रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 928, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंश अध्याय रामायण आदि का रचना-काल कहा जाता है कि ईसा से एक शताब्दी पूर्व रामायण महाकाव्य पहले पहल पाश्चात्य देशों में विख्यात होने लगा था। उस समय अनेक लोगों का मत था कि इसकी रचना अत्यन्त प्राचीन काल में हुई थी। ए० श्लेगल के अनुसार ११ शती ई० पू० तथा जी० गोरेसियों के अनुसार लगभग १२ शती ई० पू० । इस मत के प्रतिक्रिया- स्वरूप जी० टी व्हीलर तथा डाक्टर वेबर ने रामायण पर यूनानी तथा बौद्ध प्रभाव मानकर उसकी रचना अपेक्षा कृत नवीन समझी है। इन दोनों मतों का खण्डन रामकथा के द्वितीय भाग में श्रीबुल्के ने किया है। आगे चलकर रामायण के रचना-काल के विषय में लिखते हुए विद्वान् प्रायः आदिरामायण तथा प्रचलित बाल्मीकिरामायण का अलग-अलग रचना-काल मानते हैं। एम्० विंटरनित्स इस प्रश्न का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद एच्० याकोबी के परिणाम पर पहुँचते हैं। एच्० याकोबी पहली अथवा दूसरी शताब्दी ई० को प्रचलित रामायण का रचना-काल मानते हैं। एम्० विंटरनित्स दूसरी शती ई० अधिक समीचीन समझते हैं। सी० वी० वैद्य इसका काल दूसरी शती ई० पू० तथा दूसरी श० ई० के बीच में मानते हैं। यद्यपि वह पहली शती ई० पू० अधिक सम्भव समझते हैं। कालिदास के समय में रामायण ने अपना प्रचलित रूप धारण कर लिया था तथा भारत के आरण्यक पर्व के रचना-काल में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की कुछ सामग्री प्रचलित हो गयी थी, अतः अधिक सम्भव है कि प्रचलित-रामायण का रूप दूसरी शती ई० के बाद का नहीं है। प्रामाणिक वाल्मीकिकृत रामायण में बौद्ध धर्म की ओर निर्देश नहीं है, अतः इसकी रचना बुद्ध के पूर्व ही अथवा पाँचवीं शती ई० पू० में हुई होगी, यह एम्० मोनियर विलियम्स तथा सी० वी० वैद्य का प्रधान तर्क प्रतीत होता है। डा० याकोबी रामायण का रचना-काल पाँचवीं शती ई० पू० से छठी और आठवीं शती ई० पू० के बीच में मानते हैं। ए० ए० मैकडोनेल भी याकोबी के तर्क दुहराकर रामायण की उत्पत्ति बौद्ध धर्म से पूर्व मानते हैं। ए० बो० कीथ डा० याकोबी के ग्रन्थ के बीस वर्ष बाद उनके तर्कों का विस्तृत विश्लेषण तथा खण्डन करके रामायण की रचना चौथी शती ई० पू० में रखते हैं। श्रीबुल्के महाभारत और रामायण शीर्षक में कहते हैं कि रामायण में महाभारत के वीरों का निर्देश नहीं मिलता दूसरी ओर महाभारत में न केवल रामकथा का वरन् वाल्मीकिकृत रामायण का भी उल्लेख है इससे स्पष्ट है कि रामायण की रचना के पश्चात् महाभारत को अपना वर्तमान रूप मिला हो। फिर भी बहुत सम्भव है कि भारत (अर्थात् महाभारत का प्राचीन रूप) रामायण के पूर्व उत्पन्न हुआ हो। चतुर्विंशतिसाहस्री भारतसंहिता तथा शतसहस्र महाभारत इन दो सोपानों का महाभारत में ही उल्लेख मिलता है। प्रायः समस्त विद्वानों की सम्मति से रामायण का रचनाकाल भारत तथा महाभारत के बीच मे माना जाता है। शाङ्ख्यायन आदि सूत्रों तथा पाणिनि की अष्टाध्यायी में भारत के विषय में निर्देश मिलते हैं, रामायण के विषय में नहीं। अतः ऐसा प्रतीत होता हैं कि भारत की रचना रामायण पूर्व हो चुकी थी। यह निर्विवाद है कि भारत तथा रामायण स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न हुए हैं, भारत पश्चिम में तथा रामायण पूर्व में। दोनों के सम्पर्क के पश्चात् भारत ने महाभारत का रूप धारण कर लिया है। आधुनिक विद्वानों के मतानुसार भारत और महाभारत के मध्य में ही रामायण का निर्माण हुआ है। वस्तुतः यह मत सर्वथा असङ्गत तथा रामायण और महाभारत दोनों से ही विरुद्ध है।