भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 888, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 888

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८११ भक्तिशास्त्र की दृष्टि से रामप्रेम में श्रीरामविरहाग्नि से प्राणप्रयाण स्वयं में परमपुरुषार्थ है और उनके द्वारा माँगे हुए अन्तिम वरदान के रूप में उन्हें मिला था। दशरथजी ने प्रभु से वरदान माँगा था— “सुतबिषयक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहिं अधीना॥ हे नाथ ! पुत्रवात्सल्यरूप अभङ्ग प्रीति मुझे प्राप्त हो भले कोई (पण्डितम्मन्य तथोक्त कथाकार) मुझे मूढ़ भी क्यों न कहें। जैसे मणिधर नाग का जीवन मणि बिना जीवित नहीं रहता, जल बिना मीन जीवित नहीं रहता, उसी प्रकार मेरा जीवन आपके अधीन रहे। अर्थात् आपके मुखचन्द्र-दर्शन के बिना मेरा जीवन नहीं ही रहना चाहिए। धर्म रूढ़िगत वाक्यों से नहीं वेद-वाक्यों से सिद्ध होता है। गुरुदेव ने कहीं भी रूढ़िगत वाक्यों की दुहाई नहीं दी थी। "मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव" (तै० उ० १।११।२), "मातृमान् पितृमान् आचार्यवान्” (बृ० उ० ४।१।५) ये वेदवाक्य हैं। रूढ़िगत वाक्य नहीं। पिता जिसे देता है वही राज्य पाता है, यह भी रूढ़ि- वाक्य नहीं। शतपथादि वाक्यों से तथा श्रीभागवत के वाक्य से सिद्ध है, यह कहा जा चुका। यदि पिता किसी ब्राह्मण को होता और अध्वर्यु को राज्य दे देता है तो वह भी राज्य पा जाता है, फिर यदि छोटे पुत्र को राज्य दे दे तो वह क्यों नहीं पायेगा ? पुत्र को आज्ञा देता हुआ पिता स्वयं पितृत्व में आरूढ़ है या नहीं ? यह कथन तो नास्तिकता और अव्य- वस्था फैलानेवाला है। इस तरह तो किसी भी धर्म का अनुष्ठान ही असंभव होगा। यदि पत्नी कहे कि पति ठीक हो तो हम पतिव्रता रहेंगी। पति कहे कि पत्नी ही पतिव्रता हो तो तब हम ठीक पति बनेंगे। पुत्र कहे पिता ही योग्य पिता हो तब हम ठीक पुत्र बनेंगे। पिता कहे कि पुत्र ठीक हो तब हम ठीक पिता बनेंगे तो क्या संसार का व्यवहार चल सकेगा ? धर्म-पालन शर्तों के साथ नहीं होता। विधायक वचन भी ऐसी कोई शर्त नहीं रखते हैं, प्रत्येक के लिए विधान है। जो विधान का पालन करेगा वही ईश्वर का अनुग्राह्य होगा। इस प्रकार के धर्म आपसी समझौते पर आधारित नहीं, किन्तु ईश्वरीय विधानों पर ही आधारित हैं। जो पिता अपना कर्तव्य नहीं पालन करेगा वह कर्म के अनुसार फल पायेगा। जो पुत्र अपना कर्तव्य पालन करेगा वह अपने कर्तव्य का फल पायेगा। इतना ही नहीं यह भी संभव होता है कि पुत्र अपना कर्तव्य पालन करके पिता का ही नहीं अनेक पीढ़ियों का भी कल्याण कर लेता है। साध्वी पतिव्रता पत्नी पातिव्रत धर्म के पालन से अपने दुराचारी पति का भी कल्याण करती है। प्रकृत में तो ऐसा कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। महाराज दशरथ के लिए शराबी स्वामी का दृष्टान्त नहीं दिया जा सकता। उन्हें आवेशजन्य भावनाग्रस्त उन्मादी भी नहीं कहा जा सकता। उन्हें काम, क्रोध या ममता से ग्रस्त उन्मादी भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में उनकी आज्ञा को स्वीकार करने में धर्म का उपहास ही होगा, यह कैसे कहा जा सकता है ? यद्यपि सामान्यतया धर्म-पालन में विवेक की आवश्यकता होती है। जिससे आज्ञा देनेवाले और आज्ञा- पालन करनेवाले दोनों ही के लिए भी खतरा उपस्थित हो सकता हो वहाँ आज्ञा देनेवाले को स्वस्थ सावधान करना भी आवश्यक हो सकता है तथापि कई अवस्थाओं में आज्ञापालन का ही महत्त्व उत्कृष्ट होता है जैसा कि पीछे कहा गया है—