रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०८ रामायणमीमांसा एकविंश सरुज शरीर बादि बहु भोगा । बिन हरि भगति जायं जप जोगा ॥ जायं जीव बिन देह सुहाई । बादि मोर सब बिन रघुराई ॥”(रा०मा० २।१७६।२,३) सचमुच भरत के इन वचनों में उनके सरल निष्कपट हृदय का भाव व्यक्त हुआ है । उसमें किसी पर आक्षेप नहीं है और किसी पर कटाक्ष भी नहीं है। वे अन्त में यही कहते हैं कि— “जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आंक मोर हित एहू ॥” ( रा० मा० २।१७६।४ ) मेरी इच्छा, मेरी अभिरुचि यही है कि मैं राम के पास जाऊँ । उनकी शरण ग्रहण-ही मेरा सब कुछ है । यदि आप मुझे राजा बनाकर अपना और प्रजा का कल्याण चाहते हैं तो मैं यही कहूँगा कि आप स्नेहमयी विभोरता के कारण ही ऐसा कह रहे हैं— “मोहि नृप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥” (रा० मा० १।१७६।४) “कैकेयी सुअ कुटिलमति रामबिमुख गतलाज । तुम्ह चाहत सुख मोहबस मोहि से अधम के राज ॥” ( रा० मा० २।१७७ ) “कहउँ साँच सब सुनि पतिआहू । चाहिय धर्मशील नरनाहू ॥ मोहिं राज हठि देहहु जहहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥ मोहि समान को पापनिवासू । जेहि लगि सीय राम बनवासू ॥”(रा० मा० २।१७७।१,२) ये सब बातें यद्यपि वस्तुस्थिति के अनुगुण नहीं हैं तथापि लोकोत्तर रामभक्त भरत के मन में दीनता वश ऐसी ही प्रतीति हो रही है। यह दीनता भक्तों का असाधारण लक्षण है ही । “मो सम कौन कुटिल खल कामी” यह भी तो एक भक्त के मन की बात है । इस प्रकार अपनी दीनता को प्रकट करते हुए भरतजी कहते हैं—कोई मनुष्य भूतादि ग्रहों से गृहीत हो । उसपर भी बिच्छू ने डङ्क मार दिया हो । उसपर भी उसको वारुणी पिला देना क्या उपचार है ? “ग्रहगृहीत पुनि बातबस तेहि पुनि बीछी मार । तेहि पिलाइय बारुनी कहहु काह उपचार ॥” ( रा० मा० २।१७९ ) इस दारुण दशा में वे राज्य देने की बात को अपने लिए वारुणी-पान के तुल्य समझते हैं । भरतजी कहते हैं कि वास्तव में चतुर विरञ्चि ने मुझे कैकेयी के योग्य समझकर ही मुझे उसका पुत्र बनाया है । परन्तु इसके साथ मुझे श्रीदशरथ का पुत्र और श्रीराम का लघु भ्राता होने का गौरव प्रदान किया है, यह तो व्यर्थ ही है— “दशरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि विधि बादि बड़ाई ॥” ( रा० मा० २।१७९।१ ) उसपर भी आप लोग मुझे राजसिंहासन देना चाहते हैं । मैं कैसे किस-किस को क्या उत्तर दूँ । भला मुझे छोड़कर चराचर प्रपञ्च में कौन ऐसा है जिसे श्रीसीताराम प्राण के समान प्रिय नहीं हैं । “मो बिन को सचराचर माहीं । जेहि सिय राम प्राणप्रिय नाहीं ॥” ( रा० मा० २।१७९।३ ) श्रीकौशल्या अम्बा तो सरलचित्त हैं । मुझपर तो उनका सदा ही विशेष प्रेम है । वह मेरी दीनता देखकर स्वाभाविक स्नेह से मुझे राज्य करने को कहती हैं—