्त विद्वानों की सम्मति से रामायण का रचनाकाल भारत तथा महाभारत के बीच मे माना जाता है। शाङ्ख्यायन आदि सूत्रों तथा पाणिनि की अष्टाध्यायी में भारत के विषय में निर्देश मिलते हैं, रामायण के विषय में नहीं। अतः ऐसा प्रतीत होता हैं कि भारत की रचना रामायण पूर्व हो चुकी थी। यह निर्विवाद है कि भारत तथा रामायण स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न हुए हैं, भारत पश्चिम में तथा रामायण पूर्व में। दोनों के सम्पर्क के पश्चात् भारत ने महाभारत का रूप धारण कर लिया है। आधुनिक विद्वानों के मतानुसार भारत और महाभारत के मध्य में ही रामायण का निर्माण हुआ है। वस्तुतः यह मत सर्वथा असङ्गत तथा रामायण और महाभारत दोनों से ही विरुद्ध है।

then space then "हेगेन" (Copenhagen = Kopenhagen).

Line 31: "भारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' में लिखा है कि महाभारत का मूल कोई पौराणिक गाथा रही होगी ।"

Line 32: "उसकी एकता से उसका रचयिता कोई एक ही व्यक्ति रहा होगा । उसमें परस्परविरोधी सिद्धान्त, पुनरुक्ति और बिना"

Line 33: "प्रसङ्ग की बातें नहीं आनी चाहिये । अतः ऐसे अंशों को प्रक्षिप्त ही मानना चाहिए । इस कसौटी पर उन्हें सात-आठ"

Line 34: "हजार श्लोकों से अधिक नहीं मिले जिनको उपलब्ध महाभारत का मूल कहा जा सके ।"

Let's do a final review of each line against the image: Top header: ८५२ रामायणमीमांसा द्वाविंश

Heading: महाभारत और पाश्चात्य विद्वान्

Text: महाभारत के आलोचनात्मक अध्ययन की ओर सर्वप्रथम क्रिश्चियन लासेन का ध्यान गया । सन् १८३७ Wait, let's look at the year again in : Is it १७७३ or १८३७? Look at: First digit: १ Second digit: look at ८ in १८४२ (L5) vs this digit. Wait, let's compare: In L5: १८४२ -> the second digit has a top loop, bottom loop. In L8: १८८४ -> the second and third digits are clearly ८. In L8: