रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये सब बचन निष्कपट भरत जैसे परम भक्त की उक्ति हैं। वह आज के लोगों जैसी कपटपूर्ण कोई पालसी नहीं कही जा सकती । भरत के वचन में सरलता है कोई कौटल्य नहीं है । वसिष्ठादि के वचनों में उन्हें कोई दोष नहीं दिखाता है । उनके वचनों से वसिष्ठ के उपदेश का समर्थन मिलता है । परन्तु भरतजी यह जानते ही हैं कि गुरुदेव के वचन का स्पष्ट ही अभिप्राय यह नहीं है कि यदि मैं राज्य न करूंगा तो पापी बन जाऊँगा । हाँ, राज्य करूँगा तो दोष का भागी न बनूँगा । परन्तु जिसमें पुत्र को स्वतः राग हो वही पिता की आज्ञा भी हो तो उसके पालन में क्या कठिनाई है ? कठिनाई तो वहाँ होती है जहाँ पिताजी राज्यत्याग की आज्ञा देते हों । प्रकृत में सारी कठिनाई तो राम के सामने थी । उनका राज्य में स्वाभाविक अधिकार था । पिताजी भी उन्हें राज्य देना चाहते थे । पर माता कैकेयी ने पिताजी का कभी प्राण बचाया था। उन्होंने प्रसन्नता से उन्हें वरदान माँगने को कहा था। माता कैकेयी ने कहा कभी माँग लूंगी। उसके अनुसार उन्होंने राम को वनवास और मेरे लिए राज्य की मांग की। पिताजी ने सत्य-पालन की दृष्टि से उनकी माँग स्वीकार कर ली। मेरे लिए उन्होंने राज्य दे दिया । उनका वचन पूरा हो गया। मैं न लूं इससे उनकी सत्यनिष्ठा में, सत्य-पालन में कोई फरक नहीं पड़ता । वे राम को वनवास की आज्ञा न देते या मुझे राज्य न देते तो सत्य वचन में बाधा पड़ सकती थी । श्रीवसिष्ठजी पिताजी के द्वारा कैकेयी को दिये हुए वर प्रदान के अनुसार तथा श्रीराम और सीता के अभिप्राय के अनुसार, सचिवों, प्रजाओं तथा कौशल्या के अभिप्राय के अनुसार मुझसे राज्य करने के लिए कहते हैं । परन्तु श्रीभरतजी भगवान् राम के अनन्य निःस्पृह धर्मनिष्ठ भक्त थे। उन्होंने बड़ी नम्रता से कहा— "तुम्ह तो देहु सरल सिख सोई। जो आचरण मोर भल होई।।" (रा० मा० २।१७५।३) यद्यपि इस बात को मैं समझता हूँ तथापि मेरे हृदय को इससे सन्तोष नहीं होता । कृपा कर मेरी प्रार्थना सुन ली जाय तब मेरे योग्य उपदेश किया जाय । मैं उत्तर देता हूँ मेरे अपराध को क्षमा करें, क्योंकि साधु पुरुष दुःखित व्यक्ति के दोषों पर ध्यान नहीं देते— "यद्यपि यह समुझत हउँ नीके । तदपि होत परितोष न जी के ।। अब तुम्ह बिनय मोर सुन लेहू । मोहि अनुहरत सिखावन देहू ।। उत्तर देहुं छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू । (रा०मा० २।१७५।३,४) श्रीभरतजी लेखक के द्वारा उठाये हुए किसी तर्क की बात नहीं करते । वे तो अपनी निष्ठा और अभिरुचि को ही सरलता से कह देते हैं— “पितु सुरपुर सियराम बन करन कहहु मोहिराज । एहि ते जानहु मोर हित कै आपन बड़काज ।।" ( रा० मा० १।१७६ ) पिताजी देवलोक चले गये । श्रीसीता-राम वन चले गये । आप लोग मुझे राज्य करने को कहते हैं क्या यह मेरा हित है ? या इससे आप लोगों का कोई बड़ा काम बनेगा ? जिसको राज्य चाहिए, उसके लिए आप लोगों की बात ठीक ही है । मेरी अपनी दृष्टि में परमहित है सीतापति राम की सेवकाई । परन्तु माँ की कुटिलता के कारण मेरे उस हित का अपहरण हो गया। मैं अच्छी तरह देख रहा हूँ, मेरा हित अन्य प्रकार से नहीं है । "सोकसमाज राज केहि लेखे । लखन राम सिय बिन पद देखे ।। बादि बसन बिनु भूषनभारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ।।