भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८२६ रामायणमीमांसा एकविंश “बोले मुनिवर समय समाना । सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरमधुर्रीन भानुकुलभानू । राजा राम स्वबस भगवान् ॥ सत्यसंघ पालक श्रुतिसेतू । राम जनम जग मंगल हेतू ॥ गुरु पितु मान बचन अनुसारी । खल दल दलन देव हितकारी ॥ नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान यथारथ ॥ बिधि हरि हर ससि रबि दिशिपाला । माया जीव करम कुलि काला ।। अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई । योगसिद्धि निगमागम गाई ॥ करि बिचार जिय देखहु नीके । रामरजाय सीस सबही कें ॥” ( रा० मा० २।२५२।१-४ ) “राखे रामरजाय रुख हम सब कर हित होई । समुझि सयाने करहु अस सब मिलि संमत सोई ।।”( रा० मा० २।२५३ ) उपर्युक्त पङ्क्तियों में वसिष्ठ महाराज ने सब कुछ कह दिया । नीति, प्रीति, परमार्थ और प्राणी के वास्तविक स्वार्थ को राम के समान और कोई नहीं जानता । यह एक ही पङ्क्ति सम्पूर्ण कुशङ्काओं एवं दुस्तर्कों का उत्तर है । राम सर्वेश्वर तो हैं ही । परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से भी उनका रुख देखकर ही काम करने में सबकी भलाई है । स्वयं राम का रुख तो नीति, प्रीति, परमार्थ और वास्तविक स्वार्थ की दृष्टि से भी सर्वहितकारी है । क्यों वन जा रहे हैं, यह भी स्पष्ट कह दिया । अन्त में भरत को भी तदनुसार ही चलना भी था । मुनिवर की वह वाणी नीति, परमार्थ और स्वार्थ से युक्त थी । उसपर कोई क्या कहता । श्रीभरतजी प्रेममूर्ति या प्रेमावतार थे । उन्होंने जो कहा वह उनके योग्य ही था । “भानुवंस भये भूप घनेरे । अधिक एकते एक बड़ेरे ॥ जनम हेतु सब कहँ पित माता । करम सुभासुभ देइ विधाता ।।” (रा० मा० २।२५३।३) परन्तु “दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउर जग जाना ॥ सो गोसांइ विधिगति जेहि छेकी । सकइ को टार टेक जो टेकी ।।”(रा०मा०२।२५३।४) इस वंश में कोई महान् प्रतापी धार्मिक राजा था । उसके यहाँ कोई राजा अपना धर्म-संकट लेकर आया था । उसकी पुत्री के जन्म-पत्र में ऐसा योग था कि वह सातवीं भाँवर में ही विधवा होगी, उसका पति मर जायगा । किसी ने भी उसके साथ विवाह करने की हिम्मत नहीं की थी । कौन करता, जान-बूझकर कौन मरना चाहता । धर्मात्मा सूर्यवंशी राजा तो ऐसे संकटों को मोल लेते ही रहते थे । उस राजा ने केवल धर्म-रक्षा की दृष्टि से ही विवाह स्वीकार कर लिया । वसिष्ठ महाराज पुरोहित थे ही । उन्होंने ही विवाह कराया । सातवीं भाँवर पड़ी । गुरु महाराज ने प्रत्येक भाँवर के समान स्वभावतः वर और कन्या के चिरञ्जीवी होने का आशीर्वाद दे दिया । आकाश- वाणी ने कहा कि मुनिवर ! यह आपने क्या किया ? आपके पिता ब्रह्माजी ने तो कन्या की भाग्यरेखा में वैधव्य-योग लिखा है । महर्षि ने अपनी भूल का अनुभव किया । वहीं वरकन्या को एक मङ्गलवस्त्र से प्रावृत करके कहा कि जब तक हम लौटकर न आयें इस प्रावरण को न हटाया जाय और आप ब्रह्मलोक पहुँच गये अपने पिता श्रीब्रह्माजी के पास । ब्रह्मा ने अपना हाथ बढ़ा दिया पुत्र, इस हाथ से गलती हो गयी इसे काट दो । महाराज वसिष्ठ ने अपनी जिह्वा