भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 902, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 902

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२५ एतैरन्यैश्च बहुभिर्दिवि देवसमैः कृतम् । पितुर्वचनममक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम् ॥” (वा० रा० २।२१।३०--३४) यही मानस में भी कहा है— “परसुराम पित आज्ञा राखी । मारी मात लोक सब साखी ॥” ( रा० मा० २।१७२।४ ) यही भरत ने भी कहा था— “उचित कि अनुचित किये विचारू । जाय धर्म सिर पातक भारू ॥” ( रा० मा० २।१७५।२ ) श्रीलक्ष्मण ने कुछ महाराज के विरुद्ध रुख प्रकट किया था । उसपर राम ने प्यार से ही उन्हें डाँटकर कहा था कि ऐसी अनार्य बुद्धि को त्यागकर धर्म का ही आश्रयण करो । तीक्ष्णता को त्यागकर मेरी बुद्धि का ही अनुगमन करो— “तदेनां विसृजानार्या क्षत्रधर्माश्रितां मतिम् । धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्वुद्धिरनुगम्यताम् ॥” ( रा० मा० २।२१।४४ ) भरत की महिमा अपने आप में लोकोत्तर है। उनका धर्म की नयी व्याख्या से कोई सम्बन्ध नहीं है। भरत न तो कभी महाराज की सत्यनिष्ठा में सन्देह करते थे और न ही वसिष्ठ की धर्म-व्याख्या में ही सन्दिहान थे । वे तो सरल हृदय से स्वच्छ भगवान् राम के अनुरागी थे । उनको किसी नये धर्म की स्थापना नहीं करनी थी । उनके दर्शनमात्र से चर और अचर सभी प्रभावित होते हैं । ठीक ही है— “होत न भूतल भाव भरत को । सचर अचर चर अचर करत को ।।” ( वा० रा० २।२३६।४ ) ठीक ही कहा गया है कि भरत एक गम्भीर क्षीरसमुद्र थे । विरह मन्दराचल था । कृपासिन्धु राघवेन्द्र ने साधुरूप देवताओं के लिए उस विरहरूपी मन्दराचल से भरतरूपी पयोधि को मथकर प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया था— “प्रेम अमिय मंदर बिरहु भरत पयोधि गभीर । मथि प्रकटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥” ( रा० मा० २।२३७ ) तुलसी ने ठीक ही कहा है— “अगम सनेहु भरत रघुबर को । जहाँ न जाइ मन बिधि हरि हर को ।।” (रा० मा० २।२३९,३) मानस की किसी भी पङ्क्ति से यह नहीं प्रतीत होता है कि श्रीभरत वसिष्ठ के किसी पक्ष का खण्डन करते हैं या वे महाराज दशरथ के किसी कार्य को दोषपूर्ण ठहराते हैं । श्रीराम को अयोध्या लौटाकर ले जाना और राज्यसिंहासन पर विराजमान करना सभी को अभीष्ट था ही । केवल माँ कैकेयी को वह भी देवताओं की माया से कुछ समय तक के लिए भले कुछ कम अच्छा लगा हो । महाराज दशरथ को वह अभीष्ट ही था । गुरु वसिष्ठ भी वही चाहते थे । चित्रकूट में भी वसिष्ठने कभी भरत की कोई परीक्षा नहीं ली थी । केवल सबके साथ मिल-जुलकर विचार करते थे । चित्रकूट की प्रथम सभा में गुरु वसिष्ठ महाराज ने वस्तुस्थिति का वर्णन कर के सबसे राय जाननी चाही थी । १०४