रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०० रामायणमीमांसा एकविंश इसी प्रकार विश्वामित्र भी पूर्व में चाहे जैसे रहे हों । परन्तु उन्होंने तीव्र तपस्या द्वारा न केवल अपने को ही किन्तु अपने पिता, पितामह एवं प्रपितामह को भी ब्राह्मण बना दिया था। तभी तो स्वयं वसिष्ठ ने उनकी प्रशंसा की और राम ने उन्हें अपना गुरु माना और पादसंवाहन किया । “तपो हि दुरतिक्रमम् ।” तुलसी ने भी माना कि तप के बल से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, तप के बल से विष्णु पालन करते हैं एवं तपोबल से रुद्र संहार करते हैं । तप से ही शेष पृथ्वी का भार वहन करते हैं । परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि आज भी कोई थोड़ा सा तप कर के ब्राह्मण बन जाय । जो तपस्या से या योगशक्ति से क्षात्रदेहारम्भक परमाणुओं को विघटित कर के ब्रह्मदेहारम्भक परमाणुओं को संघटित करने की सामर्थ्य रखता है वही वैसा कर सकता है। जो चूहे को बिल्ली भी नहीं बना सकता है, वह किसी भी जाति को कैसे बदल सकता है ? विश्वामित्र ने तो मेनका को शाप से ही पहाड़ी बना दिया था । तो भी उस स्थिति तक भी वे ब्राह्मण नहीं बन सके थे । यद्यपि उनके देह का उपादान ब्राह्माचरु ही था। वे क्षात्र क्षेत्र के कारण ही क्षत्रिय थे । अतः उनका ब्राह्मण बनना बहुत कठिन नहीं था । तथापि महाभाष्य के अनुसार उनके पिता, पितामह और प्रपितामह तो सर्वथा क्षत्रिय होते हुए भी उन्हीं के ( विश्वामित्र के ही ) तप से ब्राह्मण हो सके थे । तुलसी भी कहते हैं कि— “बालमीकि नारद घटयोनी । निज निज मुखन कही निज होनी ॥” (रा० मा० १।२।२ ) ऐसी स्थिति में हरिश्चन्द्र या विश्वामित्र किसी की भी अन्तिम स्थिति का ही स्वरूप देखना चाहिये, पूर्वरूप देखने का कोई अर्थ नहीं । सर्वथापि वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, मानस सभी हमारे आदर्श ग्रन्थ हैं । निर्भ्रान्त होकर इनका प्रामाण्य मानना चाहिये । किसी का अप्रामाण्य नहीं है। किसका क्या अभिप्राय है, यही समझने का प्रयत्न करना उचित है । स्थालीपुलाकन्याय से इतना लिखा गया । इसी प्रकार अन्य भी बहुत सी विवादास्पद बातें पुस्तक में हैं। पर सबपर विचार करने तथा लिखने का अवकाश न होने से विराम लेते हैं । श्रीराम का प्रादुर्भाव मुख्यरूप से मर्त्यो को धर्म-शिक्षा देने के लिए हुआ है । यह श्रीमद्भागवत में स्पष्ट है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ॥” (भाग० ५।१९।५ ) परन्तु श्रीभगवान् ने भी धर्म के सम्बन्ध में शास्त्र को ही प्रमाण माना है । उसी के अनुसार चलकर उन्होंने लोगों को धर्म की शिक्षा दी थी । अतएव यह कहना सही नहीं है कि संसार के अन्य मार्गों का पता तो अन्य व्यक्तियों को होता हैं परन्तु प्रभु का मार्ग कौन जाने ? मत समेत जहँ जाय न बानी । तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ॥” (रा० मा० १।३४०।४ ) इसका अर्थ यह है कि प्रभु का मार्ग स्वयं प्रभु को छोड़कर अन्य कोई नहीं जानता, किन्तु यह प्रभु के गीता-वचन से ही विरुद्ध है । गीता में भगवान् ने यह नहीं कहा कि जो मैं कहूँ वह धर्म है, किन्तु उन्होंने यही कहा कि शास्त्रविधि के अनुसार ही कर्त्तव्य को जानकर अनुष्ठान करना चाहिये । जो शास्त्रविधि का उल्लङ्घन करता है वह सुख, सिद्धि और शान्ति नहीं पाता । अतः शास्त्रविधानोक्त कर्म को जानकर ही उसका अनुष्ठान करना उचित है—