भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 875

७९८ रामायणमीमांसा एकविंश हरिश्चन्द्र की कथा का सम्बन्ध ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण से है। अन्यत्र भी उसकी चर्चा है। पुत्रेष्टि याग का वह अर्थवाद है। पुत्रेष्टि याग की प्रशंसा में ही उसका तात्पर्य है। “पुत्रेणायं लोको जय्यः कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः।” इन श्रुतियों के अनुसार पुत्र से मनुष्यलोक की प्राप्ति होती है, कर्म से पितृलोक और विद्या (उपासना) से देवलोक की प्राप्ति होती है। तीनों से जो विरक्त होता है उसके ही लिए ब्रह्मविद्या का उपदेश है। “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।” (कैवल्योपनिषत् १।२) “किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः।” (बृ० उ० ४।४।२२) हरिश्चन्द्र जैसे महान् सम्राट् ने भी पुत्र के लिए अपने को सङ्कट में डाला था। अतः पुत्र के लिए पुत्रेष्टि करनी चाहिये। प्रवृत्ति या निवृत्ति विधि या निषेध के ही बल पर होती है, आख्यान के बल पर नहीं। कई ऐतिहासिक घटनाएँ दौर्भाग्यपूर्ण भी होती हैं। पर उनका आचरण नहीं किया जाता है। इसी लिए विधि अथवा निषेध के अनुसार ही प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है। वेदों में ही— “न हिंस्यात् सर्वा भूतानि” के अनुसार हिंसा निषिद्ध है। फिर यदि पुत्रार्थ मनुष्य की हिंसा विहित होती तो उत्सर्ग अपवाद भाव हो सकता था। परन्तु ऐसी कोई विधि है नहीं। कल्पित विधि ‘न हिंस्यात्’ से विरुद्ध होने के कारण बाधित हो जाती है। अतः हरिश्चन्द्र के आख्यान पर वैसी दुष्कल्पनाएँ नहीं हो सकती हैं। विधि का बोध लिङ् या लोट् लकार एवं तव्यादि प्रत्ययों से होता है। कहीं-कहीं अपूर्व द्रव्य देवता का ज्ञापक वाक्य होने से तो अन्यथा भी अर्थात् लट् लकार से भी विधिका बोध हो जाता है। हरिश्चन्द्र का सत्यनिष्ठावाला आदर्श सत्यविधि के अनुकूल होने से सत्य एवं अनुकरणीय भी है। वेद केवल निवृत्तिमार्गीय के ही लिए नहीं हैं। वे राजस, तामस और सात्त्विक सभी प्राणियों के लिए हितोपदेश करते हैं। वेदों में शत्रुमरण की कामना से श्येनयाग का भी विधान है। वेदों में जहाँ यज्ञ-पूत्ति के लिए हिंसा-विधि के द्वारा हिंसा विहित है वहाँ ‘न हिंस्यात्’ इस उत्सर्ग का बाध होता है। परन्तु जहाँ हिंसा की विधि नहीं हैं, किन्तु हिंसा विधेय न होकर हिंसा उद्देश्य है वहाँ ‘न हिंस्यात्’ यह उत्सर्ग वचन निषेध वचन ही प्रबल होता है। श्येनयाग में शत्रुमरण उद्देश्य है विधेय नहीं। अतः वहाँ ‘न हिंस्यात्’ इस निषेध का ही प्राबल्य होता है। फिर भी श्येनयाग की विधि प्राणी के हितार्थ ही है। हितशासन से ही वेद शास्त्र कहलाते हैं। अतः उनका तात्पर्य स्वाभाविक राग-द्वेषान्ध की प्रवृत्ति रोकने में ही है। काम, क्रोधादि जनित प्रवृत्ति को रोक देना सबसे बड़ा प्राणी का हित है। लौकिक मार्ग से शत्रुहिंसा में प्रवृत्ति अधिक अनिष्टजनक है, क्योंकि हो सकता है कि अस्त्र-शस्त्रादि द्वारा वध में प्रवृत्त प्राणी को शत्रु ही मार दे अथवा शत्रु का सहायक भी मार सकता है। कथञ्चित् सफलता मिलने पर भी राजा के द्वारा मृत्युदण्ड का भागी होना पड़े। अतः शास्त्र लौकिक मार्ग से हिंसाप्रवृत्ति को रोकने के लिए उसकी अपेक्षा निरापद श्येनयाग को शत्रुमरण का साधन बताकर प्राणी की प्रवृत्ति को रोक देता है। एक बार प्रवृत्ति रुक जाने पर काम, क्रोध का वेग रुक जाने से विचार को अवकाश मिल जाता है। अतः श्येनयाग की प्रवृत्ति भी रुक सकती है। यदि अधिक क्रोधादि रहा तो भी श्येनयागसम्पादन के लिए अन्य वैदिक विद्वानों को भी बुलाना पड़ेगा और उनके उपदेश से परिणाम में हानिकारक होने से भी श्येनयाग की प्रवृत्ति रुक सकती है। यदि उपदेश से न रुकी तो भी सामग्री-सम्पादन की कठिनाई से भी निवृत्ति हो सकती है। यदि उससे भी प्रवृत्ति न रुकी तो श्येनयाग के अनुष्ठान में बहुत से देवता और ब्राह्मणों की पूजा और दान आदि से कुछ पुण्य भी साथ में अनिवार्यरूप से हो जायेंगे। श्येनयाग में सफलता होने से वेदोक्त उपाय में दृढ़ विश्वास होने से उसके निवारणार्थ प्रायश्चित्त का