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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

८०४ रामायणमीमांसा एकविंश “सोचयोग दशरथ नृप नाहीं। सोचिय बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धर्म बिषय लवलीना ॥ सोचिय नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना ॥ सोचिय बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि प्रिय भगति सुजानू ॥ सोचिय सूद्र बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ज्ञानगुमानी ॥ सोचिय पुनि पतिबंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥ सोचिय बटु निज ब्रत परिहरई । जो नहि गुरु आयसु अनुसरई ॥ सोचिय गृही जो मोह बस करइ करमपथ त्याग। सोचिय यती प्रपंचरत बिगत बिबेक बिराग ॥ बैखानस सोइ सोचन जोगू । तप बिहाइ जेहि भावहि भोगू ॥ सोचिय पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुरु बंधु विरोधी ॥ सब विधि सोचिय पर अपकारी। निज तन पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सब ही बिधि सोई। जो न छाड़ि छल हरिजन होई ॥ सोचनीय नहिं कोसल राऊ। भुवन चारि दस प्रकट प्रभाऊ ॥” ( रा० मा० २।१७०।२ से १७१।३ तक ) श्रीवसिष्ठजी की एक एक पंक्ति धर्मशास्त्र, सन्त और शिष्ट सम्मत है। “भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥ विधि हरिहर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुनगाथा ॥” (रा०मा० २।१७१।४) क्या ये बातें मिथ्या हैं ? आश्चर्य है अपने आप को एक मानसवक्ता होने का दावा करनेवाला इन तथ्यों को झुठलाने का साहस करता है— “कहहु तात केहि भाँति कोउ करइ बड़ाई तासु । राम लखन तुम्ह शत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥” ( रा० मा० २।१७२ ) उक्त बातें स्वतःसिद्ध जैसी हैं। जो राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म, तद्रूप ही लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जो हिरण्यर्भ, तुरीय अव्याकृत, तुरीय विराट् एवं तुरीय रूप हैं। वे सब जिनके पुत्र के रूप में प्रकट हैं उन दशरथ की तुलना में किसी शराबी या क्रोधी और कामी को उपस्थित करना कितना बड़ा पाप है। “सब प्रकार भूपति बड़भागी” । ( रा० मा० २।१७२।१ ) लेखक अपने ज्ञान गुमान में उन्मत्त होकर श्रीराम के पिता का ही नहीं, राम के गुरु वसिष्ठ एवं राम के गुरु विश्वामित्र तथा श्रीराम के पूर्वज हरिश्चन्द्र की भी छीछ,लेदर करता है । महर्षि वसिष्ठ धर्मसम्मत ही बात करते हैं। श्रीभरत को उपदेश करते हैं— “सिर धरि राजरजायसु करहू ।” ( रा० मा० २।१७२।१ ) राजा ने तुमको राज दिया है। उनके वचन को सत्य बनाना तुम्हारा कर्तव्य है। “तजे राम जेहि बचनहिं लागी । तन परिहरेउ राम बिरहागी ॥” ( रा० मा० २।१७२।२ )

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०५ श्रीदशरथ परम भक्त तो थे ही तभी तो राम के विरहाग्नि में उन्होंने प्राणों को त्याग दिया । इस दृष्टि से दशरथ के तुल्य दशरथ ही हैं। दूसरा कोई उदाहरण नहीं । श्रीराम के विरह में उन्होंने प्राणों को तृण के तुल्य छोड़ दिया। उनमें किसी प्रकार के काम, क्रोध, लोभ या ममता की कल्पना कर के सुरापायी का दृष्टान्त देकर उनकी आज्ञा को उपेक्ष्य कहना आस्तिकता है या नास्तिकता ? समझदार समझें । "नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना ।।" ( रा० मा० २।१७२।३ ) में दो मत हो ही नहीं सकते। श्रीराम तथा भरत किसी ने भी वसिष्ठ की उक्त बातों का विरोध नहीं किया । बल्कि सभी ने किसी न किसी रूप में उन्हें दुहराया ही है । वसिष्ठ ने श्रीभरत के लिए भी राज करने में दोष नहीं है यही कहा है । काम करना ही चाहिये । राजा न बनने में अमुक अमुक दोष हैं या पाप लगेगा यह वसिष्ठजी ने कभी भी नहीं कहा है, क्योंकि राज करना तो रागप्राप्त ही था । कैकेयी ने भरत के हितार्थ ही वैसा वरदान माँगा था। यदि राम के वनगमन का वरदान न माँगा जाता तो उसके देने में कोई कठिनाई नहीं थी। राम के वनवास न देने से ही वचनभङ्ग का दोष उपस्थित हो सकता था । भरत को राज दे देने पर भी यदि भरत राज स्वीकार नहीं करते तो इसमें श्रीदशरथ के वचनभङ्ग का प्रसङ्ग ही नहीं उपस्थित होता । माता कैकेयी भी इस सम्बन्ध में चक्रवर्ती को दोषी नहीं ठहरा सकती थी । इसलिए वसिष्ठ ने अनेक दृष्टान्तों से यही कहा था कि यदि भरत राज करते हैं तो इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि पिता की आज्ञा से अनुचित काम करने पर भी परशुराम आदि को कोई दोष नहीं लगा था। यद्यपि बड़े भाई के रहते हुए छोटे भाई का राजा होना अनुचित है, फिर भी पिता की आज्ञा के अनुसार राजा बनने में भरत को कोई दोष नहीं है । "करहु तात पितु वचन प्रमाना । करहु सीस धरि भूपरजाई । हुइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥ परसुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥ तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ॥ ( रा० मा० २।१७२।३,४ ) क्या महामति लेखक परशुराम और पुरु को पापी कहना चाहता है ? "अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पितु बयन । ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपुर अयन ॥" ( रा० मा० २।१७३ ) उक्त वचन भी निर्विवाद है । श्रीराम, भरत तथा जनक आदि कोई भी उस परम तथ्य का विरोध कैसे कर सकता है ? "सुरपुर नृप पावहिं परितोषू । तुम्ह कहँ सुकृत सुजस नहि दोषू । बेदबिदित सम्मत सब ही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥" (रा० मा० १७३।१,२) अगर इन बातों में किसी को कोई भी आपत्ति होती तो चित्रकूट में कोई भी इसके विरोध में आवाज उठा सकता था। यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है फिर भी राजा चाहे तो अन्य को भी राज्य दे सकता है । तभी तो यज्ञों में राजा सर्वस्वदान कर सकता है। शतपथश्रुति में भी राजा अध्वर्यु, होता, उद्गाता, ब्रह्मा आदि के लिए सम्पूर्ण राज्य के प्राची आदि दिशाओं का दान कर देता है। जब अध्वर्यु आदि राज्य स्वीकार नहीं करते तब उसके बदले में राजा उनको बहुतसा धन प्रदान करता है । श्रीभागवत

८०६ रामायणमीमांसा एकविंश के अनुसार श्रीराम ने भी अश्वमेधयज्ञ में ऐसा ही दान किया था। "भगवानात्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकैः । सर्वदेवमयं देवमीज आचार्यवान् मखैः ॥" (भाग० ९।११।१) भगवान् श्रीराम ने आचार्यवान् होकर उत्तम कल्पवाले यज्ञों से सर्वदेवमय आत्मा का ही यजन किया। "होत्रेऽदाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः । अध्वर्यवे प्रतीचीं तु उदीचीं सामगाय सः ॥ आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा । मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः ॥" (भाग० ९।११।२,३) श्रीराम ने होता को प्राची दिशा प्रदान कर दी, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा, अध्वर्यु को प्रतीची तथा उद्गाता को उदीची दिशा प्रदान कर दी। मध्य की सब भूमि आचार्य को प्रदान कर दी। महारानी वैदेही ने भी मङ्गलसूत्र के अतिरिक्त सम्पूर्ण अलङ्कारादि प्रदान कर दिये थे— "तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमङ्गल्यावशेषिता।" (भाग० ९।११।४) अतः राजा चाहे तो छोटे पुत्र को भी राज्य दे ही सकता है। वसिष्ठ ने कहा कि यह सुनकर श्रीराम और वैदेही भी प्रसन्न होंगे और कोई भी इसे अनुचित नहीं कहेगां— सुनि सुख लहब राम वैदेही। अनुचित कहब न पंडित केही।" (रा० मा० २।१७३।३) कौशल्यादि माताएँ भी प्रसन्न होंगी। वे सभी प्रजा के सुख से सुखी होंगी। श्रीराम आपके हृदय को जानते हैं। वे सब तरह से तुम्हारी भलाई मानते हैं। जब राम आयेंगे तो उनका राज उन्हें सौंपकर सब प्रकार की सेवा करना। श्रीवसिष्ठ का उक्त कथन में कोई विशेष तर्क नहीं है, जिसको उनकी तर्कप्रणाली कहा जाय। तर्क या कुतर्क तो लेखक का ही है, जो शास्त्रविरुद्ध है, मनमानी है। वसिष्ठजी जिस सभा में बैठकर यह उपदेश कर रहे थे उसमें बड़े बड़े विद्वान् बैठे थे। धर्मज्ञ मन्त्रिमण्डल तथा कौशल्या आदि माताएँ उपस्थित थीं। मन्त्रियों ने भी वसिष्ठ के उपदेश का समर्थन किया— "कीजिय गुरु आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आये उचित जस तब तस करिय बहोरि ॥" (रा० मा० २।१७४) श्रीकौशल्याजी ने भी कहा— "पूत पथ्य गुरु आयसु अहई ॥" (रा० २।१७४।१) श्रीभरतजी ने स्पष्ट कहा कि— "मोहि उपदेस दीन्ह गुरु नीका । प्रजा सचिव सम्मत सब ही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहिए कीन्हा ॥ गुरु पितु मातु स्वामी हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किये विचारू । धरम जाइ सिर पातक भारू ॥"

ये सब बचन निष्कपट भरत जैसे परम भक्त की उक्ति हैं। वह आज के लोगों जैसी कपटपूर्ण कोई पालसी नहीं कही जा सकती । भरत के वचन में सरलता है कोई कौटल्य नहीं है । वसिष्ठादि के वचनों में उन्हें कोई दोष नहीं दिखाता है । उनके वचनों से वसिष्ठ के उपदेश का समर्थन मिलता है । परन्तु भरतजी यह जानते ही हैं कि गुरुदेव के वचन का स्पष्ट ही अभिप्राय यह नहीं है कि यदि मैं राज्य न करूंगा तो पापी बन जाऊँगा । हाँ, राज्य करूँगा तो दोष का भागी न बनूँगा । परन्तु जिसमें पुत्र को स्वतः राग हो वही पिता की आज्ञा भी हो तो उसके पालन में क्या कठिनाई है ? कठिनाई तो वहाँ होती है जहाँ पिताजी राज्यत्याग की आज्ञा देते हों । प्रकृत में सारी कठिनाई तो राम के सामने थी । उनका राज्य में स्वाभाविक अधिकार था । पिताजी भी उन्हें राज्य देना चाहते थे । पर माता कैकेयी ने पिताजी का कभी प्राण बचाया था। उन्होंने प्रसन्नता से उन्हें वरदान माँगने को कहा था। माता कैकेयी ने कहा कभी माँग लूंगी। उसके अनुसार उन्होंने राम को वनवास और मेरे लिए राज्य की मांग की। पिताजी ने सत्य-पालन की दृष्टि से उनकी माँग स्वीकार कर ली। मेरे लिए उन्होंने राज्य दे दिया । उनका वचन पूरा हो गया। मैं न लूं इससे उनकी सत्यनिष्ठा में, सत्य-पालन में कोई फरक नहीं पड़ता । वे राम को वनवास की आज्ञा न देते या मुझे राज्य न देते तो सत्य वचन में बाधा पड़ सकती थी । श्रीवसिष्ठजी पिताजी के द्वारा कैकेयी को दिये हुए वर प्रदान के अनुसार तथा श्रीराम और सीता के अभिप्राय के अनुसार, सचिवों, प्रजाओं तथा कौशल्या के अभिप्राय के अनुसार मुझसे राज्य करने के लिए कहते हैं । परन्तु श्रीभरतजी भगवान् राम के अनन्य निःस्पृह धर्मनिष्ठ भक्त थे। उन्होंने बड़ी नम्रता से कहा— "तुम्ह तो देहु सरल सिख सोई। जो आचरण मोर भल होई।।" (रा० मा० २।१७५।३) यद्यपि इस बात को मैं समझता हूँ तथापि मेरे हृदय को इससे सन्तोष नहीं होता । कृपा कर मेरी प्रार्थना सुन ली जाय तब मेरे योग्य उपदेश किया जाय । मैं उत्तर देता हूँ मेरे अपराध को क्षमा करें, क्योंकि साधु पुरुष दुःखित व्यक्ति के दोषों पर ध्यान नहीं देते— "यद्यपि यह समुझत हउँ नीके । तदपि होत परितोष न जी के ।। अब तुम्ह बिनय मोर सुन लेहू । मोहि अनुहरत सिखावन देहू ।। उत्तर देहुं छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू । (रा०मा० २।१७५।३,४) श्रीभरतजी लेखक के द्वारा उठाये हुए किसी तर्क की बात नहीं करते । वे तो अपनी निष्ठा और अभिरुचि को ही सरलता से कह देते हैं— “पितु सुरपुर सियराम बन करन कहहु मोहिराज । एहि ते जानहु मोर हित कै आपन बड़काज ।।" ( रा० मा० १।१७६ ) पिताजी देवलोक चले गये । श्रीसीता-राम वन चले गये । आप लोग मुझे राज्य करने को कहते हैं क्या यह मेरा हित है ? या इससे आप लोगों का कोई बड़ा काम बनेगा ? जिसको राज्य चाहिए, उसके लिए आप लोगों की बात ठीक ही है । मेरी अपनी दृष्टि में परमहित है सीतापति राम की सेवकाई । परन्तु माँ की कुटिलता के कारण मेरे उस हित का अपहरण हो गया। मैं अच्छी तरह देख रहा हूँ, मेरा हित अन्य प्रकार से नहीं है । "सोकसमाज राज केहि लेखे । लखन राम सिय बिन पद देखे ।। बादि बसन बिनु भूषनभारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ।।

८०८ रामायणमीमांसा एकविंश सरुज शरीर बादि बहु भोगा । बिन हरि भगति जायं जप जोगा ॥ जायं जीव बिन देह सुहाई । बादि मोर सब बिन रघुराई ॥”(रा०मा० २।१७६।२,३) सचमुच भरत के इन वचनों में उनके सरल निष्कपट हृदय का भाव व्यक्त हुआ है । उसमें किसी पर आक्षेप नहीं है और किसी पर कटाक्ष भी नहीं है। वे अन्त में यही कहते हैं कि— “जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आंक मोर हित एहू ॥” ( रा० मा० २।१७६।४ ) मेरी इच्छा, मेरी अभिरुचि यही है कि मैं राम के पास जाऊँ । उनकी शरण ग्रहण-ही मेरा सब कुछ है । यदि आप मुझे राजा बनाकर अपना और प्रजा का कल्याण चाहते हैं तो मैं यही कहूँगा कि आप स्नेहमयी विभोरता के कारण ही ऐसा कह रहे हैं— “मोहि नृप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥” (रा० मा० १।१७६।४) “कैकेयी सुअ कुटिलमति रामबिमुख गतलाज । तुम्ह चाहत सुख मोहबस मोहि से अधम के राज ॥” ( रा० मा० २।१७७ ) “कहउँ साँच सब सुनि पतिआहू । चाहिय धर्मशील नरनाहू ॥ मोहिं राज हठि देहहु जहहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥ मोहि समान को पापनिवासू । जेहि लगि सीय राम बनवासू ॥”(रा० मा० २।१७७।१,२) ये सब बातें यद्यपि वस्तुस्थिति के अनुगुण नहीं हैं तथापि लोकोत्तर रामभक्त भरत के मन में दीनता वश ऐसी ही प्रतीति हो रही है। यह दीनता भक्तों का असाधारण लक्षण है ही । “मो सम कौन कुटिल खल कामी” यह भी तो एक भक्त के मन की बात है । इस प्रकार अपनी दीनता को प्रकट करते हुए भरतजी कहते हैं—कोई मनुष्य भूतादि ग्रहों से गृहीत हो । उसपर भी बिच्छू ने डङ्क मार दिया हो । उसपर भी उसको वारुणी पिला देना क्या उपचार है ? “ग्रहगृहीत पुनि बातबस तेहि पुनि बीछी मार । तेहि पिलाइय बारुनी कहहु काह उपचार ॥” ( रा० मा० २।१७९ ) इस दारुण दशा में वे राज्य देने की बात को अपने लिए वारुणी-पान के तुल्य समझते हैं । भरतजी कहते हैं कि वास्तव में चतुर विरञ्चि ने मुझे कैकेयी के योग्य समझकर ही मुझे उसका पुत्र बनाया है । परन्तु इसके साथ मुझे श्रीदशरथ का पुत्र और श्रीराम का लघु भ्राता होने का गौरव प्रदान किया है, यह तो व्यर्थ ही है— “दशरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि विधि बादि बड़ाई ॥” ( रा० मा० २।१७९।१ ) उसपर भी आप लोग मुझे राजसिंहासन देना चाहते हैं । मैं कैसे किस-किस को क्या उत्तर दूँ । भला मुझे छोड़कर चराचर प्रपञ्च में कौन ऐसा है जिसे श्रीसीताराम प्राण के समान प्रिय नहीं हैं । “मो बिन को सचराचर माहीं । जेहि सिय राम प्राणप्रिय नाहीं ॥” ( रा० मा० २।१७९।३ ) श्रीकौशल्या अम्बा तो सरलचित्त हैं । मुझपर तो उनका सदा ही विशेष प्रेम है । वह मेरी दीनता देखकर स्वाभाविक स्नेह से मुझे राज्य करने को कहती हैं—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०९ “राममात सुठि सरलचित मोपर प्रेम बिशेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।” (रा० मा० २।१८०) श्रीगुरुजी महाराज तो विवेक के समुद्र हैं। सम्पूर्ण विश्व जिनके लिए करतलगत बदर (बैर) के समान हैं। पर वे भी मुझे राजतिलक देने की बात करते हैं। वास्तव में विधाता के विमुख होने से ही सब मुझसे विमुख हो गये हैं। भरत को लगता है, ये सब लोग मेरे मन में राज्य करने की लालसा जानकर ही ऐसा कहते होंगे। इनके मन में यह भी होगा कि भरत की भी राम के वनगमन और राज्य पाने की भीतरी सहमति जरूर होगी। परन्तु एक सीताराम को छोड़कर कौन मानेगा कि मेरा वैसा मत नहीं है— “गुरु बिबेकसागर जग जाना। जिनहिं विश्व करबदर समाना॥ मो कहूँ तिलक साज सज सोऊ। भये विधि विमुख विमुख सब कोऊ॥ परिहरि रामसीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥” (रा०मा० २।१८०।१,२) “आपनि दारुन दीनता कहहूँ सबहिं सिर नाय। देखे बिन रघुनाथपद जिय कै जरनि न जाय॥” (रा० मा० २।१८१) “आन उपाय मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिन बूझा॥ यद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारण सकल उपाधी!। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा विसेषी॥ सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक यद्यपि बामा॥” (रा०मा० २।१८१।१-३) आप सब लोग आज्ञा और आशीर्वाद दें जिससे मेरी विनय सुनकर राम पुनः राजधानी में आ जायँ। यद्यपि कैकेयी जैसी कुमाता से मेरा जन्म हुआ है और मैं अच्छी तरह सदोष हूँ तो भी अपना जानकर श्रीराम मुझे त्यागेंगे नहीं, ऐसा मुझे श्रीरघुवर पर दृढ़ भरोसा है। सरल, दुस्तर्करहित और आक्षेपरहित भरतजी के वचन सबको ही ऐसे प्रिय लगे जैसे रामसनेहसुधा से पगे हों— “भरतबचन सब कहँ प्रिय लागे। रामसनेहु सुधा जनु पागे॥” (रा० मा० २।१८२।१) माताएँ, सचिव तथा गुरुदेव और सभी पुरवासी नरनारी परम स्नेह में विकल हो उठे और सभी भरत की भूरि-भूरि सराहना करते हैं— “भरतहि कहहिं सराहि सराही। रामप्रेम मूरति तनु आही॥” तात भरत अस काहे न कहहू। प्रानसमान रामप्रिय अहहू॥ जो पाँवरु अपनीं जड़ताईं। तुम्हहि सुगाइ मातकुटिलाई॥ सो सठ कोटिक पुरुष समेता। बसहि कलप सत नरकनिकेता॥ (रा०मा० २।१८२।२-४) भरत, तुम तो साक्षात् राम के मूर्तिमान् प्रेम ही हो। कोई पामर प्राणी अपनी जड़ता से ही तुम्हारे प्रति कुटिलता की शङ्का कर सकता है। जो माता की कुटिलता तुममें आरोप करेगा वह तो अपनी कोटि पीढ़ियों के साथ सैकड़ों कल्प तक नरक में रहेगा। जैसे सर्प में रहती हुई भी मणि सर्प के अघ और अवगुण को नहीं ग्रहण करती। किन्तु वह गरल के दुःख और दरिद्रता की दाहक ही होती है। वैसे ही आप कैकेयी से उत्पन्न होने पर भी उसके कुटिलता आदि दोषों से मुक्त हैं। अज्ञान, भगवद्वैमुख्य आदि दोषों को दहन करनेवाले हैं। १०२

८१० रामायणमीमांसा एकविंश इस तरह संक्षिप्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि भरतजी के मन में वैसी कोई बात नहीं थी, जिसको लेखक ने उठाया है। श्रीभरत ऐसा प्रश्न कभी कर ही नहीं सकते थे— "धर्म क्या है ? क्या महाराज ने राघवेन्द्र को वन भेजकर धर्म की उचित रक्षा की है.........यह कैसा धर्म जिसने अपने पालन करनेवाले का ही प्राण ले लिया । सारी प्रजा अनाथ हो गयी । राघवेन्द्र को वन जाना पड़ा, फिर यह धर्म किस कल्याण की सृष्टि करनेवाला है ।" भरतजी तो धर्म के परम फल साक्षात् भगवत्प्रेम के मूर्त रूप हैं। कोई सामान्य आस्तिक भी ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता है। सभी आस्तिक जानते हैं कि- "न सुखाल्लभते सुखम्" सुख से सुख नहीं मिलता। धर्म के आचरण में कठिनाइयाँ होती हैं। श्रीराम ने ही कहा है कि— "सिबि दधीचि हरिचन्द नरेसू । सहेउ धर्महित कोटि कलेसू ॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरम धरेउ सहि संकट नाना ॥" (रा०मा० २।९४।२) शिबि ने धर्म-रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काट काट कर कपोत के बराबर तराजू पर तौल तौल कर प्रदान किया था। हरिश्चन्द्र ने धर्म के लिए क्या क्या दुःख नहीं भोगा । दधीचि ने तथा स्वयं श्रीराम ने, धर्मराज युधिष्ठिर ने एवं राजा नल ने धर्म-रक्षण के लिए कितने ही कष्ट झेले हैं। हर एक तपस्या से कृच्छ्र, चान्द्रायण, पराक आदि व्रतों में भी तो प्रथम कष्ट ही होता है। विशेषतया ब्राह्मण के लिए तो तपोमय जीवन ही आदरणीय होता है— "ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । कृच्छ्राय तपसे चैव प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥" इसी लिए तो— "तपबल बिप्र सदा बरियारा ।" ( रा० मा० १।१६४।२ ) कहा गया है। "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ॥" ( गीता १८।३७ ) जो पहले विषतुल्य प्रतीत होता है और परिणाम में अमृतमय होता है। वही तो सात्त्विक सुख कहा जाता है। महाराज दशरथ की वसिष्ठ महर्षि जैसे महापुरुष प्रशंसा कर रहे हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि महाराज दशरथ के समान न कोई हुआ है, न है, न होनेवाला है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी महाराज दशरथ की महिमा गाते हैं— "बिधि हरि हर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दशरथ गुन गाथा ॥" (रा०मा० २।२४१।४) ये सब बातें वे वसिष्ठजी बोल रहे हैं जिनके लिए गोस्वामीजी कहते हैं— "बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।" ( रा० मा० २।१७१।४ ) तुलसी की दृष्टि से तो महाराज दशरथ धन्य धन्य हैं— "जियन मरन फल दशरथ पावा । अंड अनेक अमल जस छावा ॥ जियत राम बिधु बदन निहारा । रामबिरह करि मरन सँवारा ॥

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८११ भक्तिशास्त्र की दृष्टि से रामप्रेम में श्रीरामविरहाग्नि से प्राणप्रयाण स्वयं में परमपुरुषार्थ है और उनके द्वारा माँगे हुए अन्तिम वरदान के रूप में उन्हें मिला था। दशरथजी ने प्रभु से वरदान माँगा था— “सुतबिषयक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहिं अधीना॥ हे नाथ ! पुत्रवात्सल्यरूप अभङ्ग प्रीति मुझे प्राप्त हो भले कोई (पण्डितम्मन्य तथोक्त कथाकार) मुझे मूढ़ भी क्यों न कहें। जैसे मणिधर नाग का जीवन मणि बिना जीवित नहीं रहता, जल बिना मीन जीवित नहीं रहता, उसी प्रकार मेरा जीवन आपके अधीन रहे। अर्थात् आपके मुखचन्द्र-दर्शन के बिना मेरा जीवन नहीं ही रहना चाहिए। धर्म रूढ़िगत वाक्यों से नहीं वेद-वाक्यों से सिद्ध होता है। गुरुदेव ने कहीं भी रूढ़िगत वाक्यों की दुहाई नहीं दी थी। "मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव" (तै० उ० १।११।२), "मातृमान् पितृमान् आचार्यवान्” (बृ० उ० ४।१।५) ये वेदवाक्य हैं। रूढ़िगत वाक्य नहीं। पिता जिसे देता है वही राज्य पाता है, यह भी रूढ़ि- वाक्य नहीं। शतपथादि वाक्यों से तथा श्रीभागवत के वाक्य से सिद्ध है, यह कहा जा चुका। यदि पिता किसी ब्राह्मण को होता और अध्वर्यु को राज्य दे देता है तो वह भी राज्य पा जाता है, फिर यदि छोटे पुत्र को राज्य दे दे तो वह क्यों नहीं पायेगा ? पुत्र को आज्ञा देता हुआ पिता स्वयं पितृत्व में आरूढ़ है या नहीं ? यह कथन तो नास्तिकता और अव्य- वस्था फैलानेवाला है। इस तरह तो किसी भी धर्म का अनुष्ठान ही असंभव होगा। यदि पत्नी कहे कि पति ठीक हो तो हम पतिव्रता रहेंगी। पति कहे कि पत्नी ही पतिव्रता हो तो तब हम ठीक पति बनेंगे। पुत्र कहे पिता ही योग्य पिता हो तब हम ठीक पुत्र बनेंगे। पिता कहे कि पुत्र ठीक हो तब हम ठीक पिता बनेंगे तो क्या संसार का व्यवहार चल सकेगा ? धर्म-पालन शर्तों के साथ नहीं होता। विधायक वचन भी ऐसी कोई शर्त नहीं रखते हैं, प्रत्येक के लिए विधान है। जो विधान का पालन करेगा वही ईश्वर का अनुग्राह्य होगा। इस प्रकार के धर्म आपसी समझौते पर आधारित नहीं, किन्तु ईश्वरीय विधानों पर ही आधारित हैं। जो पिता अपना कर्तव्य नहीं पालन करेगा वह कर्म के अनुसार फल पायेगा। जो पुत्र अपना कर्तव्य पालन करेगा वह अपने कर्तव्य का फल पायेगा। इतना ही नहीं यह भी संभव होता है कि पुत्र अपना कर्तव्य पालन करके पिता का ही नहीं अनेक पीढ़ियों का भी कल्याण कर लेता है। साध्वी पतिव्रता पत्नी पातिव्रत धर्म के पालन से अपने दुराचारी पति का भी कल्याण करती है। प्रकृत में तो ऐसा कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। महाराज दशरथ के लिए शराबी स्वामी का दृष्टान्त नहीं दिया जा सकता। उन्हें आवेशजन्य भावनाग्रस्त उन्मादी भी नहीं कहा जा सकता। उन्हें काम, क्रोध या ममता से ग्रस्त उन्मादी भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में उनकी आज्ञा को स्वीकार करने में धर्म का उपहास ही होगा, यह कैसे कहा जा सकता है ? यद्यपि सामान्यतया धर्म-पालन में विवेक की आवश्यकता होती है। जिससे आज्ञा देनेवाले और आज्ञा- पालन करनेवाले दोनों ही के लिए भी खतरा उपस्थित हो सकता हो वहाँ आज्ञा देनेवाले को स्वस्थ सावधान करना भी आवश्यक हो सकता है तथापि कई अवस्थाओं में आज्ञापालन का ही महत्त्व उत्कृष्ट होता है जैसा कि पीछे कहा गया है—

८१२ रामायणमीमांसा एकविंश "परसुराम पितु आज्ञा राखी। मारी मात लोक सब साखी ।। तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ।।" (रा० मा० २।१७२।४) ऊँची धर्मनिष्ठा में आज्ञा सर्वोपरि धर्म है। क्या इन दोनों पङ्क्तियों का कोई भी आस्तिक खण्डन कर सकता है ? तभी तो वसिष्ठ ने कहा कि- "अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पित बयन । ते भाजन सुख सुजसु के बसहिं अमरपति अयन ।।" (रा० मा० २।१७३ ) श्रीभरतजी का उनके वचनों पर शङ्का करना तो दूर उन्होंने तो और भी बढ़कर कहा कि- “गुरु पित मात स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भल जानी ।। उचित कि अनुचित किये विचारू । जाई धर्म सिर पातक भारू ।।" (रा०मा० १।१७५।२) परन्तु महाराज की आज्ञा को तो अनुचित कहा ही नहीं जा सकता। कहीं भी और मानस में भी किसी ने भी अनुचित नहीं कहा। लखनलाल ने जो कुछ कहा था; उसे श्रीराम ने उनका लड़कपन या भावावेश मानकर सुमन्त्र से उसे न कहने का ही आग्रह किया था । श्रीभरद्वाज भी वही कहते हैं जो श्रीवसिष्ठ ने कहा था कि- "लोक वेद सम्मत सब कहई । जेहि पित देइ राज सो लहई ।।" (रा० मा० २।२०५।४) वसिष्ठ की तरह ही वह भी कहते हैं कि- करतेहु राज त तुम्हहि न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ॥” (रा० मा० २।२०५।४) महाराज दशरथ में भरद्वाज भी कोई दोष नहीं देखते हैं । वे दशरथ की प्रशंसा करते हैं- “दशरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिक कहा जेहिं सम जग नाहीं ।।" (रा०मा० २।२०७।४) “जासु सनेह सकोच बस राम प्रकट भये आइ । जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नाहिं अघाइ ।।" ( रा० मा० २।२०८ ) भरद्वाज का स्पष्ट ही कहना है कि लोक वेद सबकी यही सम्मति है कि पिता जिसको राज्य देता है वही पाता है। ययाति ने ही ज्येष्ठ पुत्र यदु को राज्य नहीं दिया, किन्तु छोटे पुत्र पूरु को ही राज्य दिया। दायभाग के अनुसार उपरमस्वत्ववाद चलता है, जिसमें पिता के मरने पर ही पुत्र को अधिकार मिलता है। मिताक्षरा के अनुसार जन्मना स्वत्ववाद मान्य होता है। जिसके अनुसार जन्म से किं वा गर्भ में ही पुत्र को अपनी बपौती सम्पत्ति का अधिकार होता है । उसके अनुसार पिता पुत्र की सम्मति के बिना मौसी सम्पत्ति का दान, विक्रय, वितरण कुछ भी नहीं कर सकता है। परन्तु यह नियम सामान्य जनों के लिए ही है। राजाओं के नियम उनसे पृथक् होते हैं। इसी लिए सामान्य सम्पत्तियों के समान राज्य का बँटवारा नहीं होता है। सामान्यतया ज्येष्ठ का ही राज्य में अधिकार होता है। वह अपना राज्य किसी को भी दान कर सकता है किसी भी पुत्र को दे सकता है। सामान्य नियम के अनुसार दशरथजी पहले श्रीराम को ही राज्य देना चाहते थे। परन्तु पूर्वदत्त वरदान के अनुसार सत्य वचन से बद्ध होने के कारण उन्हें अपना मन बदलना पड़ा। अपनी स्वाभाविक इच्छा को रोककर शास्त्र और सत्य के अनुसार उन्होंने कैकेयी की इच्छापूर्ति की।

जैसे भरत के प्रति किसी प्रकार के कौटिल्य की कल्पना पाप का परिणाम है, वैसे ही महाराज दशरथ के दिव्य गुणों में कालिमा की कल्पना अपने हृदय की ही कालिमा को प्रकट करना है। श्रीतुलसी तो वन्दना में ही कहते हैं कि— “बन्दहुँ अवध भुवाल सत्यप्रेम जेहि रामपर। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तन तृण इव परिहरेउ ॥” (रा० मा० १।१६) हाँ, तो श्रीदशरथजी के वचन को शराबी के वचन से उपमा देना या उस भङ्गड़ की उपमा देना जो कहता है कि हमें स्मशान ले चलो या उन्हें काम, क्रोध, लोभ या ममता के आवेश का उन्मादी कहना वसिष्ठ, भरद्वाज, राम, भरत और तुलसी सबका ही अपमान करना है। महाराज दशरथ का कैकेयी से प्रेम था। परन्तु वह अनुचित नहीं है। अपनी विवाहिता पत्नी में प्रेम कथमपि अनुचित नहीं कहा जा सकता। जिस क्षण उन्होंने कैकेयी का श्रीराम के विरुद्ध भाव देखा एकदम कैकेयी से उदासीन हो गये। कामी व्यक्ति तो राज्य, धन, पुत्र सबको ही त्यागकर कामिनी पर ही मुग्ध रहता है। परन्तु महाराज ने कैकेयी को समझाकर देख लिया कि यह असाध्य व्याधि है। तब महाराज ने यही कहा कि— “चहत न भरत भूपतहि भोरे। बिधिबस कुमति बसी उर तोरे ॥ सो सब मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहि बिधि बामू ॥ सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुनधाम राम प्रभुताई ॥ करिहहि भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँपुर राम बड़ाई ॥ तोर कलंक मोर पछिताऊ। मुयेहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुँह गोई ॥ फिर पछितैहसि अन्त अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी ॥” (रा० मा० २।३५।१-४) यह कहना ही अनभिज्ञता ही है कि “पहले दशरथ ने कहा था कि ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है। परन्तु अब जब आज भरत से राज्य लेने के लिए कहा जाता है तब धर्म परिवर्तित रूप से उसके पक्ष में समर्थन दे देता है।” क्योंकि लेखक उत्सर्ग और अपवाद के सिद्धान्त से अपरिचित ही प्रतीत होता है। सामान्य नियम सर्वत्र प्रसिद्ध है। हरि इ इस स्थिति में सामान्य शास्त्र “इको यणचि” (पा० सू० ६।१।७७) के अनुसार यण् प्राप्त होता है। परन्तु उससे प्रबल “अकः सवर्णे दीर्घः” (पा० सू० ६।१।१०१) के अनुसार यण् न होकर दीर्घ ही होता है। सामान्यतया सदा सन्ध्या करने का विधान है। परन्तु सूतक-पातक में उसका संकोच भी होता है। उसी तरह सामान्यतया ज्येष्ठ पुत्र को राज्य देना उचित ही था। वही वसिष्ठसम्मति के अनुसार महाराज करने जा रहे थे। परन्तु अब जब पूर्वदत्तवरा भरतमाता महारानी कैकेयी ने नयी परिस्थिति पैदा कर दी तो अब विशेष स्थिति में पूर्वधर्म की अपेक्षा प्रबल धर्म यही है कि भरत को राज्य दिया जाय। पूर्वोक्त वैदिक वचनों और श्रीभागवत के अनुसार जब राजा यज्ञों में अपना राज्य ब्राह्मणों में प्रदान कर सकता है और श्रीराम ने भी वैसा ही किया था। तब राजा को सुतरां कनिष्ठ पुत्र को राज्य देने का अधिकार तो है ही तो भी यहाँ किसी राग और द्वेष के वशीभूत होकर नहीं, किन्तु सत्य की रक्षा के लिए कैकेयी की माँग को पूर्ण करना ही इस समय का सबसे बड़ा धर्म है। महाराज ने यह सब अपनी इच्छा के विरुद्ध शुद्ध धर्म-पालन के लिए ही अपने प्रिय प्राणों का बलिदान कर के भी किया था। तभी वसिष्ठ और भरद्वाज दोनों ही उस समय के प्रख्यात महर्षियों ने उसका समर्थन किया।

“विदित वेदसम्मत सब ही का। जेहि पित देई सो पावइ टीका॥” (वसिष्ठ) “लोक वेद सम्मत सब कहई। जेहि पित देइ राज सो लहई॥” (भरद्वाज) अतः इन महर्षियों के वचनों के सामने किसी के दुस्तर्क का कोई महत्त्व ही नहीं है। यह भी कहना गलत है कि “यद्यपि गुरु वसिष्ठ यह जानते हैं कि लोभग्रस्त कैकेयी ने महाराज श्रीदशरथ से दबाव डालकर ही राम के वनगमन की आज्ञा प्राप्त की है। फिर भी उसे आज्ञा-पालन का धर्म कहकर श्रीभरत से उसे मान लेने की आज्ञा दी जा रही है। यदि धर्म स्वार्थसमर्थन में ही प्रयुक्त किया जाने लगे तब उसके द्वारा लोकसंरक्षण का प्रश्न ही कहाँ उठता है।” क्योंकि भले ही माँ कैकेयी लोभग्रस्त रही होंगी। परन्तु महाराज तो लोभग्रस्त नहीं थे। यदि कैकेयी को पूर्व में वरदान न दिया होता तो क्या महाराज किसी तरह कैकेयी के दबाव से प्रभावित होते ? पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि महाराज सत्य के रक्षार्थ ही यह निर्णय लेने के लिए बाध्य हुए थे। उनके मन पर किसी भी काम, क्रोध, लोभ तथा ममता का प्रभाव या आवेश नहीं था। महाराज के लिए तथा महर्षि वसिष्ठ के लिए स्वार्थ का तो कोई प्रसङ्ग ही नहीं था। अतः शुद्ध धर्म की दृष्टि से ही महाराज ने राम को वनगमन और भरत को राज्य देने का निर्णय लिया था। “श्रीराम गुरु वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र की परम्परावाले तर्क को वस्तु धर्म के रूप में मन से नहीं स्वीकार कर पाये। इसी लिए उन्होंने उसके औचित्य पर सन्देह प्रकट करते हुए सोचा था— “जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपवीत विवाहा। संग संग सब भये उछाहा॥ विमल वंश यह अनुचित एकू। बन्धु विहाइ बड़ेहि अभिषेकु॥” (रा० मा० २।९।३,४) यह कहना भी अनभिज्ञता ही है, क्योंकि राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं हैं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करते हों। आश्चर्य है कि मानस के ही पण्डित मानस की ही बात नहीं समझ पाते हैं। यद्यपि वसिष्ठ ने ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई चर्चा नहीं की थी। “श्रवन समीप भये सित केसा। मनहुँ चौथपन अस उपदेसा॥ नृप जुवराम राम कहँ देहू। जावन जन्म लाहु किन लेहू॥” (रा० मा० २।१।४) इस तरह वृद्धावस्था देखकर उससे ही महाराज दशरथ के मन में श्रीराम के यौवराज्य का विचार उठा था। “यह बिचार उर आनि नृप उचित सुअवसर पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरुहिं सुनायउ जाइ॥” (रा० मा० २।२) गुरुदेव ने उसी का अनुमोदन किया था। महाराज ने फिर मन्त्रियों एवं पुरजनों की सम्मति लेकर मुनि को राम के भवन में विधि-विधान सिखाने के लिए भेजा— “तब नरनाहु वसिष्ठ बुलाये। रामधाम सिख देन पठाये॥” (रा० मा० २।८।१) वहाँ भी वसिष्ठ ने अपनी तरफ से ज्येष्ठ कनिष्ठ की कोई बात नहीं कही थी। किन्तु यही कहा था कि राजा ने आपके यौवराज्याभिषेक का आयोजन किया है। तदर्थ आपको आवश्यक संयम-नियम का पालन करना चाहिये— “भूप सजेउ अभिषेकसमाजू। चाहत देन तुमहिं युवराजू॥” (रा० मा० २।९।१)

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८१५ श्रीराम स्वयं भी यह नहीं कहते हैं कि गुरुदेव ने या पिताश्री ने यह अनुचित किया है अपितु वे कहते हैं कि हम सब भाइयों का जन्म, भोजन, शयन, खेल, उपवीत संस्कार, विवाह आदि सब साथ साथ हुआ अब अभिषेक केवल मेरा ही हो यह एक बात इस विमलवंश सूर्यवंश की अच्छी नहीं लगती। परन्तु तुलसी और उनके राम तो मर्यादापालक हैं। उस मर्यादा में तो वंशपरम्परा की बातों का परम आदर होता है। मनु ने भी श्रुति और स्मृति के साथ सदाचार को भी धर्म में प्रमाण माना है— “वेदः स्मृतिः सदाचारः ।” (मनु० २।१२) भगवान् भी गीता में— “उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ।” (गीता १।४३) जातिधर्म और कुलधर्म की रक्षा को आवश्यक मानते हैं। फिर सूर्यवंश की परम्परा की किसी बात को राम अनुचित कैसे कह सकते हैं ? इसी बात का समाधान करते हुए गोस्वामीजी भी कहते हैं— 'प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगतमन की कुटिलाई ।। (रा० मा० २।९।३) अर्थात् यह प्रभु का पछताना स्वाभाविक प्रेम की परिणतिमात्र है। इससे यह सप्रेम पछताना भक्तों के मन की कुटिलता का ही हरण करता है। विमल वंश की असूया में उसका तात्पर्य नहीं है। उक्त बात केवल सूर्यवंश में ही नहीं, किन्तु चन्द्रवंश में भी है और यौक्तिक भी है। राज्य के बँटवारे से व्यवस्था नहीं चल सकती। बारी-बारी सभी भाई राजा हों यह भी बात नहीं चल सकती। हाँ, मन्त्री आदि के रूप में तो भाइयों का सम्मान होता ही है। किसी क्षेत्र में अन्य भाई भी राजा हो सकते ही हैं। जैसा कि श्रीराम ने शत्रुघ्न को मथुरा का शासक बनवाया था और भरत तथा लक्ष्मण के पुत्रों को भी विभिन्न क्षेत्रों में राजा बनाया था। मनु के अनुसार सम्पूर्ण पित्र्य धन को ज्येष्ठ पुत्र ही ग्रहण करता है। शेष सभी भाइयों को पिता के समान ही ज्येष्ठ बन्धु का ही अनुवर्तन करना चाहिये। मन्थरा ने भी कहा था कि राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं होते। यदि सभी राजा हों तो महान् अन्याय एवं अव्यवस्था होगी। अतः राजा लोग शासन-व्यवस्था ज्येष्ठ पुत्र में ही स्थापित करते हैं। हाँ, कभी ज्येष्ठ के अयोग्य होने से गुणवान् कनिष्ठ पुत्रों के अधीन भी राज्यव्यवस्था स्थापित हो सकती है। फिर भी राज्य के अनेक शासक नहीं हो सकते; वैसा होने पर अव्यवस्था से महान् अन्याय हो सकता है— “नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि । स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत् ॥ तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः । स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि ।।” (वा० रा० २।८।२३, २४) इस प्रकार मनु और वाल्मीकिरामायण के अनुसार स्वाभाविकरूप से ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है। परन्तु विशेष अवस्था में गुणवान् कनिष्ठ राजपुत्र भी राज्य का अधिकारी हो सकता है। परन्तु राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं होते। इस तरह शास्त्रसम्मत सिद्धान्त का अपलाप मिथ्या दुस्तर्कों से नहीं हो सकता। श्रीभरत ने किसी भी धर्म-व्याख्या के प्रति अपनी असहमति प्रकट नहीं की। पहले हम कह चुके हैं कि महाराज दशरथ अथवा श्रीवसिष्ठ किसी ने भरत को आज्ञा के रूप में राजा होने को कहा ही नहीं। किन्तु कैकेयी के लिए जो दो वर प्रदान किये थे। उसी दृष्टि से वसिष्ठ ने भरत को राजा होने को कहा था। भरद्वाज ने भी

८१६ रामायणमीमांसा एकविंश उसी दृष्टि से कहा था कि यदि तुम राज्य करते तो भी कोई दोष नहीं था। वैसा सुनकर राम को सन्तोष ही होता। परन्तु अब तुमने और अच्छा किया जो श्रीराम को ही राजा बने रहने के लिए तुम राम से आग्रह करने जा रहे हो— करतेहुँ राज तुम्हहि नहिं दोषू। रामहि सुनतः होत संतोषू ॥” (रा० मा० २।२०५।४) “अब अति कीन्हेउ भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु । सकल सुमंगल मूल जग रघुपतिचरन सनेहु ॥” (रा० मा० २।२०६) श्रीवसिष्ठजी ने भी महाराज का वरदान और कैकेयी की इच्छा के अनुसार कौशल्या आदि माताओं तथा प्रजा के शान्ति और सन्तोषार्थ भरत के राज करने को लोकवेद-सम्मत कहा था। उनका राज करना अनुचित नहीं है— “सुनि सुख लहब राम बैदेही । अनुचित कहब न पंडित केही ॥” (रा० मा० २।१७३।३) राज्य करना सर्वसाधारण के लिए रागतः प्राप्त होता है। उसकी विधि अपेक्षित नहीं होती है। क्योंकि विधि तो अत्यन्त अप्राप्त की होती है, “विधिरत्यन्तमप्राप्तौ”—अतः प्राप्त राज्य त्याग देने में भी कोई दोष होने की संभावना नहीं होती है। अतः भरत के राज्य न करने से भरत पर किसी दोष की संभावना भी नहीं । आज्ञा और विधियों में रागतः अप्राप्त कर्मों का ही विधान होता है। राज्य त्यागकर वन जाने की आज्ञा ही मुख्य आज्ञा है, क्योंकि वह रागतः प्राप्त नहीं है। उसी का गुणगान किया जाता है। भरतजी राज्य करते तो दोष न होने पर भी उसका कोई बड़ा महत्त्व नहीं था। महत्त्व तो भरत के त्याग का ही है। “श्रीभरत धर्म को नया अर्थ प्रदान करते हैं। उनका सिद्धान्त यह है कि यदि राज्य के वास्तविक स्वामी महाराज दशरथ हों तो उन्हें ऐसा अधिकार हो सकता था। पर यह राज्य उन्हें क्रमशः उत्तराधिकार में मिला था। अतः राज्य के मूल स्वामी का अन्वेषण किया जाना चाहिये और अन्त में यह निष्कर्ष निकलेगा कि संसार में सम्पत्ति और राज्य के एकमात्र स्वामी भगवान् राम ही हैं— “संपति सब रघुपति कै आही ।” (रा० मा० २।१८४।२ ) इस तरह की मान्यता से धर्म भक्तिपरक हो जाता है। धर्म और अधिकार जब तक व्यक्तिपरक होंगे तब तक स्वार्थ और संघर्ष की भावनाएँ बनी रहेंगी। व्यक्ति कितना भी भला क्यों न हो भय, प्रलोभन और वासना की वृत्तियाँ उसमें परिवर्तन ला ही सकती हैं। अतः धर्म का केन्द्र अधिकार के स्थान पर सेवा और व्यक्ति के स्थान पर प्रभु को ही होना चाहिये ।” किन्तु उक्त कथन सर्वथा लोक, वेद तथा तर्क के विरुद्ध है। धर्म का नया अर्थ किसी को भी मान्य नहीं होता। धर्म में तर्क का भी कोई आदर नहीं होता। भगवान् राम, भगवान् कृष्ण, वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज कोई भी धर्म के निर्माता नहीं हो सकते। धर्म किसी का सिद्धान्त नहीं है। जब श्रीराम धर्म की व्यवस्था नहीं बना सकते तो भरत तो वैसा साहस कभी कर ही नहीं सकते। व्यक्ति में भ्रम, प्रमाद, करणापाटव तथा विप्रलिप्सा हो सकती है। अतः किसी भी जीव या ईश्वर द्वारा निर्मित ग्रन्थ धर्म में प्रमाण नहीं है। ईश्वर में भी छलछद्म सम्भव होता है। मोहिनीरूपधारी भगवान् ने भी छल किया था। श्रीविष्णु ने भी छल किया था— “छल करि टारेउ तासु व्रत प्रभु सुरकाज कीन्ह ।”

भले ही वह छल संसार के हित में ही हो, परन्तु है तो छल ही । इसी दृष्टि से किसी ऋषि, आप्त या ईश्वर का वही वचन धर्म में प्रमाण है जो वेदसंमत एवं वेद के अविरुद्ध हो। इसलिए वेद को भगवान् का निःश्वासरूप माना जाता है—"अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यद्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणम् ।” श्वास अकृत्रिम पुरुषबुद्धि-प्रयत्नानपेक्ष होते हैं । अतः वेद के निर्माण में जीव की कौन कहे ईश्वर की भी बुद्धि और प्रयत्न नहीं खर्च होता । इसलिए वेद अपौरुषेय अपास्तसमस्तपुंदोष होने से निर्विवाद प्रमाण होते हैं । इसी लिए भगवान् राम, कृष्ण, शिव, व्यास, वसिष्ठ, वाल्मीकि, तुलसी सभी वेदों की ही दुहाई पद पद पर देते हैं । अतः धर्म को नया रूप या नया अर्थ कोई भी नहीं प्रदान कर सकता है । यह तुलसी को कदापि मान्य नहीं है । उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं राज्य उपयोग के लिए ही होता है । यथेष्ट विनियोग-क्षमता ही स्वत्व होता है । अतः परम्पराप्राप्त राज्य का भी दान किया ही जा सकता है । भगवान् की गीता भी धर्म में शास्त्र को ही प्रमाण मानती है—"तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते” राज्य ही क्या सम्पूर्ण प्रपञ्च का मूल स्वामी परमेश्वर है । यह भरत का कोई नया मत नहीं है । “सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः” इत्यादि श्रुतियों से ही सिद्ध है । परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि कोई अपनी वस्तु का दान, व्यय, वितरण नहीं कर सकता, क्योंकि जैसे भूमिका मूल स्वामी राजा के होने पर भी अवान्तर स्वामी जमीन्दार, जागीरदार और काश्तकार भी होते ही हैं । वे भी अपनी भूमिसम्पत्ति का दान, वितरण या विक्रय कर ही सकते हैं । इसी तरह समस्त विश्व का मूल स्वामी परमेश्वर के होने पर भी भिन्न-भिन्न राजा भी अपनी अपनी सम्पत्तियों के मालिक होते ही हैं । तभी पृथिवी के दान, विक्रय आदि की व्यवस्था होती है । यदि यह स्थिति न मानी जायगी तब तो भू-दान का शास्त्रोक्त विधान ही बाधित हो जायगा । अतएव यदि सम्पत्ति किसी की हो ही नहीं सब ईश्वर की ही है । तब फिर सर्वस्वदान, भूमिदान, स्वर्ण- दान, रत्नदान, अन्नदान आदि की व्यवस्था कैसे बनेगी ? यदि सब संपत्ति ईश्वर की है किसी व्यक्ति की नहीं हो तब तो चोर को दण्ड भी क्यों हो, क्योंकि सभी संपत्ति ईश्वर की है तो चोर ने ईश्वर की संपत्ति ली है फिर उसे ही दण्ड क्यों ? ईश्वर की संपत्ति रखने पर भी यदि दण्ड हो तब तो जिसके पास थी उसे भी दण्ड मिलना चाहिये । “यदन्यद् ब्राह्मणस्य वित्तात् सभूमि सपुरुषं प्राची दिग्घोतुर्दक्षिणा ब्रह्मणः प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्- गातुः ।” (शत०ब्रा० १३।७।१।१३) में राजा ब्राह्मण का वित्त छोड़कर सभूमि सपुरुष राष्ट्र के मध्य से प्राची, दक्षिणा, प्रतीची और उदीची दिशाओं का होता, ब्रह्मा, अध्वर्यु एवं उद्गाता के लिए दक्षिणा के रूप में प्रदान करता है । महाराज दशरथ ने भी अश्वमेधयज्ञ में अपनी भूमि का दान किया था— “प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः । अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम् ॥ उद्गात्रे तु तथोदीचीं दक्षिणेषा विनिर्मिता । अश्वमेधमहायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा ॥ क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः । ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरा तां कुलवर्धनः ॥” ( वा० रा० १।१४।४३-४५) “ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकल्बिषम् । भवानेव महीं कृत्स्नामेकां रक्षितुमर्हति ॥ न भूम्याः कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने । रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप ॥

८१८ रामायणमीमांसा एकविंश निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति । गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः । दशकोटि सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम् ॥ ५१ ॥” यदि सारी सम्पत्ति ईश्वर की है तो इस प्रकार के दान कैसे सम्भव हो सकते ? श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था। वह श्रीमद्भागवत से प्रमाणित ही है। अतः भरत कभी भी ऐसा शास्त्रविरुद्ध सिद्धान्त स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं। यह कहा जा चुका है कि श्रीवसिष्ठ ने कैकेयी के वर की दृष्टि से ही भरत को राजा होने की बात कही थी । महाराज के वैसा न करने पर उनके सत्य धर्म का नाश हो सकता था । परन्तु भरत उसे न स्वीकार करें तो इससे किसी के भी धर्म-नाश की सम्भावना नहीं । वरदान देनेवाला यदि वरदान से मुकरता है तो उसका सत्य-भङ्ग होता है। पर यदि कोई भी प्रतिग्रहीता वचनबद्ध नहीं है तो वह प्रतिग्रह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता । राज्य स्वीकार कर लेने पर ही वशिष्ठजी की यह सलाह थी कि जब राम १४ वर्ष के बाद लौटकर आयें तब राम को राज्य पुनः प्रदान कर के उनकी सेवा करना । जब उन्होंने राज्य स्वीकार ही नहीं किया तो दूसरे परामर्श का प्रश्न ही नहीं उठता । यह कहना भी गलत है कि “गुरु वसिष्ठ का विचार यह था कि महाराज दशरथ से राज्य पाने के बाद तुम्हें यह अधिकार होगा कि १४ वर्ष के बाद राम को राज्य दे सको । इस तरह पिता की आज्ञा का पालन और राम को राजा बनाने की तुम्हारी आकाङ्क्षा पूरी हो जायगी । किन्तु श्रीभरत की दृष्टि में यह धृष्टता की पराकाष्ठा थी । वे स्वयं राज्य के स्वामी बनकर भगवान् राम को राज्य दान करने की चेष्टा करे क्यों ?” पर यह ठीक नहीं क्योंकि यह तो प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि किसी तरह भी प्राप्त निज वस्तु को भगवान् के अर्पण करके भगवान् को ही उसका स्वामी बना दे । इसमें किञ्चिन्मात्र भी धृष्टता का प्रश्न ही नहीं उठता है । भगवान् गीता में कहते हैं— “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्करिष्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥” ( गीता ९।२७ ) “कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥” (भाग० ११।२।३६) आप भी मानते हैं । सब सम्पत्ति भगवान् की ही है । यदि भगवान् को उसका अर्पण करना धृष्टता है तो भगवद्वचन की क्या गति होगी । अपनी सब वस्तुओं को राम की बना देना ही रामराज्य है। “त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।” यह भी कहना गलत है कि “चित्रकूट की यात्रा का तात्पर्य था भगवान् राम से यह स्वीकार करा लेना कि वे अयोध्या के वास्तविक स्वामी है ।”

अध्यायै रामचरितसम्बन्धी लेख ८१९ भगवान् राम वैसी धर्मविरुद्ध बात कभी स्वीकार कर ही नहीं सकते थे । उन्होंने स्पष्ट ही चौदह वर्ष तक राज्य के स्वामित्व को स्वीकार करने से इनकार ही किया था । जब भरत की दृष्टि से राम सकल विश्व के ही वास्तविक स्वामी थे तो अयोध्या के भी स्वामी थे ही । फिर उन्हें अयोध्या का स्वामी बनने के लिए आग्रह करना क्या धृष्टता की पराकाष्ठा नहीं थी । यह भी कहना गलत हैं कि “प्रभु से पादुका प्राप्त करने के पश्चात् वे प्रसन्न हो गये । उन्होंने उसका अर्थ यही लिया कि पादुका तो पद के लिए ही दी जाती है । प्रभु ने पादुका देकर अयोध्या का राज्यपद स्वीकार कर लिया । इसी लिए भरत ने पादुकाओं को अयोध्या में ले जाकर सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया और उसके पश्चात् एक सेवक के रूप में वे राज्यसञ्चालन करते रहे ।” भरत जैसे निष्छल निष्कपट पुरुष में ऐसे छल की कल्पना करना ही धृष्टता की परा काष्ठा है । आज किसी व्यक्ति ने किसी वस्तु के न लेने का दृढ़ निश्चय कर रखा हो उसे स्पष्टरूप से बिना बताये छल से उसको उसका प्रतिग्राही मान लेना छल भी है और धृष्टता भी है । यह भी कहना गलत है कि “गुरु वसिष्ठ स्मृतिमूलक धर्म के व्याख्याता थे । वहीं दूसरी ओर श्रीभरत प्रेमपरक धर्म के व्याख्याता थे । उनकी दृष्टि में जब तक जीव स्वयं दैन्यग्रस्त है तब तक उनसे यह आशा करना कि वह समाज में सुख और शान्ति का प्रसार करेगा मृगतृष्णामात्र है ।” वस्तुतः स्मृति कोई स्वतन्त्र प्रमाण ही नहीं है । वह तो श्रुतिमूलक ही है । इसी लिए किसी भी स्मृति- वचन का प्रामाण्य ‘इयं स्मृतिः श्रुतिमूलिका, स्मृतित्वात्, मनुस्मृतिवत्’ इस प्रकार श्रुतिमूलकता के आधार पर ही स्मृति प्रमाण होती है । जो स्मृति श्रुति से विरुद्ध होती है वह प्रमाण नहीं होती । स्मृति श्रुति के अनुगुण होने पर ही प्रमाण होती है । प्रेमपरक धर्म भी कोई स्वतन्त्र धर्म नहीं है । धर्म तो एकमात्र वेदशास्त्रमूलक ही है वही धर्म भगवच्चरण- पङ्कजसमर्पणबुद्धि से अनुष्ठीयमान होकर प्रेमपरक हो जाता है । फिर कथावाचकजी के अनुसार वेश्यापरक प्रेम भी धर्म हो जायगा । यह कहना अत्यन्त असंगत है कि “जिसमें वासना और स्वार्थ होगा वह लाखों उपदेश करने पर भी अवश्य अधर्म करेगा । जिसमें स्वार्थ और वासना का अभाव है उसके द्वारा शास्त्र देखकर धर्मपालन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्लोंकि शास्त्र तो साधक के लिए होते हैं सिद्धों के लिए नहीं; क्योंकि सिद्ध तो कृतार्थ ही होता है । जिसने नाव का सहारा लेकर नदी पार कर ली उसके लिए फिर नाव का आश्रयण आवश्यक नहीं है ।” ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से ही मूलाज्ञान की निवृत्ति और वासनाक्षय होता है । जिसने अहन्ता को बाधित कर दिया उसमें अहन्तामूलक स्वार्थ भी नहीं होते । भरत आदि तो भगवान् के ही स्वरूप हैं । उनका धर्मानुसरण तो उसी तरह लोकसंग्रहार्थ है जैसे श्रीराम का । किन्तु सामान्यतया मनुष्य वासना और स्वार्थ से रहित नहीं होते हैं । उन्हीं के उद्धार के लिए शास्त्रों का प्रयास होता है । श्रीमद्भागवत में एकादशस्कन्ध में श्रीभगवान् ने कहा है कि जैसे माता कटु गिलोय पिलाने के लिए बालक को मोदक का प्रलोभन देती है । बालक मोदक पाने के लोभ से गिलोय पी लेता है । माता मोदक देती है । बालक समझता है कि गिलोय पीने का फल मोदक-प्राप्ति है । परन्तु माता समझती है उसका फल है रोगनिवृत्ति । ठीक इसी तरह स्वर्ग, पशु, पुत्र, धनादि का प्रलोभन देकर श्रुति जीव को विविध धर्मों के अनुष्ठान में लगाती है । जीव को उनके अनुष्ठानों से विविध फल भी मिलते हैं और जीव उन्हें उन कर्मों का वही फल समझता है । परन्तु श्रुति तो स्वाभाविक पाशविक काम-कर्म और ज्ञान की निवृत्ति के लिए ही वैदिक काम, कर्म

८२० रामायणमीमांसा एकविंश और ज्ञान की ओर उसे प्रवृत्त करती है। जैसे काँटों से काँटा निकलता है वैसे ही वैदिक काम, कर्म और ज्ञान से ही पाशविक काम, कर्म और ज्ञान की निवृत्ति होती है। “वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यसिद्धिं लभते रोचनार्था फलश्रुतिः ॥” (भाग० ११।३।४६) प्राणी वेदोक्त कर्मों को भगवदाराधनबुद्धि से निःसंग होकर करता हुआ सर्वकर्मनिवृत्तिमूलक ब्रह्मात्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है। विविध फलों की श्रुति तो केवल कर्मों में रुचि उत्पन्न करने के लिए ही है। उधर प्रवृत्ति करने के लिए अर्थवादों के द्वारा उन कर्मों की प्रशंसा और महत्त्व का वर्णन किया जाता है। उनके प्रभाव से और फल के लोभ से प्राणियों की कर्मों में प्रवृत्ति होती ही है। विविध लाभों के लिए ही तो प्राणी लौकिक कठिन से कठिन कर्मों में प्रवृत्त होता ही है। विविध कठिन भाषाओं, कठिन साइन्स आदि की शिक्षाओं में प्राणी प्रवृत्त होता ही है। कर्मों में लगने से आलस्य, प्रमाद एवं निरर्थक चेष्टाओं से विरति होती ही है। ब्राह्ममुहूर्त में उठने से प्रातःकालिक भगवत्स्मरण, स्नान, सन्ध्या, जप, अग्निहोत्रादि का नियम पालन करने से दो घण्टे दिन तक सोते रहने, उठते ही चाय पीने, गप-शप लड़ाने आदि की आदतें छूटती हैं। यही वेद कहता है- "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।” प्राणी अविद्या (वैदिक काम, कर्म और ज्ञान) के द्वारा मृत्यु (पाशविक काम, कर्म और ज्ञान) का अतिक्रमण करके विद्या (उपासना) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त होता है। यद्यपि सभी ज्ञानवान् प्राणी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार काम करते हैं। उसमें किसी का कोई वश नहीं चलता है— “सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ (गीता ३।३३) परन्तु इस स्थिति में विधि-निषेधात्मक शास्त्र व्यर्थ होते हैं। जब सब अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ही काम करेंगे तब फिर कोई किस प्रकार दुष्कर्म से बचकर स्वधर्म में प्रवृत्त हो सकेगा। फिर तो पापप्रकृतिवाला पुरुष अपनी प्रकृति के अनुसार पाप करेगा ही फिर उसकी निवृत्ति कैसे होगी ? इस तरह पुरुष के पुरुषार्थ के लिए कोई अवकाश ही नहीं रह जाता है। वासना और स्वार्थ के वशीभूत प्राणी पाप करेगा ही। तब परमेश्वर वेदादि शास्त्र पुरुषार्थ के लिए क्यों आविर्भूत करते हैं। इन्हीं सब शङ्काओं का उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं— “इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥” (गीता ३।३४) इन्द्रिय के इन्द्रियार्थ में राग-द्वेष व्यवस्थित होते हैं। उनके वश में न होना ही पुरुषार्थ का मूल है। मृत्तिका घट के निर्माण का हेतु है तथापि जल उसका सहकारी कारण है। जैसे जलरूप सहकारी कारण के विघटन से मृत्तिका घट नहीं बना सकती है, उसी तरह राग-द्वेषरूप सहकारी कारणों के बिना प्रकृति भी स्वानुरूप कर्मों में प्राणी को नहीं प्रवृत्त कर सकती है। अतएव हिंसाप्रकृतिवाला सिंह भी अपने बच्चे की हिंसा में नहीं प्रवृत्त होता है, क्योंकि द्वेषरूप सहकारी कारण वहाँ नहीं है। चोरी की प्रकृतिवाला चोर भी उसी वस्तु को चुराता है जिसमें उसका राग होता है। जिन हीरा आदि बहुमूल्य रत्नों को वह नहीं पहचानता है, जिनमें राग नहीं है, उन्हें नहीं चुराता। रागास्पद सुवर्ण, रजतादि को चुराता है। तस्मात् सत्पुरुषों के समागम और सच्छास्त्रों का अभ्यास करके स्वाभाविक राग-द्वेषों को मिटाकर प्रकृतिपारतन्त्र्य मिटाया जा सकता है और पुरुषार्थ को अवकाश मिल सकता है। भगवत्कृपा तो सर्वत्र सर्वोपरि है

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८२१ हो। फिर भी भगवान् सर्वत्र समान हैं। उनका किसी से द्वेष या राग नहीं है। किन्तु जो उन्हें भजते हैं। उन्हें भगवान् अनुगृहीत करते हैं— "यद्यपि सम नहि राग न रोषू। गहहिं न पाप पुन्य गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा०मा० २।२१७।२,३) यद्यपि सामान्यतया प्राणी अपने प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही उन-उन वातावरणों में उन-उन माता, पिता आदि से जन्म लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा तथा संस्कारों के अनुसार प्रवृत्त होता है। वैदिक आस्तिक सनातनी वातावरण में उत्पन्न प्राणी की वैसे माता-पिता और बन्धुओं के सङ्ग तथा शिक्षा संस्कारों से वैदिक शिक्षा, दीक्षा एवं संस्कारों के अनुसार वैदिक कर्मों में प्रवृत्ति होती है। तथापि जहाँ वैसी स्थिति में विकार आ जाता है वहाँ भी प्राणी जब निष्पक्ष हृदय से अपने हित तथा अहित का विचार करता है और सत्पुरुषों के समागम और शास्त्राभ्यास का महत्त्व समझता है तभी से प्रकृति से छुटकारा पाकर अभीष्ट पुरुषार्थ सम्पादनार्थ शास्त्रीय राग-द्वेष उत्पन्न करके पाशविक राग-द्वेष को मिटाकर अधर्म से बचने और कर्मानुष्ठान करने में प्रवृत्त होता है। उससे बुद्धि शुद्ध होने पर और सूक्ष्म विचार उत्पन्न होने पर कामनाओं से रहित भगवदाराधनबुद्धि से कर्मों का आचरण करता है। निष्काम कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान् की भक्ति से बुद्धि और भी पवित्र हो जाती है। तब श्रवण, मनन, निदिध्यासन, भगवद्भक्ति, तत्त्वज्ञान और शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। तभी समूल वासना एवं स्वार्थ का विनाश होता है। परन्तु उसके पहले भी शास्त्रों का उपदेश कारगर होता ही है। राम ने कैकेयी और महाराज के सम्मुख कहा था, तत्रभवान् परम पूज्य पिताश्री के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है, प्राणों का भी परित्याग कर के वह सब करने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ। पिताश्री की शुश्रूषा और उनकी वचनक्रिया, आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं। माँ कैकेयी से भगवान् ने कहा था, अत्रभवान् पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं विजन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ। माँ, यदि आप मेरे गुणों में विश्वास रखतीं तो इसके लिए राजा से कहने की क्या आवश्यकता थी। मैं तो आपकी आज्ञा से ही सब कुछ कर सकता था। हे देवि, मैं अर्थपरायण होकर लोक में नहीं रहना चाहता। मैं ऋषियों के तुल्य विमल धर्म का आश्रयण कर के स्थित हूँ, ऐसा समझकर आप आश्वस्त हों— "यत्तत्रभवतः किञ्चिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया। प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत् ॥ नह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम् । यथा पितरि शुश्रूषा तस्य च वचनक्रिया ॥ अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम् । वने यास्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश ॥ न नूनं मयि कैकेयि किञ्चिदाशंससे गुणान् । यद्राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती ॥" (वा० रा० २।१९।२१-२४) "नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे । विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम् ॥" ( वा० रा० २।१९।२० ) "पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः । अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत् ॥

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति । वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः ॥ स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः । ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसंघैरनिन्दितः ॥ तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान् । रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः ॥ तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा । असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥ अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः । तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥ तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने । स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदिच्छेयं तदा वरम् ॥ गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना । अनभिज्ञो ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा ॥” (वा० रा० २।९।११-१८) “यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ । तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वाक्रमेदिति ॥” (वा० रा० २।९।२८) उपर्युक्त वचनों के अनुसार स्पष्ट प्रतीत होता है कि महाराज चक्रवर्तीजी कभी इन्द्र की सहायता के लिए देवासुर संग्राम में सम्मिलित होकर असुरों से युद्ध कर रहे थे । महाराज कैकेयी को साथ ले गये थे । वहाँ वैजयन्तपुर में महामायावी शम्बरासुर से युद्ध था । उस महान् संग्राम में राक्षस लोग प्रसुप्त पुरुषों को क्षत-विक्षत कर देते थे । उस भीषण युद्ध में असुरों ने महाराज को नानाविध प्रभावशाली शस्त्रास्त्रों से क्षत-विक्षत कर दिया था। उस समय महारानी कैकेयी ने स्वयं रथचालन कर महाराज की रक्षा की थी। उस प्रसन्नता में महाराज ने उन्हें दो वर माँगने को कहा था । महारानी ने कहा था कि जब मेरी इच्छा होगी तब इन वरों को माँग लूँगी । मन्थरा ने श्रीराम के यौवराज्याभिषेक-काल में महारानी को याद दिलाकर एक से श्रीराम को वनवास और दूसरे से श्रीभरत को राज्य प्रदान का वर माँगने को कहा था । श्रीराम ने भी चित्रकूट में श्रीभरत को बतलाया था कि— “देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः । संप्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः पुरा ॥” (वा० रा० २।१०७।४) श्रीराम भगवान् ने भरत को यह भी बतलाया था कि कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के साथ इसी शर्त पर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा । कौशल्या आदि किसी को पुत्र नहीं था, इसलिए महाराज ने भी वैसा स्वीकार कर लिया था— “पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्वहन् । मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्तमम् ॥” (वा० रा० २।१०७।३) “भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादि..म् । कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ क्षिप्रमेवाभिषेचनात् ॥ ऋणान्मोचय राजानं मत्कृतं भरत प्रभुम् । पितरं त्राहि धर्मज्ञ.... .... .... .... ॥” (वा० रा० २।१०७।९,१०)

श्रीराम ने कहा था कि हे धर्मज्ञ भरत ! इन अनेक कारणों से महाराज कैकेयी के इच्छानुसार तुम्हें राज्य देने के लिए बाध्य थे, अतः तुम राज्य स्वीकार कर के सत्यवादी पिताजी को ऋण से मुक्त करो । फिर आप कहते हैं कि "सेवक को जैसे सुरापायी स्वामी के आज्ञानुसार किसी का सिर नहीं तोड़ देना चाहिये, किन्तु स्वामी का नशा उतारने का प्रयास करना चाहिये । वैसे काम, क्रोध, लोभ एवं ममता के आवेश से उन्मादी महाराज दशरथ की आज्ञा न मानकर उनको उन दोषों से मुक्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ।" परन्तु आपका यह कहना ही उन्मत्त-प्रलाप है, क्योंकि श्रीराम ने तो वैसा नहीं किया । क्या उन्होंने अनुचित किया था ? क्यों श्रीराम धर्मज्ञ, विज्ञानवान्, प्रतिभावान् नहीं थे ? क्या वे कर्तव्याकर्तव्य के निर्धारण में सक्षम नहीं थे ? उल्टा वे तो आपके विपरीत कहते हैं कि महाराज दशरथ राजा हैं, गुरु हैं, पिता हैं, वृद्ध हैं वे चाहे क्रोध से, चाहे हर्ष से एवं चाहे काम से जो भी आज्ञा देते हैं धर्म की दृष्टि से कौन अनुशंसवृत्तिवाला पुत्र उसका पालन न करेगा— "गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात् ॥ यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः ॥" (वा०रा० २।२१।५९) श्रीराम ने कौशल्या और लक्ष्मण के सामने कहा था जीवलोक में धर्म, अर्थ, काम एवं अभीष्ट अभ्युदय की सिद्धि में जो भी अपेक्षित होते हैं वे सभी धर्म के पालन से वैसे ही वशीभूत हो जाते हैं, जैसे पुत्रसहित भार्या अपने पति के वश में रहती है । जिस धर्म में सब असंकीर्ण होकर रहते हैं उस धर्म का ही उपक्रम ( आरम्भ ) श्रेष्ठ है— "धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु । ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्यैव वश्याभिमता सपुत्रा ॥ यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात्तदुपक्रमेत ॥" (वा०रा० २।२१।५७, ५८) जाबालि भी श्रीराम को पिता के आज्ञा-पालन से विरत करने आये थे । उस समय राम ने कहा था लोक में सत्य ही ईश्वर है । सत्य में ही सब धर्म सदा आश्रित रहते हैं । अर्थात् बिना सत्य के अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम आदि कोई धर्म सम्पन्न नहीं होता है । क्योंकि सब में सत्य का पालन अनिवार्य है । अतएव संसार की सभी वस्तुएँ सत्यमूलक ही हैं । वे भी सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः सत्यपरायण होना उचित है । तस्मात् सत्य से उत्कृष्ट पद कुछ भी नहीं है । अतएव मैं पिता के निर्देश का पालन क्यों न करूँ । मैं किसी भी लोभ से, मोह से तथा अज्ञान् से सत्य के सेतु का भेदन नहीं कर सकता— "सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः । सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥ वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात्सत्यपरो भवेत् । सोऽहं पितुनिर्देशं तु किमर्थं नानुपालये ॥ नैव लोभान्न मोहाद्वा न चाज्ञानात्तमोन्वितः । सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्यप्रतिश्रवः ॥" (वा०रा० २।१०९।१३-१७) वे राजा दशरथ मेरे पिता हैं, जनयिता हैं । उन्होंने मेरे लिए जो भी आज्ञा दी है, वह मिथ्या कदापि न होगी—