भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८५४ रामायणमीमांसा द्वाविंश हैं ( भाग० १२।२।२६ ), ( वि० पु० ४।२४।३२ ) । पाश्चात्य विद्वानों ने माना है कि ईसवी सन् से लगभग १४०० वर्ष पूर्व भारतीय युद्ध और पाण्डव हुए होंगे । अतः कृष्ण का भी वही काल है । कुछ लोगों के अनुसार कृष्ण एक क्षत्रिय योद्धा थे । उनको पहले महापुरुष पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुपद मिला । अन्त में परब्रह्म का रूप मिला । इन अवस्थाओं के आरम्भ से अब तक बहुत सा काल चाहिये । अतः भारतीय धर्म का उदय और भारतीय युद्ध का एक ही काल नहीं, परन्तु यह शङ्का ठीक नहीं है । क्योंकि उपनिषदों में ज्ञानी को ब्रह्मरूप कहा है ( बृ० उ० ४।४।६ ) । मैत्रायणी उपनिषद् में रुद्र, विष्णु, नारायण ये सब ब्रह्म ही हैं यह कहा गया है । बुद्ध भी अपने को ब्रह्मभूत कहते हैं ( सेलमुत्त १४ तथा थेरगाथा ८३१ ) । वस्तुतः ये सब विचार-सरासर गलत हैं । क्योंकि वेदादि प्रमाणों के आधार पर कृष्ण वस्तुतः परब्रह्म थे । उनको किसी ने ब्रह्मपद प्रदान नहीं किया था । पश्चिमी पण्डितों में अधिकांश का मत है कि ऋग्वेद का काल ईसा से पूर्व १५०० वर्ष या बहुत हुआ तो २००० वर्ष पूर्व का है। इसी लिए उनकी दृष्टि में ईसा से १४०० वर्ष पूर्व भागवत-धर्म मानने में झिझक होती है । क्योंकि उनके अनुसार ऋग्वेद के बाद यज्ञादिप्रतिपादक यजुर्वेद और ब्राह्मणग्रन्थ बने । तदनन्तर ज्ञानप्रधान उपनिषद्, सांख्यशास्त्र और अन्त में भक्तिप्रधान ग्रन्थ बने । उनके अनुसार भागवत-धर्म के उदय से पहले इन धर्माङ्गों की उत्पत्ति और वृद्धि के लिए कम से कम तो दस बारह शतक अवश्यक लगने चाहिये । अतः भागवत-धर्म का उदय बुद्ध के बाद हुआ होगा । परन्तु जब बौद्ध और जैन धर्मों में भी भागवत-धर्म (भक्ति) मिलते हैं तो यही कहना उचित है कि ओरायन आदि के अनुसार वेदकाल को ही और प्राचीन मानना चाहिये । वैदिक काल की पूर्व मर्यादा ईसा पूर्व ४५०० वर्ष होनी चाहिये । यह भी आधुनिक दृष्टि है । भाषा की दृष्टि से वेदकाल मैत्रायणी उपनिषद् पाणिनि से भी प्राचीन है । उसके अनुसार ऐसी कई शब्दसन्धियों के प्रयोग हैं जो केवल मैत्रायणीसंहिता में ही पाये जाते हैं और जिनका प्रचार पाणिनि के समय बन्द हो गया था । ज्योतिर्गणित से यह सिद्ध होता है कि वेदाङ्गज्योतिष में कही गयी उदगयनस्थिति ई० सं० के लगभग १२०० या १४०० वर्ष पहले की है । मैत्रायणी उपनिषद् में—'मघाद्यं श्रविष्ठार्धमाग्नेयं क्रमेणोत्क्रमेण सार्पाद्यं श्रविष्ठार्धन्तं सौम्यम्' ( ६।१४ ) में काल रूपी या संवत्सररूपी ब्रह्म का विवेचन करते हुए यह वर्णन मिलता है कि मघा नक्षत्र के आरम्भ से क्रमशः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्र के आधे भाग पर पहुँचने तक दक्षिणायन रहता है और सार्प अर्थात् आश्लेषा नक्षत्र से विपरीत क्रमेण आश्लेषा, पुष्य आदि क्रम से पीछे गिनते हुए धनिष्ठा नक्षत्र के आधे भाग तक उत्तरायण रहता है । उदगयनस्थिति के दर्शक वचन तत्कालीन उदगयनस्थिति को लक्ष्य कर कहे गये हैं । पर उसी से इस उपनिषद् का कालनिर्णय भी गणितरीति से सहज ही में किया जा सकता है । यह स्थिति वेदाङ्गज्योतिष की उदगयनस्थिति से पहले की है । उसका आरम्भ धनिष्ठा नक्षत्र के आरम्भ से होता है । मैत्रायणी उपनिषद् के 'श्रविष्ठार्ध' इस पद का अर्थ धनिष्ठार्ध किया गया है । इस तरह वेदाङ्गज्योतिष की उदगयनस्थिति जब ई० सन् से १२०० या १४०० वर्ष पहले की है तो आधे नक्षत्र से उदगयन के पीछे हटने में लगभग ४८० वर्ष लग जाते हैं । इस तरह गणित से विदित होता है कि मैत्रायणी उपनिषद् ई० पूर्व १८८० से १६८० के बीच कभी बनी होगी । छान्दोग्य आदि के अवतरण उसमे दिये जाने के कारण वे उससे भी प्राचीन हैं । वस्तुतः वेद, उपनिषद् सब अनादि अपौरुषेय ही हैं । भारत लोकमान्य के अनुसार वैशम्पायन ने जनमेजय को गीतासहित भारत सुनाया, आगे चलकर जब सौति ने शौनक को सुनाया तब से भारत प्रचलित हुआ ।