रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 930, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८५३ डालमान के 'जेनेसिस वे भारत' ( महाभारत का मूल ) में उन्होंने कहा है कि कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे इस महाकाव्य का विकास हुआ है, यह मत भ्रान्त है। उनके अनुसार वास्तविक युद्ध केवल कवि की कल्पना है । यदि कोई युद्ध हुआ होता तो उसका ऐतिहासिक प्रमाण मिलता । इसमें तो धर्म और अधर्म के ही संग्राम का वर्णन है । विंटरनित्स का 'भारतीय साहित्य का इतिहास' जर्मन भाषा में प्राग से प्रकाशित हुआ । उसके अनुसार महा- भारत को कला की कृति नहीं कहा जा सकता । महाभारत सचमुच एक साहित्यिक दानव है । यदि महाभारत का रचयिता कोई एक ही व्यक्ति माना जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह एक साथ महाकवि और टुच्चा लेखक, एक चतुर साधु और मूर्ख एवं सुयोग्य कलाकार तथा पक्का नक़्क़ाल रहा होगा। यह विचित्र व्यक्ति, अत्यन्त परस्पर विरोधी धार्मिक भावों और दार्शनिक सिद्धान्तों में विश्वास रखता था फिर भी इस काव्य के जङ्गल में जिसको साफ करना विद्वानों ने आरम्भ कर दिया है, घास-फूस और लता-पत्तों में छिपे हुए सच्ची कविता के भी कुछ पौधे मिल जाते हैं। साहित्य के इस बेतुके ढेर में अमर कलाकृति और गम्भीर बुद्धि के कुछ रत्न भी चमकते हैं । सर मोनियर विलियम्स हापकिन्स, ग्रियर्सन आदि ने भी मनमाने विचार प्रकट किये हैं । वस्तुतः जैसे बादलों द्वारा लाया हुआ ही समुद्र का पानी मधुर और तृप्ति का हेतु होता है । स्वतः ग्रहण करने पर वह खारा ही रहता है । उसी तरह भारतीय आचार, विचार, संस्कार तथा गुरुपरम्पराओं से ही भारतीय शास्त्रों के रहस्य विदित होते हैं । वैसा न होने पर उनका उलटा ही अर्थ भासित होता है। पाश्चात्यों का विद्या- व्यसन, अनुसन्धान तथा अनोखी सूझ किसी अंश में प्रशंसनीय हैं, परन्तु उनका यह परिश्रम किसी गूढ़ उद्देश्य से ही है और वह है भारतीयों को अपने धर्म से विमुख करना ! उनकी प्रवृत्ति ज्ञान की उच्च भावना से प्रेरित नहीं है। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रबल प्रचारक लार्ड मैकाले ने कहा था कि हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए हिन्दू-धर्म के खण्डन की आवश्यकता नहीं है। पाश्चात्य शिक्षा में आये हुए हिन्दू का मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रह जायगा। स्वयं मैक्समूलर, जो भारत-प्रेम के लिए प्रसिद्ध हैं, ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वेदमन्त्र दकियानूसी और निरर्थक हैं। जिस वातावरण में हम रह रहे हैं, उसमें मँडराते रहने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है । उन्हें अजायबघरों में प्रतिष्ठित पद देने के लिए हम तैयार हैं, परन्तु हम कभी अपने जीवन को उनके द्वारा प्रभावित नहीं होने दे सकते । दूसरी पुस्तक 'चिप्स फ्राम दि जर्मन वर्कशाप' में उन्होंने और खुलकर कहा है—वेद हिन्दू-धर्म की चाभी हैं। उनका अच्छा ज्ञान, उनके दृढ़ तथा दुर्बल स्थानों का ज्ञान धर्म के विद्यार्थियों के लिए विशेषतः ईसाई मिशनरियों के लिए अनिवार्य है। ऐसी दशा में यही बात मन में आयी कि भारतवर्ष में ईसाई धर्म-प्रचारकों के काम की चीज वेद के एक संस्करण से बढ़कर और कुछ न होगी । इससे पाश्चात्य विद्वानों के मानसिक भावों का पता चलता है । भारतीय शास्त्रों के अनुवाद एवं लम्बी चौड़ी समालोचनाओं के पीछे उनकी यही दुरभिसन्धि रहती है । भारत में अंग्रेजीराज पुस्तक में भी पाश्चात्यों द्वारा ही पाश्चात्यों के इतिहाससम्बन्धी दुरभिसन्धियों का भण्डाफोड़ किया गया है । डॉ० वेबर के अनुसार महाभारत में वर्णित नारायणीय भागवत-धर्म में जो भक्तिपक्ष है वह श्वेतद्वीप से अर्थात् हिन्दुस्थान के बाहर से आया है । अर्थात् ईसाई-धर्म से भागवत-धर्म में भक्ति का प्रवेश हुआ है । परन्तु पाणिनि जो कि ईसा से बहुत पहले हुए थे । उनको वासुदेवभक्ति का तत्त्व मालूम था । इतना ही नहीं बौद्ध तथा जैन धर्मों में भी भागवत-धर्म तथा भक्ति के उल्लेख पाये जाते हैं । राघव चिन्तामणिराव वैद्य ने कहा है कि श्रीकृष्ण, यादव, पाण्डव तथा भारतीय युद्ध का एक ही काल है और वह कलियुग का आरम्भ है । पुराणों के अनुसार पांच हजार वर्ष से भी अधिक काल बीत गया है। भागवत और विष्णुपुराण के अनुसार परीक्षित् राजा के जन्म से लेकर नन्द के अभिषेक तक १११५ या १०१५ वर्ष होते