रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१० रामायणमीमांसा एकविंश इस तरह संक्षिप्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि भरतजी के मन में वैसी कोई बात नहीं थी, जिसको लेखक ने उठाया है। श्रीभरत ऐसा प्रश्न कभी कर ही नहीं सकते थे— "धर्म क्या है ? क्या महाराज ने राघवेन्द्र को वन भेजकर धर्म की उचित रक्षा की है.........यह कैसा धर्म जिसने अपने पालन करनेवाले का ही प्राण ले लिया । सारी प्रजा अनाथ हो गयी । राघवेन्द्र को वन जाना पड़ा, फिर यह धर्म किस कल्याण की सृष्टि करनेवाला है ।" भरतजी तो धर्म के परम फल साक्षात् भगवत्प्रेम के मूर्त रूप हैं। कोई सामान्य आस्तिक भी ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता है। सभी आस्तिक जानते हैं कि- "न सुखाल्लभते सुखम्" सुख से सुख नहीं मिलता। धर्म के आचरण में कठिनाइयाँ होती हैं। श्रीराम ने ही कहा है कि— "सिबि दधीचि हरिचन्द नरेसू । सहेउ धर्महित कोटि कलेसू ॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरम धरेउ सहि संकट नाना ॥" (रा०मा० २।९४।२) शिबि ने धर्म-रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काट काट कर कपोत के बराबर तराजू पर तौल तौल कर प्रदान किया था। हरिश्चन्द्र ने धर्म के लिए क्या क्या दुःख नहीं भोगा । दधीचि ने तथा स्वयं श्रीराम ने, धर्मराज युधिष्ठिर ने एवं राजा नल ने धर्म-रक्षण के लिए कितने ही कष्ट झेले हैं। हर एक तपस्या से कृच्छ्र, चान्द्रायण, पराक आदि व्रतों में भी तो प्रथम कष्ट ही होता है। विशेषतया ब्राह्मण के लिए तो तपोमय जीवन ही आदरणीय होता है— "ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । कृच्छ्राय तपसे चैव प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥" इसी लिए तो— "तपबल बिप्र सदा बरियारा ।" ( रा० मा० १।१६४।२ ) कहा गया है। "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ॥" ( गीता १८।३७ ) जो पहले विषतुल्य प्रतीत होता है और परिणाम में अमृतमय होता है। वही तो सात्त्विक सुख कहा जाता है। महाराज दशरथ की वसिष्ठ महर्षि जैसे महापुरुष प्रशंसा कर रहे हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि महाराज दशरथ के समान न कोई हुआ है, न है, न होनेवाला है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी महाराज दशरथ की महिमा गाते हैं— "बिधि हरि हर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दशरथ गुन गाथा ॥" (रा०मा० २।२४१।४) ये सब बातें वे वसिष्ठजी बोल रहे हैं जिनके लिए गोस्वामीजी कहते हैं— "बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।" ( रा० मा० २।१७१।४ ) तुलसी की दृष्टि से तो महाराज दशरथ धन्य धन्य हैं— "जियन मरन फल दशरथ पावा । अंड अनेक अमल जस छावा ॥ जियत राम बिधु बदन निहारा । रामबिरह करि मरन सँवारा ॥