रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
जैसे भरत के प्रति किसी प्रकार के कौटिल्य की कल्पना पाप का परिणाम है, वैसे ही महाराज दशरथ के दिव्य गुणों में कालिमा की कल्पना अपने हृदय की ही कालिमा को प्रकट करना है। श्रीतुलसी तो वन्दना में ही कहते हैं कि— “बन्दहुँ अवध भुवाल सत्यप्रेम जेहि रामपर। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तन तृण इव परिहरेउ ॥” (रा० मा० १।१६) हाँ, तो श्रीदशरथजी के वचन को शराबी के वचन से उपमा देना या उस भङ्गड़ की उपमा देना जो कहता है कि हमें स्मशान ले चलो या उन्हें काम, क्रोध, लोभ या ममता के आवेश का उन्मादी कहना वसिष्ठ, भरद्वाज, राम, भरत और तुलसी सबका ही अपमान करना है। महाराज दशरथ का कैकेयी से प्रेम था। परन्तु वह अनुचित नहीं है। अपनी विवाहिता पत्नी में प्रेम कथमपि अनुचित नहीं कहा जा सकता। जिस क्षण उन्होंने कैकेयी का श्रीराम के विरुद्ध भाव देखा एकदम कैकेयी से उदासीन हो गये। कामी व्यक्ति तो राज्य, धन, पुत्र सबको ही त्यागकर कामिनी पर ही मुग्ध रहता है। परन्तु महाराज ने कैकेयी को समझाकर देख लिया कि यह असाध्य व्याधि है। तब महाराज ने यही कहा कि— “चहत न भरत भूपतहि भोरे। बिधिबस कुमति बसी उर तोरे ॥ सो सब मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहि बिधि बामू ॥ सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुनधाम राम प्रभुताई ॥ करिहहि भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँपुर राम बड़ाई ॥ तोर कलंक मोर पछिताऊ। मुयेहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुँह गोई ॥ फिर पछितैहसि अन्त अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी ॥” (रा० मा० २।३५।१-४) यह कहना ही अनभिज्ञता ही है कि “पहले दशरथ ने कहा था कि ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है। परन्तु अब जब आज भरत से राज्य लेने के लिए कहा जाता है तब धर्म परिवर्तित रूप से उसके पक्ष में समर्थन दे देता है।” क्योंकि लेखक उत्सर्ग और अपवाद के सिद्धान्त से अपरिचित ही प्रतीत होता है। सामान्य नियम सर्वत्र प्रसिद्ध है। हरि इ इस स्थिति में सामान्य शास्त्र “इको यणचि” (पा० सू० ६।१।७७) के अनुसार यण् प्राप्त होता है। परन्तु उससे प्रबल “अकः सवर्णे दीर्घः” (पा० सू० ६।१।१०१) के अनुसार यण् न होकर दीर्घ ही होता है। सामान्यतया सदा सन्ध्या करने का विधान है। परन्तु सूतक-पातक में उसका संकोच भी होता है। उसी तरह सामान्यतया ज्येष्ठ पुत्र को राज्य देना उचित ही था। वही वसिष्ठसम्मति के अनुसार महाराज करने जा रहे थे। परन्तु अब जब पूर्वदत्तवरा भरतमाता महारानी कैकेयी ने नयी परिस्थिति पैदा कर दी तो अब विशेष स्थिति में पूर्वधर्म की अपेक्षा प्रबल धर्म यही है कि भरत को राज्य दिया जाय। पूर्वोक्त वैदिक वचनों और श्रीभागवत के अनुसार जब राजा यज्ञों में अपना राज्य ब्राह्मणों में प्रदान कर सकता है और श्रीराम ने भी वैसा ही किया था। तब राजा को सुतरां कनिष्ठ पुत्र को राज्य देने का अधिकार तो है ही तो भी यहाँ किसी राग और द्वेष के वशीभूत होकर नहीं, किन्तु सत्य की रक्षा के लिए कैकेयी की माँग को पूर्ण करना ही इस समय का सबसे बड़ा धर्म है। महाराज ने यह सब अपनी इच्छा के विरुद्ध शुद्ध धर्म-पालन के लिए ही अपने प्रिय प्राणों का बलिदान कर के भी किया था। तभी वसिष्ठ और भरद्वाज दोनों ही उस समय के प्रख्यात महर्षियों ने उसका समर्थन किया।
“विदित वेदसम्मत सब ही का। जेहि पित देई सो पावइ टीका॥” (वसिष्ठ) “लोक वेद सम्मत सब कहई। जेहि पित देइ राज सो लहई॥” (भरद्वाज) अतः इन महर्षियों के वचनों के सामने किसी के दुस्तर्क का कोई महत्त्व ही नहीं है। यह भी कहना गलत है कि “यद्यपि गुरु वसिष्ठ यह जानते हैं कि लोभग्रस्त कैकेयी ने महाराज श्रीदशरथ से दबाव डालकर ही राम के वनगमन की आज्ञा प्राप्त की है। फिर भी उसे आज्ञा-पालन का धर्म कहकर श्रीभरत से उसे मान लेने की आज्ञा दी जा रही है। यदि धर्म स्वार्थसमर्थन में ही प्रयुक्त किया जाने लगे तब उसके द्वारा लोकसंरक्षण का प्रश्न ही कहाँ उठता है।” क्योंकि भले ही माँ कैकेयी लोभग्रस्त रही होंगी। परन्तु महाराज तो लोभग्रस्त नहीं थे। यदि कैकेयी को पूर्व में वरदान न दिया होता तो क्या महाराज किसी तरह कैकेयी के दबाव से प्रभावित होते ? पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि महाराज सत्य के रक्षार्थ ही यह निर्णय लेने के लिए बाध्य हुए थे। उनके मन पर किसी भी काम, क्रोध, लोभ तथा ममता का प्रभाव या आवेश नहीं था। महाराज के लिए तथा महर्षि वसिष्ठ के लिए स्वार्थ का तो कोई प्रसङ्ग ही नहीं था। अतः शुद्ध धर्म की दृष्टि से ही महाराज ने राम को वनगमन और भरत को राज्य देने का निर्णय लिया था। “श्रीराम गुरु वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र की परम्परावाले तर्क को वस्तु धर्म के रूप में मन से नहीं स्वीकार कर पाये। इसी लिए उन्होंने उसके औचित्य पर सन्देह प्रकट करते हुए सोचा था— “जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपवीत विवाहा। संग संग सब भये उछाहा॥ विमल वंश यह अनुचित एकू। बन्धु विहाइ बड़ेहि अभिषेकु॥” (रा० मा० २।९।३,४) यह कहना भी अनभिज्ञता ही है, क्योंकि राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं हैं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करते हों। आश्चर्य है कि मानस के ही पण्डित मानस की ही बात नहीं समझ पाते हैं। यद्यपि वसिष्ठ ने ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई चर्चा नहीं की थी। “श्रवन समीप भये सित केसा। मनहुँ चौथपन अस उपदेसा॥ नृप जुवराम राम कहँ देहू। जावन जन्म लाहु किन लेहू॥” (रा० मा० २।१।४) इस तरह वृद्धावस्था देखकर उससे ही महाराज दशरथ के मन में श्रीराम के यौवराज्य का विचार उठा था। “यह बिचार उर आनि नृप उचित सुअवसर पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरुहिं सुनायउ जाइ॥” (रा० मा० २।२) गुरुदेव ने उसी का अनुमोदन किया था। महाराज ने फिर मन्त्रियों एवं पुरजनों की सम्मति लेकर मुनि को राम के भवन में विधि-विधान सिखाने के लिए भेजा— “तब नरनाहु वसिष्ठ बुलाये। रामधाम सिख देन पठाये॥” (रा० मा० २।८।१) वहाँ भी वसिष्ठ ने अपनी तरफ से ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई बात नहीं कही थी। किन्तु यही कहा था कि राजा ने आपके यौवराज्याभिषेक का आयोजन किया है। तदर्थ आपको आवश्यक संयम-नियम का पालन करना चाहिये— “भूप सजेउ अभिषेकसमाजू। चाहत देन तुमहिं युवराजू॥” (रा० मा० २।९।१)
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८१५ श्रीराम स्वयं भी यह नहीं कहते हैं कि गुरुदेव ने या पिताश्री ने यह अनुचित किया है अपितु वे कहते हैं कि हम सब भाइयों का जन्म, भोजन, शयन, खेल, उपवीत संस्कार, विवाह आदि सब साथ साथ हुआ अब अभिषेक केवल मेरा ही हो यह एक बात इस विमलवंश सूर्यवंश की अच्छी नहीं लगती। परन्तु तुलसी और उनके राम तो मर्यादापालक हैं। उस मर्यादा में तो वंशपरम्परा की बातों का परम आदर होता है। मनु ने भी श्रुति और स्मृति के साथ सदाचार को भी धर्म में प्रमाण माना है— “वेदः स्मृतिः सदाचारः ।” (मनु० २।१२) भगवान् भी गीता में— “उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ।” (गीता १।४३) जातिधर्म और कुलधर्म की रक्षा को आवश्यक मानते हैं। फिर सूर्यवंश की परम्परा की किसी बात को राम अनुचित कैसे कह सकते हैं ? इसी बात का समाधान करते हुए गोस्वामीजी भी कहते हैं— 'प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगतमन की कुटिलाई ।। (रा० मा० २।९।३) अर्थात् यह प्रभु का पछताना स्वाभाविक प्रेम की परिणतिमात्र है। इससे यह सप्रेम पछताना भक्तों के मन की कुटिलता का ही हरण करता है। विमल वंश की असूया में उसका तात्पर्य नहीं है। उक्त बात केवल सूर्यवंश में ही नहीं, किन्तु चन्द्रवंश में भी है और यौक्तिक भी है। राज्य के बँटवारे से व्यवस्था नहीं चल सकती। बारी-बारी सभी भाई राजा हों यह भी बात नहीं चल सकती। हाँ, मन्त्री आदि के रूप में तो भाइयों का सम्मान होता ही है। किसी क्षेत्र में अन्य भाई भी राजा हो सकते ही हैं। जैसा कि श्रीराम ने शत्रुघ्न को मथुरा का शासक बनवाया था और भरत तथा लक्ष्मण के पुत्रों को भी विभिन्न क्षेत्रों में राजा बनाया था। मनु के अनुसार सम्पूर्ण पित्र्य धन को ज्येष्ठ पुत्र ही ग्रहण करता है। शेष सभी भाइयों को पिता के समान ही ज्येष्ठ बन्धु का ही अनुवर्तन करना चाहिये। मन्थरा ने भी कहा था कि राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं होते। यदि सभी राजा हों तो महान् अन्याय एवं अव्यवस्था होगी। अतः राजा लोग शासन-व्यवस्था ज्येष्ठ पुत्र में ही स्थापित करते हैं। हाँ, कभी ज्येष्ठ के अयोग्य होने से गुणवान् कनिष्ठ पुत्रों के अधीन भी राज्यव्यवस्था स्थापित हो सकती है। फिर भी राज्य के अनेक शासक नहीं हो सकते; वैसा होने पर अव्यवस्था से महान् अन्याय हो सकता है— “नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि । स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत् ॥ तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः । स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि ।।” (वा० रा० २।८।२३, २४) इस प्रकार मनु और वाल्मीकिरामायण के अनुसार स्वाभाविकरूप से ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है। परन्तु विशेष अवस्था में गुणवान् कनिष्ठ राजपुत्र भी राज्य का अधिकारी हो सकता है। परन्तु राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं होते। इस तरह शास्त्रसम्मत सिद्धान्त का अपलाप मिथ्या दुस्तर्कों से नहीं हो सकता। श्रीभरत ने किसी भी धर्म-व्याख्या के प्रति अपनी असहमति प्रकट नहीं की। पहले हम कह चुके हैं कि महाराज दशरथ अथवा श्रीवसिष्ठ किसी ने भरत को आज्ञा के रूप में राजा होने को कहा ही नहीं। किन्तु कैकेयी के लिए जो दो वर प्रदान किये थे। उसी दृष्टि से वसिष्ठ ने भरत को राजा होने को कहा था। भरद्वाज ने भी
८१६ रामायणमीमांसा एकविंश उसी दृष्टि से कहा था कि यदि तुम राज्य करते तो भी कोई दोष नहीं था। वैसा सुनकर राम को सन्तोष ही होता। परन्तु अब तुमने और अच्छा किया जो श्रीराम को ही राजा बने रहने के लिए तुम राम से आग्रह करने जा रहे हो— करतेहुँ राज तुम्हहि नहिं दोषू। रामहि सुनतः होत संतोषू ॥” (रा० मा० २।२०५।४) “अब अति कीन्हेउ भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु । सकल सुमंगल मूल जग रघुपतिचरन सनेहु ॥” (रा० मा० २।२०६) श्रीवसिष्ठजी ने भी महाराज का वरदान और कैकेयी की इच्छा के अनुसार कौशल्या आदि माताओं तथा प्रजा के शान्ति और सन्तोषार्थ भरत के राज करने को लोकवेद-सम्मत कहा था। उनका राज करना अनुचित नहीं है— “सुनि सुख लहब राम बैदेही । अनुचित कहब न पंडित केही ॥” (रा० मा० २।१७३।३) राज्य करना सर्वसाधारण के लिए रागतः प्राप्त होता है। उसकी विधि अपेक्षित नहीं होती है। क्योंकि विधि तो अत्यन्त अप्राप्त की होती है, “विधिरत्यन्तमप्राप्तौ”—अतः प्राप्त राज्य त्याग देने में भी कोई दोष होने की संभावना नहीं होती है। अतः भरत के राज्य न करने से भरत पर किसी दोष की संभावना भी नहीं । आज्ञा और विधियों में रागतः अप्राप्त कर्मों का ही विधान होता है। राज्य त्यागकर वन जाने की आज्ञा ही मुख्य आज्ञा है, क्योंकि वह रागतः प्राप्त नहीं है। उसी का गुणगान किया जाता है। भरतजी राज्य करते तो दोष न होने पर भी उसका कोई बड़ा महत्त्व नहीं था। महत्त्व तो भरत के त्याग का ही है। “श्रीभरत धर्म को नया अर्थ प्रदान करते हैं। उनका सिद्धान्त यह है कि यदि राज्य के वास्तविक स्वामी महाराज दशरथ हों तो उन्हें ऐसा अधिकार हो सकता था। पर यह राज्य उन्हें क्रमशः उत्तराधिकार में मिला था। अतः राज्य के मूल स्वामी का अन्वेषण किया जाना चाहिये और अन्त में यह निष्कर्ष निकलेगा कि संसार में सम्पत्ति और राज्य के एकमात्र स्वामी भगवान् राम ही हैं— “संपति सब रघुपति कै आही ।” (रा० मा० २।१८४।२ ) इस तरह की मान्यता से धर्म भक्तिपरक हो जाता है। धर्म और अधिकार जब तक व्यक्तिपरक होंगे तब तक स्वार्थ और संघर्ष की भावनाएँ बनी रहेंगी। व्यक्ति कितना भी भला क्यों न हो भय, प्रलोभन और वासना की वृत्तियाँ उसमें परिवर्तन ला ही सकती हैं। अतः धर्म का केन्द्र अधिकार के स्थान पर सेवा और व्यक्ति के स्थान पर प्रभु को ही होना चाहिये ।” किन्तु उक्त कथन सर्वथा लोक, वेद तथा तर्क के विरुद्ध है। धर्म का नया अर्थ किसी को भी मान्य नहीं होता। धर्म में तर्क का भी कोई आदर नहीं होता। भगवान् राम, भगवान् कृष्ण, वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज कोई भी धर्म के निर्माता नहीं हो सकते। धर्म किसी का सिद्धान्त नहीं है। जब श्रीराम धर्म की व्यवस्था नहीं बना सकते तो भरत तो वैसा साहस कभी कर ही नहीं सकते। व्यक्ति में भ्रम, प्रमाद, करणापाटव तथा विप्रलिप्सा हो सकती है। अतः किसी भी जीव या ईश्वर द्वारा निर्मित ग्रन्थ धर्म में प्रमाण नहीं है। ईश्वर में भी छलछद्म सम्भव होता है। मोहिनीरूपधारी भगवान् ने भी छल किया था। श्रीविष्णु ने भी छल किया था— “छल करि टारेउ तासु व्रत प्रभु सुरकाज कीन्ह ।”
भले ही वह छल संसार के हित में ही हो, परन्तु है तो छल ही । इसी दृष्टि से किसी ऋषि, आप्त या ईश्वर का वही वचन धर्म में प्रमाण है जो वेदसंमत एवं वेद के अविरुद्ध हो। इसलिए वेद को भगवान् का निःश्वासरूप माना जाता है—"अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यद्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणम् ।” श्वास अकृत्रिम पुरुषबुद्धि-प्रयत्नानपेक्ष होते हैं । अतः वेद के निर्माण में जीव की कौन कहे ईश्वर की भी बुद्धि और प्रयत्न नहीं खर्च होता । इसलिए वेद अपौरुषेय अपास्तसमस्तपुंदोष होने से निर्विवाद प्रमाण होते हैं । इसी लिए भगवान् राम, कृष्ण, शिव, व्यास, वसिष्ठ, वाल्मीकि, तुलसी सभी वेदों की ही दुहाई पद पद पर देते हैं । अतः धर्म को नया रूप या नया अर्थ कोई भी नहीं प्रदान कर सकता है । यह तुलसी को कदापि मान्य नहीं है । उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं राज्य उपयोग के लिए ही होता है । यथेष्ट विनियोग-क्षमता ही स्वत्व होता है । अतः परम्पराप्राप्त राज्य का भी दान किया ही जा सकता है । भगवान् की गीता भी धर्म में शास्त्र को ही प्रमाण मानती है—"तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते” राज्य ही क्या सम्पूर्ण प्रपञ्च का मूल स्वामी परमेश्वर है । यह भरत का कोई नया मत नहीं है । “सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः” इत्यादि श्रुतियों से ही सिद्ध है । परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि कोई अपनी वस्तु का दान, व्यय, वितरण नहीं कर सकता, क्योंकि जैसे भूमिका मूल स्वामी राजा के होने पर भी अवान्तर स्वामी जमीन्दार, जागीरदार और काश्तकार भी होते ही हैं । वे भी अपनी भूमिसम्पत्ति का दान, वितरण या विक्रय कर ही सकते हैं । इसी तरह समस्त विश्व का मूल स्वामी परमेश्वर के होने पर भी भिन्न-भिन्न राजा भी अपनी अपनी सम्पत्तियों के मालिक होते ही हैं । तभी पृथिवी के दान, विक्रय आदि की व्यवस्था होती है । यदि यह स्थिति न मानी जायगी तब तो भू-दान का शास्त्रोक्त विधान ही बाधित हो जायगा । अतएव यदि सम्पत्ति किसी की हो ही नहीं सब ईश्वर की ही है । तब फिर सर्वस्वदान, भूमिदान, स्वर्ण- दान, रत्नदान, अन्नदान आदि की व्यवस्था कैसे बनेगी ? यदि सब संपत्ति ईश्वर की है किसी व्यक्ति की नहीं हो तब तो चोर को दण्ड भी क्यों हो, क्योंकि सभी संपत्ति ईश्वर की है तो चोर ने ईश्वर की संपत्ति ली है फिर उसे ही दण्ड क्यों ? ईश्वर की संपत्ति रखने पर भी यदि दण्ड हो तब तो जिसके पास थी उसे भी दण्ड मिलना चाहिये । “यदन्यद् ब्राह्मणस्य वित्तात् सभूमि सपुरुषं प्राची दिग्घोतुर्दक्षिणा ब्रह्मणः प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्- गातुः ।” (शत०ब्रा० १३।७।१।१३) में राजा ब्राह्मण का वित्त छोड़कर सभूमि सपुरुष राष्ट्र के मध्य से प्राची, दक्षिणा, प्रतीची और उदीची दिशाओं का होता, ब्रह्मा, अध्वर्यु एवं उद्गाता के लिए दक्षिणा के रूप में प्रदान करता है । महाराज दशरथ ने भी अश्वमेधयज्ञ में अपनी भूमि का दान किया था— “प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः । अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम् ॥ उद्गात्रे तु तथोदीचीं दक्षिणेषा विनिर्मिता । अश्वमेधमहायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा ॥ क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः । ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरा तां कुलवर्धनः ॥” ( वा० रा० १।१४।४३-४५) “ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकल्बिषम् । भवानेव महीं कृत्स्नामेकां रक्षितुमर्हति ॥ न भूम्याः कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने । रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप ॥
८१८ रामायणमीमांसा एकविंश निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति । गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः । दशकोटि सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम् ॥ ५१ ॥” यदि सारी सम्पत्ति ईश्वर की है तो इस प्रकार के दान कैसे सम्भव हो सकते ? श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था। वह श्रीमद्भागवत से प्रमाणित ही है। अतः भरत कभी भी ऐसा शास्त्रविरुद्ध सिद्धान्त स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं। यह कहा जा चुका है कि श्रीवसिष्ठ ने कैकेयी के वर की दृष्टि से ही भरत को राजा होने की बात कही थी । महाराज के वैसा न करने पर उनके सत्य धर्म का नाश हो सकता था । परन्तु भरत उसे न स्वीकार करें तो इससे किसी के भी धर्म-नाश की सम्भावना नहीं । वरदान देनेवाला यदि वरदान से मुकरता है तो उसका सत्य-भङ्ग होता है। पर यदि कोई भी प्रतिग्रहीता वचनबद्ध नहीं है तो वह प्रतिग्रह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता । राज्य स्वीकार कर लेने पर ही वशिष्ठजी की यह सलाह थी कि जब राम १४ वर्ष के बाद लौटकर आयें तब राम को राज्य पुनः प्रदान कर के उनकी सेवा करना । जब उन्होंने राज्य स्वीकार ही नहीं किया तो दूसरे परामर्श का प्रश्न ही नहीं उठता । यह कहना भी गलत है कि “गुरु वसिष्ठ का विचार यह था कि महाराज दशरथ से राज्य पाने के बाद तुम्हें यह अधिकार होगा कि १४ वर्ष के बाद राम को राज्य दे सको । इस तरह पिता की आज्ञा का पालन और राम को राजा बनाने की तुम्हारी आकाङ्क्षा पूरी हो जायगी । किन्तु श्रीभरत की दृष्टि में यह धृष्टता की पराकाष्ठा थी । वे स्वयं राज्य के स्वामी बनकर भगवान् राम को राज्य दान करने की चेष्टा करे क्यों ?” पर यह ठीक नहीं क्योंकि यह तो प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि किसी तरह भी प्राप्त निज वस्तु को भगवान् के अर्पण करके भगवान् को ही उसका स्वामी बना दे । इसमें किञ्चिन्मात्र भी धृष्टता का प्रश्न ही नहीं उठता है । भगवान् गीता में कहते हैं— “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्करिष्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥” ( गीता ९।२७ ) “कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥” (भाग० ११।२।३६) आप भी मानते हैं । सब सम्पत्ति भगवान् की ही है । यदि भगवान् को उसका अर्पण करना धृष्टता है तो भगवद्वचन की क्या गति होगी । अपनी सब वस्तुओं को राम की बना देना ही रामराज्य है। “त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।” यह भी कहना गलत है कि “चित्रकूट की यात्रा का तात्पर्य था भगवान् राम से यह स्वीकार करा लेना कि वे अयोध्या के वास्तविक स्वामी है ।”
अध्यायै रामचरितसम्बन्धी लेख ८१९ भगवान् राम वैसी धर्मविरुद्ध बात कभी स्वीकार कर ही नहीं सकते थे । उन्होंने स्पष्ट ही चौदह वर्ष तक राज्य के स्वामित्व को स्वीकार करने से इनकार ही किया था । जब भरत की दृष्टि से राम सकल विश्व के ही वास्तविक स्वामी थे तो अयोध्या के भी स्वामी थे ही । फिर उन्हें अयोध्या का स्वामी बनने के लिए आग्रह करना क्या धृष्टता की पराकाष्ठा नहीं थी । यह भी कहना गलत हैं कि “प्रभु से पादुका प्राप्त करने के पश्चात् वे प्रसन्न हो गये । उन्होंने उसका अर्थ यही लिया कि पादुका तो पद के लिए ही दी जाती है । प्रभु ने पादुका देकर अयोध्या का राज्यपद स्वीकार कर लिया । इसी लिए भरत ने पादुकाओं को अयोध्या में ले जाकर सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया और उसके पश्चात् एक सेवक के रूप में वे राज्यसञ्चालन करते रहे ।” भरत जैसे निष्छल निष्कपट पुरुष में ऐसे छल की कल्पना करना ही धृष्टता की परा काष्ठा है । आज किसी व्यक्ति ने किसी वस्तु के न लेने का दृढ़ निश्चय कर रखा हो उसे स्पष्टरूप से बिना बताये छल से उसको उसका प्रतिग्राही मान लेना छल भी है और धृष्टता भी है । यह भी कहना गलत है कि “गुरु वसिष्ठ स्मृतिमूलक धर्म के व्याख्याता थे । वहीं दूसरी ओर श्रीभरत प्रेमपरक धर्म के व्याख्याता थे । उनकी दृष्टि में जब तक जीव स्वयं दैन्यग्रस्त है तब तक उनसे यह आशा करना कि वह समाज में सुख और शान्ति का प्रसार करेगा मृगतृष्णामात्र है ।” वस्तुतः स्मृति कोई स्वतन्त्र प्रमाण ही नहीं है । वह तो श्रुतिमूलक ही है । इसी लिए किसी भी स्मृति- वचन का प्रामाण्य ‘इयं स्मृतिः श्रुतिमूलिका, स्मृतित्वात्, मनुस्मृतिवत्’ इस प्रकार श्रुतिमूलकता के आधार पर ही स्मृति प्रमाण होती है । जो स्मृति श्रुति से विरुद्ध होती है वह प्रमाण नहीं होती । स्मृति श्रुति के अनुगुण होने पर ही प्रमाण होती है । प्रेमपरक धर्म भी कोई स्वतन्त्र धर्म नहीं है । धर्म तो एकमात्र वेदशास्त्रमूलक ही है वही धर्म भगवच्चरण- पङ्कजसमर्पणबुद्धि से अनुष्ठीयमान होकर प्रेमपरक हो जाता है । फिर कथावाचकजी के अनुसार वेश्यापरक प्रेम भी धर्म हो जायगा । यह कहना अत्यन्त असंगत है कि “जिसमें वासना और स्वार्थ होगा वह लाखों उपदेश करने पर भी अवश्य अधर्म करेगा । जिसमें स्वार्थ और वासना का अभाव है उसके द्वारा शास्त्र देखकर धर्मपालन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्लोंकि शास्त्र तो साधक के लिए होते हैं सिद्धों के लिए नहीं; क्योंकि सिद्ध तो कृतार्थ ही होता है । जिसने नाव का सहारा लेकर नदी पार कर ली उसके लिए फिर नाव का आश्रयण आवश्यक नहीं है ।” ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से ही मूलाज्ञान की निवृत्ति और वासनाक्षय होता है । जिसने अहन्ता को बाधित कर दिया उसमें अहन्तामूलक स्वार्थ भी नहीं होते । भरत आदि तो भगवान् के ही स्वरूप हैं । उनका धर्मानुसरण तो उसी तरह लोकसंग्रहार्थ है जैसे श्रीराम का । किन्तु सामान्यतया मनुष्य वासना और स्वार्थ से रहित नहीं होते हैं । उन्हीं के उद्धार के लिए शास्त्रों का प्रयास होता है । श्रीमद्भागवत में एकादशस्कन्ध में श्रीभगवान् ने कहा है कि जैसे माता कटु गिलोय पिलाने के लिए बालक को मोदक का प्रलोभन देती है । बालक मोदक पाने के लोभ से गिलोय पी लेता है । माता मोदक देती है । बालक समझता है कि गिलोय पीने का फल मोदक-प्राप्ति है । परन्तु माता समझती है उसका फल है रोगनिवृत्ति । ठीक इसी तरह स्वर्ग, पशु, पुत्र, धनादि का प्रलोभन देकर श्रुति जीव को विविध धर्मों के अनुष्ठान में लगाती है । जीव को उनके अनुष्ठानों से विविध फल भी मिलते हैं और जीव उन्हें उन कर्मों का वही फल समझता है । परन्तु श्रुति तो स्वाभाविक पाशविक काम-कर्म और ज्ञान की निवृत्ति के लिए ही वैदिक काम, कर्म
८२० रामायणमीमांसा एकविंश और ज्ञान की ओर उसे प्रवृत्त करती है। जैसे काँटों से काँटा निकलता है वैसे ही वैदिक काम, कर्म और ज्ञान से ही पाशविक काम, कर्म और ज्ञान की निवृत्ति होती है। “वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यसिद्धिं लभते रोचनार्था फलश्रुतिः ॥” (भाग० ११।३।४६) प्राणी वेदोक्त कर्मों को भगवदाराधनबुद्धि से निःसंग होकर करता हुआ सर्वकर्मनिवृत्तिमूलक ब्रह्मात्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है। विविध फलों की श्रुति तो केवल कर्मों में रुचि उत्पन्न करने के लिए ही है। उधर प्रवृत्ति करने के लिए अर्थवादों के द्वारा उन कर्मों की प्रशंसा और महत्त्व का वर्णन किया जाता है। उनके प्रभाव से और फल के लोभ से प्राणियों की कर्मों में प्रवृत्ति होती ही है। विविध लाभों के लिए ही तो प्राणी लौकिक कठिन से कठिन कर्मों में प्रवृत्त होता ही है। विविध कठिन भाषाओं, कठिन साइन्स आदि की शिक्षाओं में प्राणी प्रवृत्त होता ही है। कर्मों में लगने से आलस्य, प्रमाद एवं निरर्थक चेष्टाओं से विरति होती ही है। ब्राह्ममुहूर्त में उठने से प्रातःकालिक भगवत्स्मरण, स्नान, सन्ध्या, जप, अग्निहोत्रादि का नियम पालन करने से दो घण्टे दिन तक सोते रहने, उठते ही चाय पीने, गप-शप लड़ाने आदि की आदतें छूटती हैं। यही वेद कहता है- "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।” प्राणी अविद्या (वैदिक काम, कर्म और ज्ञान) के द्वारा मृत्यु (पाशविक काम, कर्म और ज्ञान) का अतिक्रमण करके विद्या (उपासना) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त होता है। यद्यपि सभी ज्ञानवान् प्राणी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार काम करते हैं। उसमें किसी का कोई वश नहीं चलता है— “सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ (गीता ३।३३) परन्तु इस स्थिति में विधि-निषेधात्मक शास्त्र व्यर्थ होते हैं। जब सब अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ही काम करेंगे तब फिर कोई किस प्रकार दुष्कर्म से बचकर स्वधर्म में प्रवृत्त हो सकेगा। फिर तो पापप्रकृतिवाला पुरुष अपनी प्रकृति के अनुसार पाप करेगा ही फिर उसकी निवृत्ति कैसे होगी ? इस तरह पुरुष के पुरुषार्थ के लिए कोई अवकाश ही नहीं रह जाता है। वासना और स्वार्थ के वशीभूत प्राणी पाप करेगा ही। तब परमेश्वर वेदादि शास्त्र पुरुषार्थ के लिए क्यों आविर्भूत करते हैं। इन्हीं सब शङ्काओं का उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं— “इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥” (गीता ३।३४) इन्द्रिय के इन्द्रियार्थ में राग-द्वेष व्यवस्थित होते हैं। उनके वश में न होना ही पुरुषार्थ का मूल है। मृत्तिका घट के निर्माण का हेतु है तथापि जल उसका सहकारी कारण है। जैसे जलरूप सहकारी कारण के विघटन से मृत्तिका घट नहीं बना सकती है, उसी तरह राग-द्वेषरूप सहकारी कारणों के बिना प्रकृति भी स्वानुरूप कर्मों में प्राणी को नहीं प्रवृत्त कर सकती है। अतएव हिंसाप्रकृतिवाला सिंह भी अपने बच्चे की हिंसा में नहीं प्रवृत्त होता है, क्योंकि द्वेषरूप सहकारी कारण वहाँ नहीं है। चोरी की प्रकृतिवाला चोर भी उसी वस्तु को चुराता है जिसमें उसका राग होता है। जिन हीरा आदि बहुमूल्य रत्नों को वह नहीं पहचानता है, जिनमें राग नहीं है, उन्हें नहीं चुराता। रागास्पद सुवर्ण, रजतादि को चुराता है। तस्मात् सत्पुरुषों के समागम और सच्छास्त्रों का अभ्यास करके स्वाभाविक राग-द्वेषों को मिटाकर प्रकृतिपारतन्त्र्य मिटाया जा सकता है और पुरुषार्थ को अवकाश मिल सकता है। भगवत्कृपा तो सर्वत्र सर्वोपरि है
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२१ हो। फिर भी भगवान् सर्वत्र समान हैं। उनका किसी से द्वेष या राग नहीं है। किन्तु जो उन्हें भजते हैं। उन्हें भगवान् अनुगृहीत करते हैं— "यद्यपि सम नहि राग न रोषू। गहहिं न पाप पुन्य गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा०मा० २।२१७।२,३) यद्यपि सामान्यतया प्राणी अपने प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही उन-उन वातावरणों में उन-उन माता, पिता आदि से जन्म लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा तथा संस्कारों के अनुसार प्रवृत्त होता है। वैदिक आस्तिक सनातनी वातावरण में उत्पन्न प्राणी की वैसे माता-पिता और बन्धुओं के सङ्ग तथा शिक्षा संस्कारों से वैदिक शिक्षा, दीक्षा एवं संस्कारों के अनुसार वैदिक कर्मों में प्रवृत्ति होती है। तथापि जहाँ वैसी स्थिति में विकार आ जाता है वहाँ भी प्राणी जब निष्पक्ष हृदय से अपने हित तथा अहित का विचार करता है और सत्पुरुषों के समागम और शास्त्राभ्यास का महत्त्व समझता है तभी से प्रकृति से छुटकारा पाकर अभीष्ट पुरुषार्थ सम्पादनार्थ शास्त्रीय राग-द्वेष उत्पन्न करके पाशविक राग-द्वेष को मिटाकर अधर्म से बचने और कर्मानुष्ठान करने में प्रवृत्त होता है। उससे बुद्धि शुद्ध होने पर और सूक्ष्म विचार उत्पन्न होने पर कामनाओं से रहित भगवदाराधनबुद्धि से कर्मों का आचरण करता है। निष्काम कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान् की भक्ति से बुद्धि और भी पवित्र हो जाती है। तब श्रवण, मनन, निदिध्यासन, भगवद्भक्ति, तत्त्वज्ञान और शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। तभी समूल वासना एवं स्वार्थ का विनाश होता है। परन्तु उसके पहले भी शास्त्रों का उपदेश कारगर होता ही है। राम ने कैकेयी और महाराज के सम्मुख कहा था, तत्रभवान् परम पूज्य पिताश्री के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है, प्राणों का भी परित्याग कर के वह सब करने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ। पिताश्री की शुश्रूषा और उनकी वचनक्रिया, आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं। माँ कैकेयी से भगवान् ने कहा था, अत्रभवान् पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं विजन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ। माँ, यदि आप मेरे गुणों में विश्वास रखतीं तो इसके लिए राजा से कहने की क्या आवश्यकता थी। मैं तो आपकी आज्ञा से ही सब कुछ कर सकता था। हे देवि, मैं अर्थपरायण होकर लोक में नहीं रहना चाहता। मैं ऋषियों के तुल्य विमल धर्म का आश्रयण कर के स्थित हूँ, ऐसा समझकर आप आश्वस्त हों— "यत्तत्रभवतः किञ्चिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया। प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत् ॥ नह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम् । यथा पितरि शुश्रूषा तस्य च वचनक्रिया ॥ अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम् । वने यास्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश ॥ न नूनं मयि कैकेयि किञ्चिदाशंससे गुणान् । यद्राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती ॥" (वा० रा० २।१९।२१-२४) "नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे । विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम् ॥" ( वा० रा० २।१९।२० ) "पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः । अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत् ॥
दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति । वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः ॥ स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः । ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसंघैरनिन्दितः ॥ तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान् । रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः ॥ तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा । असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥ अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः । तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥ तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने । स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदिच्छेयं तदा वरम् ॥ गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना । अनभिज्ञो ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा ॥” (वा० रा० २।९।११-१८) “यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ । तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वाक्रमेदिति ॥” (वा० रा० २।९।२८) उपर्युक्त वचनों के अनुसार स्पष्ट प्रतीत होता है कि महाराज चक्रवर्तीजी कभी इन्द्र की सहायता के लिए देवासुर संग्राम में सम्मिलित होकर असुरों से युद्ध कर रहे थे । महाराज कैकेयी को साथ ले गये थे । वहाँ वैजयन्तपुर में महामायावी शम्बरासुर से युद्ध था । उस महान् संग्राम में राक्षस लोग प्रसुप्त पुरुषों को क्षत-विक्षत कर देते थे । उस भीषण युद्ध में असुरों ने महाराज को नानाविध प्रभावशाली शस्त्रास्त्रों से क्षत-विक्षत कर दिया था। उस समय महारानी कैकेयी ने स्वयं रथचालन कर महाराज की रक्षा की थी। उस प्रसन्नता में महाराज ने उन्हें दो वर माँगने को कहा था । महारानी ने कहा था कि जब मेरी इच्छा होगी तब इन वरों को माँग लूँगी । मन्थरा ने श्रीराम के यौवराज्याभिषेक-काल में महारानी को याद दिलाकर एक से श्रीराम को वनवास और दूसरे से श्रीभरत को राज्य प्रदान का वर माँगने को कहा था । श्रीराम ने भी चित्रकूट में श्रीभरत को बतलाया था कि— “देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः । संप्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः पुरा ॥” (वा० रा० २।१०७।४) श्रीराम भगवान् ने भरत को यह भी बतलाया था कि कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के साथ इसी शर्त पर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा । कौशल्या आदि किसी को पुत्र नहीं था, इसलिए महाराज ने भी वैसा स्वीकार कर लिया था— “पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्वहन् । मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्तमम् ॥” (वा० रा० २।१०७।३) “भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादि..म् । कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ क्षिप्रमेवाभिषेचनात् ॥ ऋणान्मोचय राजानं मत्कृतं भरत प्रभुम् । पितरं त्राहि धर्मज्ञ.... .... .... .... ॥” (वा० रा० २।१०७।९,१०)
श्रीराम ने कहा था कि हे धर्मज्ञ भरत ! इन अनेक कारणों से महाराज कैकेयी के इच्छानुसार तुम्हें राज्य देने के लिए बाध्य थे, अतः तुम राज्य स्वीकार कर के सत्यवादी पिताजी को ऋण से मुक्त करो । फिर आप कहते हैं कि "सेवक को जैसे सुरापायी स्वामी के आज्ञानुसार किसी का सिर नहीं तोड़ देना चाहिये, किन्तु स्वामी का नशा उतारने का प्रयास करना चाहिये । वैसे काम, क्रोध, लोभ एवं ममता के आवेश से उन्मादी महाराज दशरथ की आज्ञा न मानकर उनको उन दोषों से मुक्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ।" परन्तु आपका यह कहना ही उन्मत्त-प्रलाप है, क्योंकि श्रीराम ने तो वैसा नहीं किया । क्या उन्होंने अनुचित किया था ? क्यों श्रीराम धर्मज्ञ, विज्ञानवान्, प्रतिभावान् नहीं थे ? क्या वे कर्तव्याकर्तव्य के निर्धारण में सक्षम नहीं थे ? उल्टा वे तो आपके विपरीत कहते हैं कि महाराज दशरथ राजा हैं, गुरु हैं, पिता हैं, वृद्ध हैं वे चाहे क्रोध से, चाहे हर्ष से एवं चाहे काम से जो भी आज्ञा देते हैं धर्म की दृष्टि से कौन अनुशंसवृत्तिवाला पुत्र उसका पालन न करेगा— "गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात् ॥ यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः ॥" (वा०रा० २।२१।५९) श्रीराम ने कौशल्या और लक्ष्मण के सामने कहा था जीवलोक में धर्म, अर्थ, काम एवं अभीष्ट अभ्युदय की सिद्धि में जो भी अपेक्षित होते हैं वे सभी धर्म के पालन से वैसे ही वशीभूत हो जाते हैं, जैसे पुत्रसहित भार्या अपने पति के वश में रहती है । जिस धर्म में सब असंकीर्ण होकर रहते हैं उस धर्म का ही उपक्रम ( आरम्भ ) श्रेष्ठ है— "धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु । ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्यैव वश्याभिमता सपुत्रा ॥ यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात्तदुपक्रमेत ॥" (वा०रा० २।२१।५७, ५८) जाबालि भी श्रीराम को पिता के आज्ञा-पालन से विरत करने आये थे । उस समय राम ने कहा था लोक में सत्य ही ईश्वर है । सत्य में ही सब धर्म सदा आश्रित रहते हैं । अर्थात् बिना सत्य के अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम आदि कोई धर्म सम्पन्न नहीं होता है । क्योंकि सब में सत्य का पालन अनिवार्य है । अतएव संसार की सभी वस्तुएँ सत्यमूलक ही हैं । वे भी सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः सत्यपरायण होना उचित है । तस्मात् सत्य से उत्कृष्ट पद कुछ भी नहीं है । अतएव मैं पिता के निर्देश का पालन क्यों न करूँ । मैं किसी भी लोभ से, मोह से तथा अज्ञान् से सत्य के सेतु का भेदन नहीं कर सकता— "सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः । सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥ वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात्सत्यपरो भवेत् । सोऽहं पितुनिर्देशं तु किमर्थं नानुपालये ॥ नैव लोभान्न मोहाद्वा न चाज्ञानात्तमोन्वितः । सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्यप्रतिश्रवः ॥" (वा०रा० २।१०९।१३-१७) वे राजा दशरथ मेरे पिता हैं, जनयिता हैं । उन्होंने मेरे लिए जो भी आज्ञा दी है, वह मिथ्या कदापि न होगी—
८२४ रामायणमीमांसा एकविंश “स हि राजा दशरथः पिता जनयिता मम । आज्ञापयन्मां यत्तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति ॥” ( वा० रा० २।१११।११ ) पिता, माता और गुरु के कहने पर भी राज्य स्वीकार न करने पर भी भरत दोषी नहीं हुए, क्योंकि रागतः प्राप्त राज्य के स्वीकार करने में कोई विशेषता नहीं थी, विशेषता त्याग में ही थी । चित्रकूट की उस महती सभा में, जिसमें वसिष्ठ, वामदेव आदि महर्षि जनक जैसे महान् तत्त्ववेत्ता तथा अवधराज्य के वरिष्ठ विद्वान् एवं नागरिक उपस्थित थे, कुछ अन्तर्हित महर्षियों ने भी कहा कि हम लोग पिता की आज्ञा का पालन कर के श्रीराम को अनृण देखना चाहते हैं । महाराज इस निष्ठा के कारण स्वर्ग में प्रतिष्ठित हुए हैं— “सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः । अनृतत्वाच्च स्वर्गं····दशरथो गतः ॥” ( वा० रा० २।११२।१६ ) जैसे पिता का मरण सुनकर राम ने निरम्बु व्रत किया । उस दिन सब ने ही निरम्बु (निर्जल) व्रत किया— व्रत निरंबु तेहि दिन सब कीन्हा । मुनिहुँ कहे जल काहु न लीन्हा ।। (रा० मा० २।२४५।४) यह आज्ञा का लङ्घन नहीं है । क्योंकि रागप्राप्त होने से यहाँ गुरुजी का कथन आज्ञारूप नहीं है, किन्तु स्नेहवश ही है, वैसे प्रकृत में भी जानना चाहिये । श्रीकौशल्या ने शोकव्याकुल होकर महाराज के लिए कुछ कहा था, पर सावधान होने पर उन्होंने महाराज से स्पष्ट कहा था—हे धर्मज्ञ ! मैं धर्म समझ रही हूँ। आप सत्यवादी हैं, यह भी जानती हूँ। परन्तु मैंने जो कुछ कहा वह शोकव्याकुल होकर कहा था— “जानामि धर्मं धर्मज्ञ ! त्वां जाने सत्यवादिनम् । पुत्रशोकार्तया तत्त मया किमपि भाषितम् ॥ शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम् ॥” (वा० रा० २।६२।१४,१५) आप कहते हैं कि 'काम और क्रोध के आवेश में उन्मादी पिता की आज्ञा नहीं माननी चाहिये ।' परन्तु भगवान् राम तो स्पष्ट कह चुके हैं कि यदि क्रोधदृष्टि या काम के वश होकर भी पिता कुछ आदेश दे तो उसका भी पालन करना ही पुत्र का धर्म है । श्रीराम ने कौशल्या से कहा था कि मैं पिता की आज्ञा का अतिक्रमण किसी तरह भी नहीं कर सकता और आपको शिरसा प्रणाम द्वारा प्रसन्नकर वन जाना चाहता हूँ । यहाँ उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज सगरपुत्र पिता के आज्ञानुसार भूमि का खनन करते हुए महान् वध को प्राप्त हुए थे । जामदग्न्य राम ने पिता के आज्ञानुसार अपनी माता रेणुका का वध किया था । इन लोगों तथा अन्य लोगों ने पिता का वचन पालन किया था, अतः मैं पिता का वचन-पालन अवश्य करूँगा— “नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम । प्रसाद्ये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम् ॥ अस्माकं तु कुले जातैः सगरस्याज्ञया पितुः । खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तो हि महान् वधः ॥ जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम् । कृत्ता परशुनाऽरण्ये पितुर्वचनकारणात् ॥
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२५ एतैरन्यैश्च बहुभिर्दिवि देवसमैः कृतम् । पितुर्वचनममक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम् ॥” (वा० रा० २।२१।३०--३४) यही मानस में भी कहा है— “परसुराम पित आज्ञा राखी । मारी मात लोक सब साखी ॥” ( रा० मा० २।१७२।४ ) यही भरत ने भी कहा था— “उचित कि अनुचित किये विचारू । जाय धर्म सिर पातक भारू ॥” ( रा० मा० २।१७५।२ ) श्रीलक्ष्मण ने कुछ महाराज के विरुद्ध रुख प्रकट किया था । उसपर राम ने प्यार से ही उन्हें डाँटकर कहा था कि ऐसी अनार्य बुद्धि को त्यागकर धर्म का ही आश्रयण करो । तीक्ष्णता को त्यागकर मेरी बुद्धि का ही अनुगमन करो— “तदेनां विसृजानार्या क्षत्रधर्माश्रितां मतिम् । धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्वुद्धिरनुगम्यताम् ॥” ( रा० मा० २।२१।४४ ) भरत की महिमा अपने आप में लोकोत्तर है। उनका धर्म की नयी व्याख्या से कोई सम्बन्ध नहीं है। भरत न तो कभी महाराज की सत्यनिष्ठा में सन्देह करते थे और न ही वसिष्ठ की धर्म-व्याख्या में ही सन्दिहान थे । वे तो सरल हृदय से स्वच्छ भगवान् राम के अनुरागी थे । उनको किसी नये धर्म की स्थापना नहीं करनी थी । उनके दर्शनमात्र से चर और अचर सभी प्रभावित होते हैं । ठीक ही है— “होत न भूतल भाव भरत को । सचर अचर चर अचर करत को ।।” ( वा० रा० २।२३६।४ ) ठीक ही कहा गया है कि भरत एक गम्भीर क्षीरसमुद्र थे । विरह मन्दराचल था । कृपासिन्धु राघवेन्द्र ने साधुरूप देवताओं के लिए उस विरहरूपी मन्दराचल से भरतरूपी पयोधि को मथकर प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया था— “प्रेम अमिय मंदर बिरहु भरत पयोधि गभीर । मथि प्रकटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥” ( रा० मा० २।२३७ ) तुलसी ने ठीक ही कहा है— “अगम सनेहु भरत रघुबर को । जहाँ न जाइ मन बिधि हरि हर को ।।” (रा० मा० २।२३९,३) मानस की किसी भी पङ्क्ति से यह नहीं प्रतीत होता है कि श्रीभरत वसिष्ठ के किसी पक्ष का खण्डन करते हैं या वे महाराज दशरथ के किसी कार्य को दोषपूर्ण ठहराते हैं । श्रीराम को अयोध्या लौटाकर ले जाना और राज्यसिंहासन पर विराजमान करना सभी को अभीष्ट था ही । केवल माँ कैकेयी को वह भी देवताओं की माया से कुछ समय तक के लिए भले कुछ कम अच्छा लगा हो । महाराज दशरथ को वह अभीष्ट ही था । गुरु वसिष्ठ भी वही चाहते थे । चित्रकूट में भी वसिष्ठने कभी भरत की कोई परीक्षा नहीं ली थी । केवल सबके साथ मिल-जुलकर विचार करते थे । चित्रकूट की प्रथम सभा में गुरु वसिष्ठ महाराज ने वस्तुस्थिति का वर्णन कर के सबसे राय जाननी चाही थी । १०४
८२६ रामायणमीमांसा एकविंश “बोले मुनिवर समय समाना । सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरमधुर्रीन भानुकुलभानू । राजा राम स्वबस भगवान् ॥ सत्यसंघ पालक श्रुतिसेतू । राम जनम जग मंगल हेतू ॥ गुरु पितु मान बचन अनुसारी । खल दल दलन देव हितकारी ॥ नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान यथारथ ॥ बिधि हरि हर ससि रबि दिशिपाला । माया जीव करम कुलि काला ।। अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई । योगसिद्धि निगमागम गाई ॥ करि बिचार जिय देखहु नीके । रामरजाय सीस सबही कें ॥” ( रा० मा० २।२५२।१-४ ) “राखे रामरजाय रुख हम सब कर हित होई । समुझि सयाने करहु अस सब मिलि संमत सोई ।।”( रा० मा० २।२५३ ) उपर्युक्त पङ्क्तियों में वसिष्ठ महाराज ने सब कुछ कह दिया । नीति, प्रीति, परमार्थ और प्राणी के वास्तविक स्वार्थ को राम के समान और कोई नहीं जानता । यह एक ही पङ्क्ति सम्पूर्ण कुशङ्काओं एवं दुस्तर्कों का उत्तर है । राम सर्वेश्वर तो हैं ही । परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से भी उनका रुख देखकर ही काम करने में सबकी भलाई है । स्वयं राम का रुख तो नीति, प्रीति, परमार्थ और वास्तविक स्वार्थ की दृष्टि से भी सर्वहितकारी है । क्यों वन जा रहे हैं, यह भी स्पष्ट कह दिया । अन्त में भरत को भी तदनुसार ही चलना भी था । मुनिवर की वह वाणी नीति, परमार्थ और स्वार्थ से युक्त थी । उसपर कोई क्या कहता । श्रीभरतजी प्रेममूर्ति या प्रेमावतार थे । उन्होंने जो कहा वह उनके योग्य ही था । “भानुवंस भये भूप घनेरे । अधिक एकते एक बड़ेरे ॥ जनम हेतु सब कहँ पित माता । करम सुभासुभ देइ विधाता ।।” (रा० मा० २।२५३।३) परन्तु “दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउर जग जाना ॥ सो गोसांइ विधिगति जेहि छेकी । सकइ को टार टेक जो टेकी ।।”(रा०मा०२।२५३।४) इस वंश में कोई महान् प्रतापी धार्मिक राजा था । उसके यहाँ कोई राजा अपना धर्म-संकट लेकर आया था । उसकी पुत्री के जन्म-पत्र में ऐसा योग था कि वह सातवीं भाँवर में ही विधवा होगी, उसका पति मर जायगा । किसी ने भी उसके साथ विवाह करने की हिम्मत नहीं की थी । कौन करता, जान-बूझकर कौन मरना चाहता । धर्मात्मा सूर्यवंशी राजा तो ऐसे संकटों को मोल लेते ही रहते थे । उस राजा ने केवल धर्म-रक्षा की दृष्टि से ही विवाह स्वीकार कर लिया । वसिष्ठ महाराज पुरोहित थे ही । उन्होंने ही विवाह कराया । सातवीं भाँवर पड़ी । गुरु महाराज ने प्रत्येक भाँवर के समान स्वभावतः वर और कन्या के चिरञ्जीवी होने का आशीर्वाद दे दिया । आकाश- वाणी ने कहा कि मुनिवर ! यह आपने क्या किया ? आपके पिता ब्रह्माजी ने तो कन्या की भाग्यरेखा में वैधव्य-योग लिखा है । महर्षि ने अपनी भूल का अनुभव किया । वहीं वरकन्या को एक मङ्गलवस्त्र से प्रावृत करके कहा कि जब तक हम लौटकर न आयें इस प्रावरण को न हटाया जाय और आप ब्रह्मलोक पहुँच गये अपने पिता श्रीब्रह्माजी के पास । ब्रह्मा ने अपना हाथ बढ़ा दिया पुत्र, इस हाथ से गलती हो गयी इसे काट दो । महाराज वसिष्ठ ने अपनी जिह्वा
बढ़ा दी और सूचित किया कि आप से गलती नहीं गलती मुझसे हुई जो बिना विचारे इस प्रकार की वाणी निकल गयी, अतः आप इस जिह्वा को काट दें। अन्त में सब ऋषि, देवता आदि ने मिलकर दोनों का समन्वय कराया ओर वरकन्या का चिरञ्जीवित्व स्वीकृत हुआ। तब वसिष्ठ महाराज ने आकर प्रावरण हटाया और दोनों ने ही चिरञ्जीवी होकर राज्य किया। यह कथा वृद्ध-परम्परा से प्रचलित है और गोस्वामीजी की— "दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउर जग जाना ॥ सो गोसांइ विधिगति जेहि छेंकी। सकइ को टार टेक जो टेकी ॥" (रा०मा० २।२५३।४) इन दोनों पङ्क्तियों की श्रुतार्थापत्ति से सिद्धि भी होती है। श्रीभरतजी कहते हैं कि— "बूझिय मोहि उपाय अब सो सब मोर अभाग। सुनि सनेहमय बचन गुरु उर उपजा अनुराग ॥" (रा० मा० २।२५४) मुनि बोले— "तात बात फुर राम-कृपा ही । रामबिमुख सिधि सपनेहु नाही ॥" (रा० मा० २।२५४।१) तात ! बात सच है, परन्तु यह सब श्रीराम-कृपा ही का प्रभाव है। रामविमुख प्राणी के लिए सपने में भी सिद्धि कहाँ सम्भव है। राम-लक्ष्मण अवध लौट जायें। उनके बदले में भरत और शत्रुघ्न वन में जायें। मुनिवर को यह बात भरत को बड़ी ही प्रिय लगी, परन्तु उसका स्वीकृत होना श्रीराम पर ही निर्भर है, परन्तु इससे तो श्रीभरत का निःस्वार्थ प्रेम तो व्यक्त ही होता है। श्रीभरत कहते हैं कि १४ वर्ष ही क्यों हम दोनों भाई जन्मभर कानन में वास करेंगे श्रीराम-लक्ष्मण अवध में लौटकर जायें। गुरुदेव ! सीताराम अन्तर्यामी हैं और आप सर्वज्ञ सुजान हैं। मैं हृदय से सत्य कहता हूँ। आपकी बात कार्यान्वित होनी चाहिये— "कानन करहुँ जनमभर बासू । एहिते अधिक न मोहि सुपासू ॥" (रा० मा० २।२५४।४) श्रीभरत की महिमा मुनिवर को अपार जलराशि सी प्रतीत होती है। मुनिवर की महामति का भी उसे पाना कठिन प्रतीत होता है— "भरत महामहिमा जलरासी । मुनिमति तीर ठाढ़ि अबलासी ॥ गा चह पार जतन हिय हेरा। पावति नाव न बोहित बेरा ॥" (रा०मा० २।२५५।१,२) ठीक ही है वास्तव में राम-भरत एक ही तो थे। भरतप्रेम में विह्वल मुनि ने श्रीराम से भी कहा— "सुनहु राम सर्वग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥" (रा० मा० २।२५५।४) आप सबके हृदय के भीतर अन्तर्यामीरूप से रहते हैं। आप सबके भाव कुभाव को जानते हैं। आपसे कुछ छिपा नहीं है। जिससे पुरजनों, माताओं तथा भरत का हित हो वही करें। भगवान् ने कहा कि मुनिवर ! सब उपाय तो आप के हाथ में है। प्रसन्नतापूर्वक आपकी आज्ञा का पालन करने और सत्य बोलने में ही सबका हित है। प्रथम तो मेरे लिए जो आज्ञा हो मैं आपकी सिख मान माथे पर रख वही करूँगा। उसके पश्चात् जिसको भी जो कहेंगे सभी सब प्रकार से आपकी सेवकाई करेगा—
८२८ रामायणमीमांसा एकविंश “सब कर हित रुख राउर राखे। आयसु किये मुदित फुर भाखे ॥ प्रथम जो आयसु मो कहँ होई। माथे मानि करौं सिख सोई॥” (रा० मा० २।२५६।२) यहाँ कितनी निष्ठा है गुरुभक्ति में और ‘बिनहि बिचार करिय हित मानी’ की भावना में परन्तु वसिष्ठ तो भरत के प्रेम के वशीभूत हो चुके थे। “कह मुनि राम सत्य तुम भाखा। भरत सनेह बिचार न रखा॥” (रा० मा० २।२५६।३) भरत का प्रेम देखकर मेरी मति विचारशून्यसी हो गयी है। “तेहि ते कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥” यहाँ कहाँ विचारों का संघर्ष है ? कहाँ कुतर्क है ? यदि है तो केवल कलियुगी कथक्कड़ के मन में। मुनि ने अपना निर्णय सुना दिया। “मोरे जान भरत रुचि राखी। जो कीजिय सो सुभ सिव साखी॥” अतः आप भरत की प्रार्थना को सुन फिर विचार कर के जो साधु-मत, लोक-मत और नृपनीति और निगम-संमत हो वैसा ही करें— “भरत बिनय सादर सुनिय करिय बिचार बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥” (रा० मा० २।२५७) भरत की गुरुभक्ति देखकर भगवान् परमानन्द निमग्न हो गये और श्रीभरत को धर्म-धुरन्धर और मन, वचन और कर्म से अपना अनन्यभक्त समझ लिया। जो निश्छलरूप गुरुभक्त होता है, वह भगवान् का अनन्यभक्त होगा ही— “गुर अनुराग भरत पर देखी। रामहृदय आनन्द बिसेखी ॥ भरतहि धरमधुरन्धर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥” (रा०मा० २।२५७।१) और बोले— ‘नाथ सपथ पित चरन दोहाई। भयउ न भुवन भरत सम भाई ॥ जे गुरपद अम्बुज अनुरागी। ते लोकहुं वेदहुं बड़भागी ॥ राउर जापर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥”(रा०मा० २।२५७।२,३) कितने मधुरभाव, कितने सुन्दर सम्बन्ध, मुनि के, श्रीराम के एवं श्रीभरत के कहीं किसी कुतर्क, हार- जीत, खण्डन-मण्डन का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। फिर भी न जाने किंकर किंकर्तव्य मूढ़ क्यों ? वास्तव में इस प्रसङ्ग में मानस की पङ्क्तियाँ ही सर्वोत्कृष्ट हैं। कुछ भी कहना सुनना उस महान् दिव्य रस में व्यवधान ही डाल सकता है। श्रीराम ने स्वीकार कर लिया कि भरत के कथन के अनुसार काम करने में सबकी भलाई है— “भरत कहहिं सो किये भलाई।” (रा० मा० २।२५७।४) इससे बढ़कर विश्वास और क्या हो सकता है ? मुनि ने कहा कि तात ! अब संकोच छोड़कर कृपासिन्धु अपने प्रियबन्धु से अपने हृदय की सब बात कहो। भरतजी तो गुरुजी और स्वामी इष्टदेव प्रभु राम की परम अनुकूलता पाकर बोले—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८९९ “कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि ते अधिक कहब मैं काहा ॥ मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधहुँ पर कोह न काऊ ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥ सिसुपनते परिहरेउँ न संगू। कबहुं न कीन्ह मोर मन भंगू ॥ मैं प्रभु कृपा रीति जिय जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥”(रा०मा० २।२५८।२-४) “महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कहै न बैन । दरसन तृपित न आज लगि प्रेम पियासे नैन ॥” (रा० मा० २।२५९) अब भरत को स्पष्ट भासित होता है— “गुर गोसांई साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥” (रा० मा० २।२५९।४) महाराज के सम्बन्ध में उनके प्रेमपन का ही स्मरण करते हैं— भूपति मरन प्रेमपन राखी ॥” (रा० मा० २।२६०।१) श्रीभरतजी अपने दैन्य, दोष तथा माँ कैकेयी के सम्बन्ध से ग्लानि का स्पष्टीकरण करते हैं । उसपर श्रीभगवान् कहते हैं कि तात ! मेरी दृष्टि में तुम्हारे समान त्रिभुवन में कोई पुण्यश्लोक नहीं हुआ । जो तुम्हारे ऊपर कुटिलता का आरोप करेगा उसके लोक-परलोक बिगड़ जायँगे । माँ कैकेयी के ऊपर भी वे ही लोग दोषारोपण करेंगे, जिन्होंने कभी गुरुओं एवं साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है । तुम निरर्थक तर्क मत करो । वैर और प्रेम छिपाने से भी नहीं छिप सकता । विहङ्गम आदि भी मुनिगणों के पास ही जाते हैं, बाधक बधिकों को देखकर भागते हैं । वर्तमान कठिनाइयों को तुम अच्छी तरह समझते हो । महाराज ने मुझे त्यागकर भी सत्य की रक्षा की और प्रेमपन के लिए प्रिय तन को तृण के तुल्य त्याग दिया। उन महाराज का वचन टालने से मन में सोच अवश्य है । परन्तु उससे भी अधिक तुम्हारा संकोच है। उसके ऊपर भी गुरु महाराज की आज्ञा है । अतः जो कुछ भी तुम कहोगे वही मैं करना चाहूँगा— “राखेउ राय सत्य मोहि त्यागी। तन परिहरेउ प्रेमपन लागी ॥ तासु वचन मेटत मन सोचू । तेहि ते अधिक तुम्हार सँकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥”(रा०मा० २।२६२।३,४) देवता लोग यद्यपि घबड़ा गये । परन्तु सुरगुरु ने उन्हें बताया कि श्रीभरत को तुम श्रीराम की छाया समझो । जैसे छाया काया का ही अनुसरण करती है। उसी तरह भरत श्रीराम की काया की छाया ही हैं । भरत के मन में भी यही बात आयी । “निज पन तजि राखेउ पन मोरा । छोहु सनेह कीन्ह नहि थोरा ॥” (रा० मा० २।२६४।४) और बोले— “कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥ गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटौ मलिन मन कलपित सूला ॥ अपडर डरेउ न सोच समूलें। रविहि न दोष देव दिशि भूलें ॥” (रा० मा०२।२६५।१,२) नाथ ! मेरी कल्पनाएँ मेरे अपडर का ही परिणाम थीं । किसी को दिग्भ्रम होता है तो वह उसी का दोष होता है सूर्य का दोष नहीं होता। उसी प्रकार मेरे अभाग का ही परिणाम था ।
८३० रामायणमीमांसा एकविंश "लखि सब विधि गुरु स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभ नहि मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिय सोई । जनहित प्रभुचित छोभ न होई ॥ जो सेवक साहिबहि सँकोची । निज हित चहहि तासु मति पोची ॥" (रा०मा० २।२६६।१,२) बस ऐसा ही भरत पर विश्वास वसिष्ठजी का था, ऐसा ही सुरगुरु का था और ऐसा ही प्रभु श्रीराम का विश्वास था । राम की काया की छायारूप भरत से ऐसी आशा की ही जा सकती थी । इसके बाद अनेक प्रस्ताव एवं परिस्थितियाँ आयीं । श्रीभरत के सम्बन्ध में कौशल्या की दृष्टि और ही विलक्षण है । वह श्रीसीता की माता से भरत के सम्बन्ध में कहती हैं कि मैं कभी राम की शपथ नहीं करती हूँ पर मैं भरत के सम्बन्ध में राम की शपथ कर के भी कह सकती हूँ कि भरत के शील, गुण, विनय एवं महत्ता, भ्रातृत्व, भक्ति, विश्वास और भलाई सब अनुपम एवं अवर्णनीय हैं । शारदा की मति भी उनके वर्णन में असमर्थ है । भला कहीं सीप के द्वारा महासमुद्र को उलचा जा सकता है । जैसे किसी निकष पर ही कनकभणि की परीक्षा हो सकती है, वैसे ही समय आने पर ही पुरुष की परीक्षा , होती है । उन्होंने मिथिलेश रानी से कहा कि आप अवसर पाकर मिथिलेश से कहिये— "रखिअहिं लखन भरत गवनहिं बन । जो यह मत माने महीपमन ॥ गूढ सनेह भरत मन माहीं । रहे नीक मोहि लागत नाहीं ॥" (रा०मा० २।२८२।१,२) श्रीजनकजी ने भी कौशल्या का सन्देश सुनकर कहा था कि श्रीभरत का व्यवहार सुवर्ण में सुगन्ध है एवं शशिसार की सुधा है— "मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजस सराहन लगे मुदित मन ॥" (रा०मा० २।२८६।१) "धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ यथामति मोर प्रचारू ॥ सो मति मोरि भरत महिमाहीं । कहै काहु छल छुअति न छाहीं ॥ भरत चरित कीरति करतूती । धरम शील गुन बिमल बिभूती ॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥" (रा०मा० २।२८६।२-४) "निरवधि गुन निरुपम पुरुष भरत भरत सम जानि । कहिय सुमेरु कि सेर सम कविकुलमति सकुचानि ॥" ( रा० मा० २।२८७ ) "भरत महा महिमा सुनु रानी । जानहिं राम न सकहिं बखानी ॥" (रा० मा० २।२८७।१) महाराज जनक विचार करते हैं कि यद्यपि धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार में मेरी मति की अव्याहत गति है तथापि भरतमहिमा की छाया का भी वह स्पर्श नहीं कर पाती । ठीक ही हैं क्योंकि वसिष्ठ महर्षि की भी मति भरतमहामहिमा जलराशि के सामने अपने को अबला समझती है । वस्तुतः श्रीभरत तात्त्विक दृष्टि से अव्याकृत तुरीय तत्त्व होते हुए भक्ति की दृष्टि से साक्षात् भगवत्प्रेमस्वरूप ही हैं । भरत की महिमा भगवान् राम इसी लिए जानते है कि वे सर्वज्ञ और सर्वसाक्षी हैं । सर्वसाक्षी से कुछ भी छिप नहीं सकता । परन्तु वर्णन तो साक्षी का विषय नहीं होता, क्योंकि साक्षी में कर्तृत्व और वर्णयितृत्व नहीं हो सकता । श्रीकौशल्या के प्रस्ताव की चर्चा सुनयना रानी ने की थी । उसमें बहुत कुछ समन्वय की बात थी । परन्तु वे यह समझते हैं कि भरत की प्रीति और विश्वास दोनों ही अतर्क्य हैं । भरतजी स्नेह और ममता की सीमा हैं । क्योंकि—"निर्दोषं हि समं ब्रह्म" निर्दोष समत्व तो ब्रह्म में ही होता हैं— "राम ब्रह्म परमारथरूपा ।", "यद्यपि सम नहि राग न दोषू ॥"
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८३१ परन्तु भरत के प्रेम पर उस समता के कारण कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि भरत ने परमार्थ-स्वार्थ सुखमार की ओर कभी स्वप्न में भी देखा नहीं। उनकी दृष्टि में तो रामपदारविन्द प्रेम ही साधन है वही सिद्धि भी है ऐसा स्वार्थ-परमार्थनिरपेक्ष कभी श्रीराम की आज्ञा के विपरीत सोच भी क्या सकता है। “देवि परंतु भरत रघुवर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥ भरत अवधि सनेह समता की। यद्यपि राम सीम समता की ॥ परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुं निहारे ॥ साधन सिद्धि रामपग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥” (रा०मा० २।२८७।३,४) श्रीजनकजी की दृष्टि में भी महाराज दशरथ की आज्ञा में कोई दोष नहीं था। वे सोचते हैं कि महाराज ने राम के लिए वनवास की आज्ञा प्रदानकर तृणतुल्य प्राणों को त्यागकर के अपने सत्यप्रेम को प्रमाणित किया। “रामहिं राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आप प्रिय प्रेम प्रमाना।।” (रा० मा० २।२९०।२) भरत की दृष्टि उनके ही निम्न वचन से विदित होती है-- “राखि राम रुख धरम ब्रत पराधीन मोहि जानि। सबकै संमत सर्वहित करिय प्रेम पहिचानी ॥” ( रा० मा० २।२९२ ) श्रीराम का रुख और धर्म तथा सत्यव्रत के पराधीन मुझे जानकर जो सर्वसम्मत हित हो वही करें। इससे स्पष्ट है कि श्रीभरत को किसी नये धर्म, नये पन्थ का प्रचार अभीष्ट नहीं था। महाराज दशरथ और महर्षि के वेदादिशास्त्र-सम्मत सिद्धान्त से भिन्न उनका कोई पृथक् सिद्धान्त नहीं था। उनकी दृष्टि में स्वार्थ और स्वामि-सेवा में धर्म का वैसा ही वैर है जैसे अन्ध प्रेम और प्रबोध में विरोध होता है। 'प्रभु पित मात सुहृद गुरु स्वामी । पूज्य परमहित अन्तरयामी ॥ सरल सुसाहिब सील निधानू । प्रनतपाल सर्वज्ञ सुजानू ॥ समरथ सरनागत हितकारी । गुनग्राहक अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाइंहि सरिस गोसांई । मोहि समान मैं साँइ दोहाई ॥ प्रभु पित बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाज सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिय अमरपद माहुर मीचू ॥ रामरजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ तो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई । प्रभु मानी सनेहसेवकाई ॥” (रा०मा०२।२९६।१-४) “कृपा भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर । दूषन भे भूषन सरिस सुजस चारु चहु ओर ॥” (रा० मा० २।२९७) “राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगतबिदित निगमागम गाई ॥” (रा० मा० २।२९७।१) “सोक सनेह कि बाल सुभायें । आयउँ लाय रजायसु बायें ॥ तबहुं कृपाल हेरि निज ओरा। सबहिं भांति भल मानेउ मोरा ॥ देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥ बड़े समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ी चूक साहिब अनुरागू ॥ नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥” (रा० मा० २।२९८।१-४)
८३२ रामायणमीमांसा एकविंश "सुहृद सुजान सु साहिबहिं बहुत कहब बड़ि खोरि । आयसु देइय देव अब सबई सुधारी मोरि ॥" (वा० रा० २।२९९) "प्रभु पद पदम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सींव सोहाई ॥ सो करि कहउँ हिये अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की ॥ सहज सनेह स्वामिसेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ आज्ञा सम न सुसाहिबसेवा । सो प्रसाद जनु पावै देवा ॥" (रा०मा० २।२९९।१,२) उपर्युक्त भरत के वचन गङ्गाजल के तुल्य निर्मल, निश्छल तथा परम पवित्र हैं। उनका अलग से कुछ अभिप्राय वर्णन करना कठिन है। इनमें किसी के प्रति कोई आक्षेप नहीं है। भरत के परमपवित्र दैन्यपूर्ण भक्तिसुधासमुद्र में नयी धर्मव्याख्या का स्थान ही कहाँ है ? वे समाज सहित प्रभु के समीप आने को भी अपनी धृष्टता, आज्ञापालन, सेवा में चलना मानते हैं और चारों पुरुषार्थों से विमुख होकर स्वार्थ एवं छलरहित स्वामी की सेवकाई को ही सर्वोत्कृष्ट धर्म मानते हैं। उनकी दृष्टि में सर्वोत्कृष्ट सेवा स्वामी की आज्ञा का पालन करना ही है। उन्होंने तीर्थराज प्रयाग से भी तो यही कहा था कि— "अर्थ न धर्म न काम रुचि गति न चहौं निरबान । जनम जनम रति रामपद यह बरदान न आन ॥" (रा० मा० २।२०३) श्रीराम प्रभु ने भरत के सम्बन्ध में जो कहा है वह उनके अनुरूप ही है— "तात भरत तुम्ह धरमधुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥" (रा० मा० २।३०२।४) श्रीराम के दरबार में धर्मधुरीण के रूप में भरत प्रसिद्ध हैं। उनके अनुसार ही वे लोक और वेद दोनों के ही ज्ञाता और प्रेम में परम प्रवीण हैं। अतएव श्रीराम कहते हैं कि— "जानहु तात तरनिकुल रीति । सत्यसन्ध पित कीरति नीती ॥ क्या श्रीराम के इन वचनों से महाराज दशरथ का किञ्चित् भी अपकर्ष प्रतीत होता है ? उनमें क्रोध, लोभ या काम का आवेश सिद्ध होता है ? वे भरत से आशा रखते हैं कि वे तरणिकुल की रीति और सत्यसन्ध पिता दशरथ की कीर्ति का पालन करेंगे। "तुम्हहिं बिदित सबही कर करमू । आपन मोर परम हित धरमू ॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा । तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥" (रा० मा० २।३०३।२) श्रीराम श्रीगुरु वसिष्ठ की कृपा से ही सबका कल्याण समझते हैं— "तात तात बिनु बात हमारी । केवल गुरुकुल-कृपा सँभारी ॥" (रा० मा० २।३०३।३) "राजकाज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम । गुरुप्रभाव पालिहि सबहिं भल होइहि परिनाम ॥" (रा० मा० २।३०४) "सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुरुप्रसाद रखवारा ॥" (रा० मा० २।३०४।१) जब मर्यादापुरुषोत्तम वेदशास्त्रपालक भगवान् राम का गुरु के सम्बन्ध में ऐसे पवित्र भाव हैं तो श्रीराम परछाईंस्वरूप श्रीभरतजी का वैसा भाव स्वाभाविक ही है। "मात पिता गुरु स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥" (रा० मा० २।३०४।१)