भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 881

८०४ रामायणमीमांसा एकविंश “सोचयोग दशरथ नृप नाहीं। सोचिय बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धर्म बिषय लवलीना ॥ सोचिय नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना ॥ सोचिय बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि प्रिय भगति सुजानू ॥ सोचिय सूद्र बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ज्ञानगुमानी ॥ सोचिय पुनि पतिबंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥ सोचिय बटु निज ब्रत परिहरई । जो नहि गुरु आयसु अनुसरई ॥ सोचिय गृही जो मोह बस करइ करमपथ त्याग। सोचिय यती प्रपंचरत बिगत बिबेक बिराग ॥ बैखानस सोइ सोचन जोगू । तप बिहाइ जेहि भावहि भोगू ॥ सोचिय पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुरु बंधु विरोधी ॥ सब विधि सोचिय पर अपकारी। निज तन पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सब ही बिधि सोई। जो न छाड़ि छल हरिजन होई ॥ सोचनीय नहिं कोसल राऊ। भुवन चारि दस प्रकट प्रभाऊ ॥” ( रा० मा० २।१७०।२ से १७१।३ तक ) श्रीवसिष्ठजी की एक एक पंक्ति धर्मशास्त्र, सन्त और शिष्ट सम्मत है। “भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥ विधि हरिहर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुनगाथा ॥” (रा०मा० २।१७१।४) क्या ये बातें मिथ्या हैं ? आश्चर्य है अपने आप को एक मानसवक्ता होने का दावा करनेवाला इन तथ्यों को झुठलाने का साहस करता है— “कहहु तात केहि भाँति कोउ करइ बड़ाई तासु । राम लखन तुम्ह शत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥” ( रा० मा० २।१७२ ) उक्त बातें स्वतःसिद्ध जैसी हैं। जो राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म, तद्रूप ही लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जो हिरण्यर्भ, तुरीय अव्याकृत, तुरीय विराट् एवं तुरीय रूप हैं। वे सब जिनके पुत्र के रूप में प्रकट हैं उन दशरथ की तुलना में किसी शराबी या क्रोधी और कामी को उपस्थित करना कितना बड़ा पाप है। “सब प्रकार भूपति बड़भागी” । ( रा० मा० २।१७२।१ ) लेखक अपने ज्ञान गुमान में उन्मत्त होकर श्रीराम के पिता का ही नहीं, राम के गुरु वसिष्ठ एवं राम के गुरु विश्वामित्र तथा श्रीराम के पूर्वज हरिश्चन्द्र की भी छीछ,लेदर करता है । महर्षि वसिष्ठ धर्मसम्मत ही बात करते हैं। श्रीभरत को उपदेश करते हैं— “सिर धरि राजरजायसु करहू ।” ( रा० मा० २।१७२।१ ) राजा ने तुमको राज दिया है। उनके वचन को सत्य बनाना तुम्हारा कर्तव्य है। “तजे राम जेहि बचनहिं लागी । तन परिहरेउ राम बिरहागी ॥” ( रा० मा० २।१७२।२ )