रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 890, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे भरत के प्रति किसी प्रकार के कौटिल्य की कल्पना पाप का परिणाम है, वैसे ही महाराज दशरथ के दिव्य गुणों में कालिमा की कल्पना अपने हृदय की ही कालिमा को प्रकट करना है। श्रीतुलसी तो वन्दना में ही कहते हैं कि— “बन्दहुँ अवध भुवाल सत्यप्रेम जेहि रामपर। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तन तृण इव परिहरेउ ॥” (रा० मा० १।१६) हाँ, तो श्रीदशरथजी के वचन को शराबी के वचन से उपमा देना या उस भङ्गड़ की उपमा देना जो कहता है कि हमें स्मशान ले चलो या उन्हें काम, क्रोध, लोभ या ममता के आवेश का उन्मादी कहना वसिष्ठ, भरद्वाज, राम, भरत और तुलसी सबका ही अपमान करना है। महाराज दशरथ का कैकेयी से प्रेम था। परन्तु वह अनुचित नहीं है। अपनी विवाहिता पत्नी में प्रेम कथमपि अनुचित नहीं कहा जा सकता। जिस क्षण उन्होंने कैकेयी का श्रीराम के विरुद्ध भाव देखा एकदम कैकेयी से उदासीन हो गये। कामी व्यक्ति तो राज्य, धन, पुत्र सबको ही त्यागकर कामिनी पर ही मुग्ध रहता है। परन्तु महाराज ने कैकेयी को समझाकर देख लिया कि यह असाध्य व्याधि है। तब महाराज ने यही कहा कि— “चहत न भरत भूपतहि भोरे। बिधिबस कुमति बसी उर तोरे ॥ सो सब मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहि बिधि बामू ॥ सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुनधाम राम प्रभुताई ॥ करिहहि भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँपुर राम बड़ाई ॥ तोर कलंक मोर पछिताऊ। मुयेहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुँह गोई ॥ फिर पछितैहसि अन्त अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी ॥” (रा० मा० २।३५।१-४) यह कहना ही अनभिज्ञता ही है कि “पहले दशरथ ने कहा था कि ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है। परन्तु अब जब आज भरत से राज्य लेने के लिए कहा जाता है तब धर्म परिवर्तित रूप से उसके पक्ष में समर्थन दे देता है।” क्योंकि लेखक उत्सर्ग और अपवाद के सिद्धान्त से अपरिचित ही प्रतीत होता है। सामान्य नियम सर्वत्र प्रसिद्ध है। हरि इ इस स्थिति में सामान्य शास्त्र “इको यणचि” (पा० सू० ६।१।७७) के अनुसार यण् प्राप्त होता है। परन्तु उससे प्रबल “अकः सवर्णे दीर्घः” (पा० सू० ६।१।१०१) के अनुसार यण् न होकर दीर्घ ही होता है। सामान्यतया सदा सन्ध्या करने का विधान है। परन्तु सूतक-पातक में उसका संकोच भी होता है। उसी तरह सामान्यतया ज्येष्ठ पुत्र को राज्य देना उचित ही था। वही वसिष्ठसम्मति के अनुसार महाराज करने जा रहे थे। परन्तु अब जब पूर्वदत्तवरा भरतमाता महारानी कैकेयी ने नयी परिस्थिति पैदा कर दी तो अब विशेष स्थिति में पूर्वधर्म की अपेक्षा प्रबल धर्म यही है कि भरत को राज्य दिया जाय। पूर्वोक्त वैदिक वचनों और श्रीभागवत के अनुसार जब राजा यज्ञों में अपना राज्य ब्राह्मणों में प्रदान कर सकता है और श्रीराम ने भी वैसा ही किया था। तब राजा को सुतरां कनिष्ठ पुत्र को राज्य देने का अधिकार तो है ही तो भी यहाँ किसी राग और द्वेष के वशीभूत होकर नहीं, किन्तु सत्य की रक्षा के लिए कैकेयी की माँग को पूर्ण करना ही इस समय का सबसे बड़ा धर्म है। महाराज ने यह सब अपनी इच्छा के विरुद्ध शुद्ध धर्म-पालन के लिए ही अपने प्रिय प्राणों का बलिदान कर के भी किया था। तभी वसिष्ठ और भरद्वाज दोनों ही उस समय के प्रख्यात महर्षियों ने उसका समर्थन किया।