रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०३ अवेदवित् भगवान् को नहीं जानता इत्यादि श्रुतियों का विरोध स्पष्ट है । वहाँ भी वही— “रामनाम एक अङ्क है सब साधन हैं शून्य । अङ्क गये सब शून्य हैं अङ्क रहे दश गून ॥” का ही न्याय लागू होता है । तभी तो जिस भक्तिमणि से ग्रन्थि खुल सकती है उसकी प्राप्ति ही वेद और पुराण से ही कही गयी है— “पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना ॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ज्ञानविराग नयन उरगारी ॥ भावसहित जो खोजहिं प्रानी । पाव भक्ति मणि सब सुखखानी ॥” (रा०मा० ७।११९।७,८) जैसे राम शास्त्रानुयायी परमधर्मनिष्ठ हैं वैसे ही उनके परमभक्त भरत भी हैं । अतएव उनका समझना, कहना, करना सब धर्मसार होना उचित है । क्या किसी वेदविरोधी का कहना, समझना, करना भी धर्मसार हो सकता है ? इसी लिए तो— “सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।” (अभि० शा० अङ्क १।२१) वेदादि शास्त्रोक्त धर्मनिष्ठ सज्जनों की अन्तःकरणप्रवृत्तियाँ सन्देहछेदन में परम प्रमाण होती ही हैं । गुरु वसिष्ठ के निर्णीत धर्म पर कुचोद्य करना सबसे अधिक दुर्बुद्धि का लक्षण है । यह कहना पूर्णतः असत्य है कि “वसिष्ठ के प्रत्युत्तर में भरत ने जो प्रश्न उठाये थे वे यथार्थ स्थिति के दिग्दर्शक थे । उनकी जिज्ञासा वास्तविक अनुभूति पर स्थित थी । इसी लिए गुरु वसिष्ठ को भरत के वाक्यों का उत्तर दे पाना सम्भव नहीं हुआ । उन्होंने पूछा वस्तुतः धर्म क्या है ? क्या महाराज श्रीदशरथ ने राम को वन भेजकर धर्म की उचित रक्षा की और यदि वह धर्म था तो उसका परिणाम प्रत्यक्ष था । धर्म का तात्पर्य यदि समाज का धारण है और संरक्षण है तो फिर यह कैसा धर्म ? जिसने स्वयं अपने पालन करनेवाले का ही प्राण ले लिया । सारी प्रजा अनाथ हो गयी । राम को वन जाना पड़ा । फिर यह धर्म किस कल्याण की सृष्टि करनेवाला है ? जब इसी धर्म का पालन करने के लिए मुझे कहा जाता है तो मैं यह जानना चाहूँगा कि इसमें किसका हित निहित है ? वस्तुतः भरत ने कुछ रूढ़िगत वाक्यों को ही वास्तविक धर्म मान लेने की ही धारणा के विरुद्ध मृदु वाक्यों में बड़ा तीक्ष्ण प्रहार किया है । वे रूढ़िवाक्य जिनकी आज्ञा पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है । अथवा पिता जिसे देता है वही राज्य का अधिकारी है । क्या वस्तुतः ये वाक्य निर्विवाद हैं ? पुत्र को आज्ञा देता हुआ स्वयं पिता पितृत्व पर आरूढ़ है या नहीं और यदि उस समय वह स्वयं भी किसी आवेशजन्य भावना से ग्रस्त हो । उस समय उसकी आज्ञा का पालन करना स्वयं आज्ञा देनेवाले के हित में होगा या नहीं । दृष्टान्त के रूप में स्वामी ने सुरापान कर लिया हो नशे में उन्मत्त होकर सेवक को आज्ञा दे कि सामनेवाले व्यक्ति का सिर तोड़ दो । स्वामी की आज्ञा मानना सेवक का धर्म है, परन्तु ऐसी स्थिति में योग्य सेवक स्वामी की आज्ञा मानने के स्थान पर उस नशे को ही दूर करने की चेष्टा करेगा । ठीक इसी तरह काम, क्रोध, लोभ या ममता के द्वारा ग्रस्त व्यक्ति भी उन्मादी ही है । ऐसी स्थिति में पिता की आज्ञा के नाम पर यदि आज्ञा स्वीकार की जाती है तो वह धर्म का उपहास ही होगा ।” क्योंकि वस्तुतः यह सब कथन शास्त्रीय सिद्धान्तों युक्तियों तथा मानस से भी विरुद्ध ही है । यह महान् साहस ही नहीं किन्तु पाप भी है । महर्षि वसिष्ठ चक्रवर्ती दशरथ महाराज को परम धार्मिक एवं सत्य के रक्षक मानते हैं कि—