भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 883

८०६ रामायणमीमांसा एकविंश के अनुसार श्रीराम ने भी अश्वमेधयज्ञ में ऐसा ही दान किया था। "भगवानात्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकैः । सर्वदेवमयं देवमीज आचार्यवान् मखैः ॥" (भाग० ९।११।१) भगवान् श्रीराम ने आचार्यवान् होकर उत्तम कल्पवाले यज्ञों से सर्वदेवमय आत्मा का ही यजन किया। "होत्रेऽदाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः । अध्वर्यवे प्रतीचीं तु उदीचीं सामगाय सः ॥ आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा । मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः ॥" (भाग० ९।११।२,३) श्रीराम ने होता को प्राची दिशा प्रदान कर दी, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा, अध्वर्यु को प्रतीची तथा उद्गाता को उदीची दिशा प्रदान कर दी। मध्य की सब भूमि आचार्य को प्रदान कर दी। महारानी वैदेही ने भी मङ्गलसूत्र के अतिरिक्त सम्पूर्ण अलङ्कारादि प्रदान कर दिये थे— "तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमङ्गल्यावशेषिता।" (भाग० ९।११।४) अतः राजा चाहे तो छोटे पुत्र को भी राज्य दे ही सकता है। वसिष्ठ ने कहा कि यह सुनकर श्रीराम और वैदेही भी प्रसन्न होंगे और कोई भी इसे अनुचित नहीं कहेगां— सुनि सुख लहब राम वैदेही। अनुचित कहब न पंडित केही।" (रा० मा० २।१७३।३) कौशल्यादि माताएँ भी प्रसन्न होंगी। वे सभी प्रजा के सुख से सुखी होंगी। श्रीराम आपके हृदय को जानते हैं। वे सब तरह से तुम्हारी भलाई मानते हैं। जब राम आयेंगे तो उनका राज उन्हें सौंपकर सब प्रकार की सेवा करना। श्रीवसिष्ठ का उक्त कथन में कोई विशेष तर्क नहीं है, जिसको उनकी तर्कप्रणाली कहा जाय। तर्क या कुतर्क तो लेखक का ही है, जो शास्त्रविरुद्ध है, मनमानी है। वसिष्ठजी जिस सभा में बैठकर यह उपदेश कर रहे थे उसमें बड़े बड़े विद्वान् बैठे थे। धर्मज्ञ मन्त्रिमण्डल तथा कौशल्या आदि माताएँ उपस्थित थीं। मन्त्रियों ने भी वसिष्ठ के उपदेश का समर्थन किया— "कीजिय गुरु आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आये उचित जस तब तस करिय बहोरि ॥" (रा० मा० २।१७४) श्रीकौशल्याजी ने भी कहा— "पूत पथ्य गुरु आयसु अहई ॥" (रा० २।१७४।१) श्रीभरतजी ने स्पष्ट कहा कि— "मोहि उपदेस दीन्ह गुरु नीका । प्रजा सचिव सम्मत सब ही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहिए कीन्हा ॥ गुरु पितु मातु स्वामी हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किये विचारू । धरम जाइ सिर पातक भारू ॥"