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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 886

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०९ “राममात सुठि सरलचित मोपर प्रेम बिशेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।” (रा० मा० २।१८०) श्रीगुरुजी महाराज तो विवेक के समुद्र हैं। सम्पूर्ण विश्व जिनके लिए करतलगत बदर (बैर) के समान हैं। पर वे भी मुझे राजतिलक देने की बात करते हैं। वास्तव में विधाता के विमुख होने से ही सब मुझसे विमुख हो गये हैं। भरत को लगता है, ये सब लोग मेरे मन में राज्य करने की लालसा जानकर ही ऐसा कहते होंगे। इनके मन में यह भी होगा कि भरत की भी राम के वनगमन और राज्य पाने की भीतरी सहमति जरूर होगी। परन्तु एक सीताराम को छोड़कर कौन मानेगा कि मेरा वैसा मत नहीं है— “गुरु बिबेकसागर जग जाना। जिनहिं विश्व करबदर समाना॥ मो कहूँ तिलक साज सज सोऊ। भये विधि विमुख विमुख सब कोऊ॥ परिहरि रामसीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥” (रा०मा० २।१८०।१,२) “आपनि दारुन दीनता कहहूँ सबहिं सिर नाय। देखे बिन रघुनाथपद जिय कै जरनि न जाय॥” (रा० मा० २।१८१) “आन उपाय मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिन बूझा॥ यद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारण सकल उपाधी!। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा विसेषी॥ सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक यद्यपि बामा॥” (रा०मा० २।१८१।१-३) आप सब लोग आज्ञा और आशीर्वाद दें जिससे मेरी विनय सुनकर राम पुनः राजधानी में आ जायँ। यद्यपि कैकेयी जैसी कुमाता से मेरा जन्म हुआ है और मैं अच्छी तरह सदोष हूँ तो भी अपना जानकर श्रीराम मुझे त्यागेंगे नहीं, ऐसा मुझे श्रीरघुवर पर दृढ़ भरोसा है। सरल, दुस्तर्करहित और आक्षेपरहित भरतजी के वचन सबको ही ऐसे प्रिय लगे जैसे रामसनेहसुधा से पगे हों— “भरतबचन सब कहँ प्रिय लागे। रामसनेहु सुधा जनु पागे॥” (रा० मा० २।१८२।१) माताएँ, सचिव तथा गुरुदेव और सभी पुरवासी नरनारी परम स्नेह में विकल हो उठे और सभी भरत की भूरि-भूरि सराहना करते हैं— “भरतहि कहहिं सराहि सराही। रामप्रेम मूरति तनु आही॥” तात भरत अस काहे न कहहू। प्रानसमान रामप्रिय अहहू॥ जो पाँवरु अपनीं जड़ताईं। तुम्हहि सुगाइ मातकुटिलाई॥ सो सठ कोटिक पुरुष समेता। बसहि कलप सत नरकनिकेता॥ (रा०मा० २।१८२।२-४) भरत, तुम तो साक्षात् राम के मूर्तिमान् प्रेम ही हो। कोई पामर प्राणी अपनी जड़ता से ही तुम्हारे प्रति कुटिलता की शङ्का कर सकता है। जो माता की कुटिलता तुममें आरोप करेगा वह तो अपनी कोटि पीढ़ियों के साथ सैकड़ों कल्प तक नरक में रहेगा। जैसे सर्प में रहती हुई भी मणि सर्प के अघ और अवगुण को नहीं ग्रहण करती। किन्तु वह गरल के दुःख और दरिद्रता की दाहक ही होती है। वैसे ही आप कैकेयी से उत्पन्न होने पर भी उसके कुटिलता आदि दोषों से मुक्त हैं। अज्ञान, भगवद्वैमुख्य आदि दोषों को दहन करनेवाले हैं। १०२

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