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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८१२ रामायणमीमांसा एकविंश "परसुराम पितु आज्ञा राखी। मारी मात लोक सब साखी ।। तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ।।" (रा० मा० २।१७२।४) ऊँची धर्मनिष्ठा में आज्ञा सर्वोपरि धर्म है। क्या इन दोनों पङ्क्तियों का कोई भी आस्तिक खण्डन कर सकता है ? तभी तो वसिष्ठ ने कहा कि- "अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पित बयन । ते भाजन सुख सुजसु के बसहिं अमरपति अयन ।।" (रा० मा० २।१७३ ) श्रीभरतजी का उनके वचनों पर शङ्का करना तो दूर उन्होंने तो और भी बढ़कर कहा कि- “गुरु पित मात स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भल जानी ।। उचित कि अनुचित किये विचारू । जाई धर्म सिर पातक भारू ।।" (रा०मा० १।१७५।२) परन्तु महाराज की आज्ञा को तो अनुचित कहा ही नहीं जा सकता। कहीं भी और मानस में भी किसी ने भी अनुचित नहीं कहा। लखनलाल ने जो कुछ कहा था; उसे श्रीराम ने उनका लड़कपन या भावावेश मानकर सुमन्त्र से उसे न कहने का ही आग्रह किया था । श्रीभरद्वाज भी वही कहते हैं जो श्रीवसिष्ठ ने कहा था कि- "लोक वेद सम्मत सब कहई । जेहि पित देइ राज सो लहई ।।" (रा० मा० २।२०५।४) वसिष्ठ की तरह ही वह भी कहते हैं कि- करतेहु राज त तुम्हहि न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ॥” (रा० मा० २।२०५।४) महाराज दशरथ में भरद्वाज भी कोई दोष नहीं देखते हैं । वे दशरथ की प्रशंसा करते हैं- “दशरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिक कहा जेहिं सम जग नाहीं ।।" (रा०मा० २।२०७।४) “जासु सनेह सकोच बस राम प्रकट भये आइ । जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नाहिं अघाइ ।।" ( रा० मा० २।२०८ ) भरद्वाज का स्पष्ट ही कहना है कि लोक वेद सबकी यही सम्मति है कि पिता जिसको राज्य देता है वही पाता है। ययाति ने ही ज्येष्ठ पुत्र यदु को राज्य नहीं दिया, किन्तु छोटे पुत्र पूरु को ही राज्य दिया। दायभाग के अनुसार उपरमस्वत्ववाद चलता है, जिसमें पिता के मरने पर ही पुत्र को अधिकार मिलता है। मिताक्षरा के अनुसार जन्मना स्वत्ववाद मान्य होता है। जिसके अनुसार जन्म से किं वा गर्भ में ही पुत्र को अपनी बपौती सम्पत्ति का अधिकार होता है । उसके अनुसार पिता पुत्र की सम्मति के बिना मौसी सम्पत्ति का दान, विक्रय, वितरण कुछ भी नहीं कर सकता है। परन्तु यह नियम सामान्य जनों के लिए ही है। राजाओं के नियम उनसे पृथक् होते हैं। इसी लिए सामान्य सम्पत्तियों के समान राज्य का बँटवारा नहीं होता है। सामान्यतया ज्येष्ठ का ही राज्य में अधिकार होता है। वह अपना राज्य किसी को भी दान कर सकता है किसी भी पुत्र को दे सकता है। सामान्य नियम के अनुसार दशरथजी पहले श्रीराम को ही राज्य देना चाहते थे। परन्तु पूर्वदत्त वरदान के अनुसार सत्य वचन से बद्ध होने के कारण उन्हें अपना मन बदलना पड़ा। अपनी स्वाभाविक इच्छा को रोककर शास्त्र और सत्य के अनुसार उन्होंने कैकेयी की इच्छापूर्ति की।