रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 878, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०१ “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” ( गीता १६।२३,२४ ) मन समेत जहाँ जाय न बानी” ( रा० मा० १।३४०।४ ) यह भी शास्त्र की ही बात है—‘‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।” इस श्रुति का अर्थ उक्त चौपाई में कहा गया है। सबसे बड़ी बात यह कि बुद्ध भी तो भगवान् ही थे। यदि राम और कृष्ण की बात मानी जाय तो उनकी वाणी क्यों न मानी जाय ? स्पष्ट है कि वेदविरुद्ध भगवान् की वाणी भी अमान्य ही है। यह गोस्वामी तुलसीदास को भी मान्य है— “तुलसी महिमा बेद की को करि सकइ बिचार। जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥” श्रीकृष्ण की गीता उपनिषद्रूप गायों का दुग्धरूप है, वेदसम्मत है। इसी लिए मान्य है। वाल्मीकि- रामायण वेद का उपबृंहणरूप है। श्रीराम वेदमार्ग के अनुयायी एवं रक्षक हैं। इसी लिए उनकी उक्तियाँ एवं उनके आचरण धर्म में परम प्रमाण हैं। धर्म और ब्रह्म दोनों ही वेदैकसमधिगम्य हैं। अन्य किसी प्रमाण से विदित नहीं होते— “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” ( जै० सू० १।१।२ ) “शास्त्रयोनित्वात्” ( ब्र० सू० १।१।३ ) “तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि” (बृ० उ० ३।९।२३) अतः वेद-शास्त्र ही धर्म और ब्रह्म का स्वरूप बतलाते हैं एवं उनकी प्राप्ति का मार्ग बतलाते हैं। भगवान् राम और भगवान् कृष्ण भी उन्हीं वेदों का गुणगान करते हैं, यह कभी भी नहीं भूलना चाहिये। राम ब्रह्म होते हुए भी शास्त्रानुसार ही सब क्रियाएँ करते हैं। इसी लिए धर्म भी उनका अनुसरण करता है। यही बात ‘आगे राम पीछे सीता लक्ष्मण हैं’ से स्पष्ट होती है। धर्म को मार्गदर्शक नहीं माना जाता। मार्गदर्शक शास्त्र और आचार्य होते हैं। भागवत के अनुसार राम धर्म के शिक्षक हैं। जब वह स्वयं शास्त्रानुसार चलते हैं तब सीतारूपिणी सत्क्रिया और लक्ष्मणरूपी धर्म उनके पीछे चलकर सम्पूर्ण संसार का कल्याण करते हैं। शुद्ध अन्तःकरणवाले की प्रत्येक क्रिया ऐसी होती है, जिसका धर्म समर्थन करता है। परन्तु अन्तःकरण की शुद्धि भी तो धर्म पर ही निर्भर है। तभी तो श्रीराम ने रामगीता में अन्तःकरण की शुद्धि के लिए वेदोक्त कर्मों का करना आवश्यक बतलाया था—‘‘आदौ स्ववर्णाश्रम····।” अधर्म के कारण ही अशुद्ध अन्तःकरण में वासना और स्वार्थ अधिकार जमाते हैं। तभी वह अधर्म में प्रवृत्त होता है। उपनिषदों तथा गीता ने भी अन्तःकरण को पवित्र करने के लिए स्वधर्मानुष्ठान द्वारा परमेश्वर की आराधना को ही आवश्यक कहा है— “वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन ।” ( बृ० उ० ४।४।२२ ) “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” ( गीता १८।४६ )