भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल ८५५ भारतीय युद्ध से ५०० वर्ष के भीतर आर्ष महाकाव्यात्मक भारत का निर्मित होना सम्भव है, क्योंकि बौद्ध धर्म के ग्रन्थ बुद्ध की मृत्यु के बाद इससे भी जल्दी तैयार हुए थे। नायकों के कार्यों का धार्मिक तथा नैतिक दृष्टिकोण से समर्थन करना महाकाव्य का मुख्य विषय होता है। इस दृष्टि से तत्काल प्रचलित भागवत-धर्म से उनका सम्बन्ध और तदनुकूल व्यवहार-वर्णन आवश्यक है। उसका तर्कपूर्ण वर्णन गीता में हुआ है, अतः गीता कम से कम ईसा से ९०० वर्ष पूर्व की होनी चाहिये। लोकमान्य की दृष्टि से महाभारत-कालनिर्णय महाभारत लक्षश्लोकात्मक बड़ा ग्रन्थ है। राव बहादुर चिन्तामणि के अनुसार उस संख्या में कुछ न्यूनाधिकता भी है। हरिवंश के श्लोक यदि मिला दिये जायें तो भी एक लाख योगफल नहीं होता। इस महाभारत में यास्क के निरुक्त, मनुसंहिता और गीता में ब्रह्मसूत्रों का भी उल्लेख है। अतः इनके पीछे का ही महाभारत होगा। प्रमाण (१) अठारह पर्वों का भारत तथा हरिवंश ये दोनों ही संवत् ५३५ और ६३५ के मध्य में जावा और वाली के द्वीपों में थे तथा वहाँ की प्राचीन कवि नाम की भाषा में उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवाद के आदि, विराट, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासिक, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण ये आठ पर्व वालीद्वीप में उपलब्ध हैं। अनुवाद यद्यपि कविभाषा में है, तथापि स्थान-स्थान पर महाभारत के मूल संस्कृत श्लोक ही रखे गये हैं। अतः लक्षश्लोकात्मक महाभारत संवत् ४३५ के लगभग दो सौ वर्ष तक हिन्दुस्तान में प्रमाणभूत माना जाता था। अन्यथा जावा तथा वाली वाले उसे न ले गये होते। तिब्बत की भाषा में भी महाभारत का अनुवाद है। परन्तु वह बाद का है। (२) गुप्त राजाओं का लेख हाल में उपलब्ध हुआ है जो कि चेदि संवत् १९७ विक्रमी सं० ५०२ में लिखा गया था। उसमें यह स्पष्टरूप से निर्देश है कि महाभारत ग्रन्थ एक लाख श्लोकों का था। संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य रहा होगा। भास कवि के नाटकों में जो कि भारत के आधार पर लिखे गये थे, बालचरित नाटक में श्रीकृष्ण की शिशु अवस्था की बातों एवं गोपियों का उल्लेख पाया जाता है। इसी से हरिवंश का भी उस समय अस्तित्व सिद्ध होता है। भास कवि का समय ई० सन् के दूसरे तीसरे शतक के इस ओर का नहीं माना जा सकता। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अश्वघोष कवि शालिवाहन शक संवत्सर के आरम्भ में हुआ है। उसके बुद्धचरित्र और सौन्दरनन्द में भारतीय कथाओं का उल्लेख है। महाभारत के नारायणीयाख्यान में विष्णु के अवतारों में बुद्ध का नाम नहीं है। महाभारतशान्ति पर्व ३६९।१०० में दस अवतारों में हंस से लेकर कल्कि तक को दस अवतारों में गिना जाता है। पर वनपर्व में कलियुग के भविष्य का वर्णन करते हुए कहा है— "एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता।" अर्थात् कलियुग में देवगृहों के स्थान पर एडूक होंगे (म० भा० ३।१९०।६८)। बुद्ध के बाल, दाँत आदि स्मारक वस्तुओं को जमीन में गाड़कर उसके ऊपर बने हुए स्तम्भ या मीनार को ही एडूक कहा जाता है। आजकल उसे डागोवा कहते हैं। इससे मालूम होता है कि बुद्ध के बाद किन्तु उनकी अवतारों में गणना होने के पहले महाभारत रचा गया होगा। महाभारत में यद्यपि बुद्ध तथा प्रतिबुद्ध का वर्णन (शा० प० १९४।५९; ३०७। ४९; ३४३।५३) में है तथापि वह ज्ञानी के अर्थ में ही है। बौद्धों ने इन शब्दों को वैदिक धर्म से लिया होगा।