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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 879

मूल प्रश्न है उन वासनाओं और स्वार्थों को मिटाकर हटाकर शास्त्रानुगामी बनना । यदि अन्तःकरण शुद्ध हो गया हो तब तो वह प्राणी उपासना और ज्ञान का अधिकारी हो जाता है । यह भी कहना गलत है कि जहाँ स्वार्थ और वासना का अभाव है वहाँ उसके द्वारा शास्त्र देखकर धर्म का पालन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । उसके द्वारा धर्म की क्रिया छोड़कर अधर्म की क्रिया हो नहीं सकती । क्योंकि उस स्थिति में वेदादि शास्त्र सभी व्यर्थ ही हो जायेंगे । स्वार्थ और वासनाओं के रहने पर जब लाखों उपदेश करने पर भी वह अधर्म ही करेगा और स्वार्थ तथा वासनाओं के मिटने पर बिना शास्त्र देखे ही धर्म का अनुष्ठान अपने आप ही उससे होगा तब वेद शास्त्र की आवश्यकता ही क्या है ? फिर भगवान् के द्वारा — निज निज धर्मनिरत श्रुति नीति के उपदेश का क्या अर्थ है ? गोस्वामीजी के— “वर्णाश्रम निज निज धरम निरत बेदपथ लोग” ( रा० मा० ७।२० ) की चर्चा का क्या अर्थ है ? यह भी कहना अत्यन्त अशुद्ध है कि वसिष्ठ ने उत्तर दिया—तुम मुझ से पूछते हो यह धर्म है अथवा अधर्म ? अब अधर्म का निर्णय कैसे हो ? धर्म का निर्णय शास्त्रों द्वारा किया जाता है— “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।” ( गीता० १६।२४ ) धर्मनिर्णायक शास्त्र हैं । पर शास्त्रों का अर्थ कौन लगाता है व्यक्ति की बुद्धि ? और तब समस्या जहाँ की तहाँ अटक जाती है । व्यक्ति की बुद्धि में स्वार्थ है । तो वह शास्त्र का अर्थ भी वैसा ही लगा देगा जिसके द्वारा उसके स्वार्थ की सिद्धि हो, क्योंकि वसिष्ठजी ने ऐसा न कभी कहा है न कह ही सकते हैं । क्योंकि यह सब मनगढन्त और शास्त्रविरुद्ध ही है । जब स्वार्थरहित एवं वासनारहित कोई है ही नहीं, शास्त्र का अर्थ किसी को लग ही नहीं सकता तो फिर श्रीराम आदि द्वारा शास्त्र की मान्यता का प्रचार सर्वथा व्यर्थ ही होगा । फिर तुलसी ने भी वेदादि शास्त्र समझा है कि नहीं ? उनके मानस में भी सब बातें शास्त्र-सम्मत हैं यह भी कैसे निर्णय होगा और मानस का अर्थ भी किसी को लगता है कि नहीं ? यह भी तो सन्देहास्पद ही रहेगा ? वस्तुतः वेदादि शास्त्रों के अर्थ आचार्य परम्परा से जाने जाते हैं । सहस्रों ऋषि-महर्षि स्वार्थ और वासनाओं से रहित होकर शास्त्रार्थ जानते हैं एवं उसका वर्णन करते हैं । वे भी अपने गुरुओं से शास्त्र एवं शास्त्रोक्त धर्म जानकर स्वार्थ और वासनाओं से रहित होते हैं । श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥” (रा० मा० ७।११६।३) इस चौपाई का भी अर्थ लेखक ने उल्टा ही समझा है । इसका तो इतना ही अर्थ है कि भगवदनुग्रह के बिना केवल श्रुति और पुराणों के बताये हुए उपायों के अनुष्ठान में भी अनेक बाधाएँ आ जाती हैं । उपनिषदों ने भी यह कहा है— “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।” ( कठ उ० २।२२ ) गीता ने कहा— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥” ( गीता ११।५३ ) उक्त वचनों में भक्ति और अनुग्रह की प्रधानता कही गयी है, वेदादि साधनों की निरर्थकता नहीं, क्योंकि— “नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ।”