भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 882, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 882

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०५ श्रीदशरथ परम भक्त तो थे ही तभी तो राम के विरहाग्नि में उन्होंने प्राणों को त्याग दिया । इस दृष्टि से दशरथ के तुल्य दशरथ ही हैं। दूसरा कोई उदाहरण नहीं । श्रीराम के विरह में उन्होंने प्राणों को तृण के तुल्य छोड़ दिया। उनमें किसी प्रकार के काम, क्रोध, लोभ या ममता की कल्पना कर के सुरापायी का दृष्टान्त देकर उनकी आज्ञा को उपेक्ष्य कहना आस्तिकता है या नास्तिकता ? समझदार समझें । "नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना ।।" ( रा० मा० २।१७२।३ ) में दो मत हो ही नहीं सकते। श्रीराम तथा भरत किसी ने भी वसिष्ठ की उक्त बातों का विरोध नहीं किया । बल्कि सभी ने किसी न किसी रूप में उन्हें दुहराया ही है । वसिष्ठ ने श्रीभरत के लिए भी राज करने में दोष नहीं है यही कहा है । काम करना ही चाहिये । राजा न बनने में अमुक अमुक दोष हैं या पाप लगेगा यह वसिष्ठजी ने कभी भी नहीं कहा है, क्योंकि राज करना तो रागप्राप्त ही था । कैकेयी ने भरत के हितार्थ ही वैसा वरदान माँगा था। यदि राम के वनगमन का वरदान न माँगा जाता तो उसके देने में कोई कठिनाई नहीं थी। राम के वनवास न देने से ही वचनभङ्ग का दोष उपस्थित हो सकता था । भरत को राज दे देने पर भी यदि भरत राज स्वीकार नहीं करते तो इसमें श्रीदशरथ के वचनभङ्ग का प्रसङ्ग ही नहीं उपस्थित होता । माता कैकेयी भी इस सम्बन्ध में चक्रवर्ती को दोषी नहीं ठहरा सकती थी । इसलिए वसिष्ठ ने अनेक दृष्टान्तों से यही कहा था कि यदि भरत राज करते हैं तो इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि पिता की आज्ञा से अनुचित काम करने पर भी परशुराम आदि को कोई दोष नहीं लगा था। यद्यपि बड़े भाई के रहते हुए छोटे भाई का राजा होना अनुचित है, फिर भी पिता की आज्ञा के अनुसार राजा बनने में भरत को कोई दोष नहीं है । "करहु तात पितु वचन प्रमाना । करहु सीस धरि भूपरजाई । हुइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥ परसुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥ तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ॥ ( रा० मा० २।१७२।३,४ ) क्या महामति लेखक परशुराम और पुरु को पापी कहना चाहता है ? "अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पितु बयन । ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपुर अयन ॥" ( रा० मा० २।१७३ ) उक्त वचन भी निर्विवाद है । श्रीराम, भरत तथा जनक आदि कोई भी उस परम तथ्य का विरोध कैसे कर सकता है ? "सुरपुर नृप पावहिं परितोषू । तुम्ह कहँ सुकृत सुजस नहि दोषू । बेदबिदित सम्मत सब ही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥" (रा० मा० १७३।१,२) अगर इन बातों में किसी को कोई भी आपत्ति होती तो चित्रकूट में कोई भी इसके विरोध में आवाज उठा सकता था। यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है फिर भी राजा चाहे तो अन्य को भी राज्य दे सकता है । तभी तो यज्ञों में राजा सर्वस्वदान कर सकता है। शतपथश्रुति में भी राजा अध्वर्यु, होता, उद्गाता, ब्रह्मा आदि के लिए सम्पूर्ण राज्य के प्राची आदि दिशाओं का दान कर देता है। जब अध्वर्यु आदि राज्य स्वीकार नहीं करते तब उसके बदले में राजा उनको बहुतसा धन प्रदान करता है । श्रीभागवत