भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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बढ़ा दी और सूचित किया कि आप से गलती नहीं गलती मुझसे हुई जो बिना विचारे इस प्रकार की वाणी निकल गयी, अतः आप इस जिह्वा को काट दें। अन्त में सब ऋषि, देवता आदि ने मिलकर दोनों का समन्वय कराया ओर वरकन्या का चिरञ्जीवित्व स्वीकृत हुआ। तब वसिष्ठ महाराज ने आकर प्रावरण हटाया और दोनों ने ही चिरञ्जीवी होकर राज्य किया। यह कथा वृद्ध-परम्परा से प्रचलित है और गोस्वामीजी की— "दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउर जग जाना ॥ सो गोसांइ विधिगति जेहि छेंकी। सकइ को टार टेक जो टेकी ॥" (रा०मा० २।२५३।४) इन दोनों पङ्क्तियों की श्रुतार्थापत्ति से सिद्धि भी होती है। श्रीभरतजी कहते हैं कि— "बूझिय मोहि उपाय अब सो सब मोर अभाग। सुनि सनेहमय बचन गुरु उर उपजा अनुराग ॥" (रा० मा० २।२५४) मुनि बोले— "तात बात फुर राम-कृपा ही । रामबिमुख सिधि सपनेहु नाही ॥" (रा० मा० २।२५४।१) तात ! बात सच है, परन्तु यह सब श्रीराम-कृपा ही का प्रभाव है। रामविमुख प्राणी के लिए सपने में भी सिद्धि कहाँ सम्भव है। राम-लक्ष्मण अवध लौट जायें। उनके बदले में भरत और शत्रुघ्न वन में जायें। मुनिवर को यह बात भरत को बड़ी ही प्रिय लगी, परन्तु उसका स्वीकृत होना श्रीराम पर ही निर्भर है, परन्तु इससे तो श्रीभरत का निःस्वार्थ प्रेम तो व्यक्त ही होता है। श्रीभरत कहते हैं कि १४ वर्ष ही क्यों हम दोनों भाई जन्मभर कानन में वास करेंगे श्रीराम-लक्ष्मण अवध में लौटकर जायें। गुरुदेव ! सीताराम अन्तर्यामी हैं और आप सर्वज्ञ सुजान हैं। मैं हृदय से सत्य कहता हूँ। आपकी बात कार्यान्वित होनी चाहिये— "कानन करहुँ जनमभर बासू । एहिते अधिक न मोहि सुपासू ॥" (रा० मा० २।२५४।४) श्रीभरत की महिमा मुनिवर को अपार जलराशि सी प्रतीत होती है। मुनिवर की महामति का भी उसे पाना कठिन प्रतीत होता है— "भरत महामहिमा जलरासी । मुनिमति तीर ठाढ़ि अबलासी ॥ गा चह पार जतन हिय हेरा। पावति नाव न बोहित बेरा ॥" (रा०मा० २।२५५।१,२) ठीक ही है वास्तव में राम-भरत एक ही तो थे। भरतप्रेम में विह्वल मुनि ने श्रीराम से भी कहा— "सुनहु राम सर्वग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥" (रा० मा० २।२५५।४) आप सबके हृदय के भीतर अन्तर्यामीरूप से रहते हैं। आप सबके भाव कुभाव को जानते हैं। आपसे कुछ छिपा नहीं है। जिससे पुरजनों, माताओं तथा भरत का हित हो वही करें। भगवान् ने कहा कि मुनिवर ! सब उपाय तो आप के हाथ में है। प्रसन्नतापूर्वक आपकी आज्ञा का पालन करने और सत्य बोलने में ही सबका हित है। प्रथम तो मेरे लिए जो आज्ञा हो मैं आपकी सिख मान माथे पर रख वही करूँगा। उसके पश्चात् जिसको भी जो कहेंगे सभी सब प्रकार से आपकी सेवकाई करेगा—