रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२४ रामायणमीमांसा एकविंश “स हि राजा दशरथः पिता जनयिता मम । आज्ञापयन्मां यत्तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति ॥” ( वा० रा० २।१११।११ ) पिता, माता और गुरु के कहने पर भी राज्य स्वीकार न करने पर भी भरत दोषी नहीं हुए, क्योंकि रागतः प्राप्त राज्य के स्वीकार करने में कोई विशेषता नहीं थी, विशेषता त्याग में ही थी । चित्रकूट की उस महती सभा में, जिसमें वसिष्ठ, वामदेव आदि महर्षि जनक जैसे महान् तत्त्ववेत्ता तथा अवधराज्य के वरिष्ठ विद्वान् एवं नागरिक उपस्थित थे, कुछ अन्तर्हित महर्षियों ने भी कहा कि हम लोग पिता की आज्ञा का पालन कर के श्रीराम को अनृण देखना चाहते हैं । महाराज इस निष्ठा के कारण स्वर्ग में प्रतिष्ठित हुए हैं— “सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः । अनृतत्वाच्च स्वर्गं····दशरथो गतः ॥” ( वा० रा० २।११२।१६ ) जैसे पिता का मरण सुनकर राम ने निरम्बु व्रत किया । उस दिन सब ने ही निरम्बु (निर्जल) व्रत किया— व्रत निरंबु तेहि दिन सब कीन्हा । मुनिहुँ कहे जल काहु न लीन्हा ।। (रा० मा० २।२४५।४) यह आज्ञा का लङ्घन नहीं है । क्योंकि रागप्राप्त होने से यहाँ गुरुजी का कथन आज्ञारूप नहीं है, किन्तु स्नेहवश ही है, वैसे प्रकृत में भी जानना चाहिये । श्रीकौशल्या ने शोकव्याकुल होकर महाराज के लिए कुछ कहा था, पर सावधान होने पर उन्होंने महाराज से स्पष्ट कहा था—हे धर्मज्ञ ! मैं धर्म समझ रही हूँ। आप सत्यवादी हैं, यह भी जानती हूँ। परन्तु मैंने जो कुछ कहा वह शोकव्याकुल होकर कहा था— “जानामि धर्मं धर्मज्ञ ! त्वां जाने सत्यवादिनम् । पुत्रशोकार्तया तत्त मया किमपि भाषितम् ॥ शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम् ॥” (वा० रा० २।६२।१४,१५) आप कहते हैं कि 'काम और क्रोध के आवेश में उन्मादी पिता की आज्ञा नहीं माननी चाहिये ।' परन्तु भगवान् राम तो स्पष्ट कह चुके हैं कि यदि क्रोधदृष्टि या काम के वश होकर भी पिता कुछ आदेश दे तो उसका भी पालन करना ही पुत्र का धर्म है । श्रीराम ने कौशल्या से कहा था कि मैं पिता की आज्ञा का अतिक्रमण किसी तरह भी नहीं कर सकता और आपको शिरसा प्रणाम द्वारा प्रसन्नकर वन जाना चाहता हूँ । यहाँ उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज सगरपुत्र पिता के आज्ञानुसार भूमि का खनन करते हुए महान् वध को प्राप्त हुए थे । जामदग्न्य राम ने पिता के आज्ञानुसार अपनी माता रेणुका का वध किया था । इन लोगों तथा अन्य लोगों ने पिता का वचन पालन किया था, अतः मैं पिता का वचन-पालन अवश्य करूँगा— “नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम । प्रसाद्ये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम् ॥ अस्माकं तु कुले जातैः सगरस्याज्ञया पितुः । खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तो हि महान् वधः ॥ जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम् । कृत्ता परशुनाऽरण्ये पितुर्वचनकारणात् ॥