रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 876, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९९ अनुष्ठान कर के अहिंसा, सत्यादि साधनों का अनुष्ठान कर के ब्रह्मज्ञान द्वारा मोक्षप्राप्ति की भी संभावना हो जाती है। इस तरह शब्दशः विचार करने पर भी श्येनयागविधि का तात्पर्य भी हिंसानिषेध में ही होता है। इसी तरह पुत्र की कामनावाले प्राणी के लिए पुत्रेष्टि आदि का विधान होता है। अन्य भी काम्य कर्मों का तात्पर्य कामना-पूर्ति में न होकर पाशविक काम-कर्मनिवृत्ति में ही होता है। माता बच्चों को मोदक प्रदान का प्रलोभन देकर गुडूची-पान कराती है। बालक मोदक के लोभ से गुडूची-पान करता है। बालक गुडूची-पान का फल मोदकप्राप्ति समझता है। परन्तु माता तो गुडूची-पान का फल रोगनिवृत्ति ही मानती है। मोदकदान तो केवल प्रलोभनार्थ ही है। यदि प्रदान न करे तो बालक दूसरे दिन गुडूची-पान नहीं करेगा। इसी तरह वेद पाशविक काम-कर्म-रूप मृत्यु से छुड़ाकर ब्रह्मज्ञान की ओर लगने के लिए विविध काम्य कर्मों का विधान करते हैं। जैसे कण्टकेन कण्टकोद्धार होता है, वैसे ही वैदिक काम-कर्म के द्वारा लौकिक पाशविक काम-कर्म को मिटाया जा सकता है। वैदिक काम-कर्मों द्वारा राजस काम-कर्मों से निवृत्ति करायी जाती है। अन्त में निष्काम कर्म के द्वारा सब प्रकार के काम-कर्म-ज्ञान को मिटाया जाता है। बुद्धि-शुद्धि, नित्यानित्यविवेक, वैराग्य, शम, दमादि द्वारा पूर्ण ब्रह्मज्ञान एवं नैष्कर्म्यसम्पत्ति सम्पन्न होती है। जिसका वर्णन इस प्रकार है— "यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥" ( क० उ० २।६।१० ) जब कर्मेन्द्रियों के साथ पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ अवस्थित (निरुद्ध) हो जाती हैं और बुद्धि भी निर्विचेष्ट हो जाती है। उसी को परा गति कहा जाता है। उसी निर्विकल्प समाधि से ब्रह्मात्मतत्त्व का साक्षात्कार सम्पन्न होता है। श्रीभागवत में भगवान् उद्धव को यही बतलाते हैं कि जो प्राणी अज्ञ एवं अजितेन्द्रिय होने पर भी वेदोक्त कर्म नहीं करता वह अवश्य ही विकर्मरूप अधर्म से मृत्यु से पुनः मृत्यु को ही प्राप्त होता है। "नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥" ( भाग० ११।३।४५ ) तस्मात् निःसंग होकर भगवत्समर्पणबुद्धि से वेदोक्त कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ प्राणी नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है। स्वर्गादि फलश्रुति तो केवल रोचनार्थ ही है— "वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यसिद्धिं लभते रोचनार्था फलश्रुतिः॥" ( भाग० ११।३।४६ ) इसलिए गीता भी वेदों के अर्थवादों में रतों की निन्दा करके निष्काम कर्म की ही प्रशंसा करती है। व्यावहारिक दृष्टि से यदि हरिश्चन्द्र भी पहले अत्यन्त कामान्ध रहे हों और उन्होंने पुत्रप्राप्ति के लिए बलिदान की मनौती भी मानी हो और शुनःशेप को खरीदकर बलिदान देकर भी आत्मरक्षा का प्रयत्न किया भी हो तो भी अन्त में निष्काम उपासक तथा तत्त्वज्ञान-सम्पन्न होकर एवं महान् सत्यनिष्ठ होकर वे विश्वमान्य हो गये हैं। सभी जीव अनादि हैं। प्रथम अवस्था में किसने क्या नहीं किया ? "अन्ते या मतिः सा गतिः।" अन्त में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है। तपस्या में स्वधर्मानुष्ठान में उच्चपद प्राप्त कराने की सामर्थ्य होती ही है। तपस्या से वाल्मीकि क्या से क्या हो गये।